UAE द्वारा 1 मई से OPEC और OPEC+ छोड़ने के निर्णय को सऊदी अरब के साथ उसके तनावपूर्ण होते संबंधों के परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। दोनों क्षेत्रीय शक्तियों के बीच पिछले कुछ समय से कई मुद्दों पर असहमति उभरकर सामने आई है। तेल उत्पादन की सीमाओं और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा अब एक नए स्तर पर पहुंच गई है।
स्वतंत्र विदेश नीति की ओर कदम हाल के वर्षों में UAE ने मध्य पूर्व में अपनी एक स्वतंत्र विदेश नीति स्थापित करने का प्रयास किया है। कई कूटनीतिक और आर्थिक मामलों में उसकी नीतियां सऊदी अरब के रुख से अलग रही हैं। UAE अब अपने हितों को प्राथमिकता देते हुए क्षेत्रीय गठबंधनों से इतर अपनी अलग पहचान बनाने और अपनी आर्थिक संप्रभुता को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है।
आक्रामक आर्थिक प्रतिस्पर्धा का दौर सऊदी अरब ने जब से क्राउन प्रिंस Mohammed bin Salman के नेतृत्व में विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए आक्रामक नीतियां अपनाई हैं, तब से दोनों देशों के बीच आर्थिक होड़ तेज हुई है। सऊदी अरब की इन नीतियों ने UAE के व्यापारिक प्रभुत्व के लिए चुनौती पेश की है। इसी प्रतिस्पर्धा ने अंततः UAE को OPEC जैसे संगठनों से अलग होने के लिए प्रेरित किया है।
यमन युद्ध से संबंधों में आई खटास दोनों देशों के बीच संबंधों में तनाव का एक ऐतिहासिक पहलू भी है। 2015 में यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ दोनों देशों ने एक सैन्य गठबंधन में साथ मिलकर काम किया था। हालांकि, समय बीतने के साथ रणनीतिक मतभेदों के कारण इस गठबंधन के सहयोगियों के बीच दूरियां बढ़ती गईं, जिसका असर अब उनके आर्थिक निर्णयों पर भी दिख रहा है।
लाल सागर और क्षेत्रीय प्रभुत्व की जंग लाल सागर क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच आर्थिक और क्षेत्रीय मुद्दों पर प्रतिस्पर्धा काफी बढ़ गई है। प्रत्येक देश इस महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग पर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। UAE का तेल उत्पादन समूह से बाहर निकलने का फैसला इसी व्यापक क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा का एक हिस्सा माना जा रहा है, जहाँ वह अपनी ऊर्जा संपदा पर पूर्ण नियंत्रण चाहता है।
ऊर्जा बाजार पर भविष्य के प्रभाव UAE के इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में महत्वपूर्ण उथल-पुथल की संभावना जताई जा रही है। चूँकि UAE एक प्रमुख तेल उत्पादक है, इसलिए उसका स्वतंत्र रूप से उत्पादन बढ़ाने का निर्णय भविष्य में तेल की कीमतों को प्रभावित कर सकता है। यह फैसला न केवल आर्थिक बल्कि मध्य पूर्व की भविष्य की भू-राजनीति को भी नई दिशा देने वाला साबित होगा।

































