2014 के लोकसभा चुनाव से भी कम हुए वोटर एसआईआर की यह लिस्ट उत्तर प्रदेश को एक दशक पीछे ले गई है। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रदेश में 13.89 करोड़ वोटर थे, जबकि वर्तमान लिस्ट में यह संख्या घटकर 13.39 करोड़ रह गई है। यानी आज प्रदेश में 2014 के मुकाबले भी करीब 49 लाख वोटर कम हैं। यह एक दुर्लभ स्थिति है, क्योंकि आमतौर पर जनसंख्या वृद्धि के साथ मतदाताओं की संख्या में बढ़ोतरी होती है। उत्तर प्रदेश में औसतन हर विधानसभा सीट पर 71,647 वोट कटे हैं।
मुस्लिम बहुल इलाकों की स्थिति रिपोर्ट के मुताबिक, मुस्लिम बहुल जिलों में गिरावट शहरी हिंदू बहुल सीटों के मुकाबले कम या संतुलित नजर आ रही है। पश्चिमी यूपी के कुछ प्रमुख आंकड़े इस प्रकार हैं:
- रामपुर: 12.33% की गिरावट।
- मुरादाबाद: 10.09% की गिरावट।
- संभल: 14.47% की गिरावट। तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो सपा की सीटों पर गिरावट 8% से 15% के बीच है, जबकि बीजेपी की सीटों पर यह गिरावट 18% से 34% तक पहुँच गई है।
राज्यों के बीच तुलना: यूपी और गुजरात शीर्ष पर भारत के अन्य राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश और गुजरात में सबसे अधिक प्रतिशत में वोट कटे हैं:
- गुजरात: 13.40%
- उत्तर प्रदेश: 13.24%
- छत्तीसगढ़: 11.77% इसके विपरीत केरल में सबसे कम (3.22%) मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।
हाई-प्रोफाइल सीटों का हाल समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता शिवपाल सिंह यादव की जसवंतनगर सीट पर भी 47,194 वोट कम हुए हैं। वहीं हरदोई की सदर सीट, जहाँ से आबकारी मंत्री नितिन अग्रवाल विधायक हैं, वहां 85,757 वोट कटे हैं। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2022 में उनकी जीत का अंतर 42,411 था। ऐसे में यदि कटे हुए वोटों का बड़ा हिस्सा उनके समर्थकों का हुआ, तो भविष्य की राह कठिन हो सकती है।
निष्कर्ष वोटर लिस्ट में इस बड़े फेरबदल ने उत्तर प्रदेश की चुनावी बिसात को अनिश्चित बना दिया है। जहाँ सत्ता पक्ष इसे डेटा क्लीनिंग और पारदर्शी चुनाव की प्रक्रिया बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे सत्ता विरोधी वोटों को दबाने की साजिश मान रहा है। अब सबकी नजरें इस बात पर हैं कि क्या ये कटे हुए मतदाता दोबारा पंजीकरण करा पाएंगे या फाइनल लिस्ट ही अंतिम परिणाम तय करेगी।



































