वट सावित्री व्रत का महत्व हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत को अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु का प्रतीक माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पूजा करने से महिलाओं को सुखद वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद मिलता है। हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को सुहागिनें अपने पति की लंबी उम्र के लिए यह व्रत रखती हैं। यदि आप इस वर्ष पहली बार यह उपवास रखने जा रही हैं, तो व्रत के पूर्ण फल के लिए नियमों का ज्ञान होना आवश्यक है।
अशुभ रंगों का त्याग वट सावित्री व्रत के दिन वस्त्रों के चुनाव में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए ताकि पूजा में कोई बाधा न आए। इस दिन भूलकर भी नीला, काला, सफेद या ग्रे जैसे अशुभ रंगों के कपड़े या श्रृंगार सामग्री का उपयोग नहीं करना चाहिए। सुहाग के प्रतीक रंग जैसे लाल, पीला और गुलाबी रंग के वस्त्र पहनना इस पावन अवसर पर अत्यंत शुभ माना जाता है। पहली बार व्रत करने वाली महिलाओं को रंगों के इस विशेष नियम का कड़ाई से पालन करना चाहिए।
स्नान, संकल्प और स्वच्छता व्रत के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और स्वच्छ पारंपरिक वस्त्र धारण कर तैयार हों। सबसे पहले सूर्य देव को जल से अर्घ्य दें और अपने मन में श्रद्धा के साथ व्रत का संकल्प लें। वट वृक्ष की पूजा करने से पहले पेड़ के आसपास की जगह को अच्छी तरह साफ करना अनिवार्य है। सफाई के उपरांत उस स्थान पर गंगाजल छिड़ककर उसे शुद्ध करें, तभी विधिवत पूजा का आरंभ करें।
सोलह श्रृंगार और पूजा सामग्री वट सावित्री का पर्व सुहागिनों का उत्सव है, इसलिए इस दिन पूरा सोलह श्रृंगार करना अनिवार्य माना गया है। पहली बार व्रत कर रही महिलाएं पूजा सामग्री में बांस का पंखा, कच्चा सूत और भीगे हुए चने जरूर शामिल करें। पूजा की थाली में सुहाग का सामान जैसे सिंदूर, बिंदी और चूड़ियां रखना भी परंपरा का एक अहम हिस्सा है। सामग्री की पूर्णता से ही पूजा संपन्न मानी जाती है, इसलिए पहले से ही लिस्ट बनाकर तैयारी कर लेनी चाहिए।
परिक्रमा और व्रत कथा वट वृक्ष में त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का वास होता है, इसलिए इसकी परिक्रमा का विशेष महत्व है। पूजा के दौरान कच्चे सूत को पेड़ पर लपेटते हुए 5, 7, 11 या 108 बार परिक्रमा अवश्य पूरी करें। सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा सुने बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है, इसे ध्यानपूर्वक सुनें। कथा के उपरांत माता सावित्री और यम देवता से अपने पति की कुशलता और लंबी आयु की प्रार्थना करें।
दान-पुण्य और व्यवहार पूजा संपन्न होने के बाद अपनी सास को सम्मानस्वरूप पैसे या उपहार देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। पूजा में उपयोग की गई दान योग्य सामग्री को किसी योग्य ब्राह्मण को आदरपूर्वक दान कर देना चाहिए। व्रत के दौरान अपने मन को शांत रखें और किसी भी प्रकार के क्रोध, विवाद या नकारात्मक विचारों से दूर रहें। मन की शुद्धता और बड़ों का आशीर्वाद ही इस कठिन व्रत को सफल बनाने में सहायक होता है।
Vat Savitri Vrat 2026 Date and Shubh Muhurat Timing
- Vat Savitri Vrat Date: 16 मई 2026, शनिवार
- Amavasya Tithi Starts: 16 मई 2026 को सुबह 05:11 AM बजे
- Amavasya Tithi Ends: 17 मई 2026 को रात 01:30 AM बजे




































