पितृ पक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार विधि-विधान और उचित समय पर पितरों का श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। पितरों की पूजा से आयु, संतान, यश, कीर्ति, स्वर्ग, पुष्टि, बल, समृद्धि, सुख-सौभाग्य और धन-धान्य की प्राप्ति होने की धार्मिक मान्यता है। शास्त्रीय परंपरा में देवकार्य की तुलना में पितृकार्य को भी विशेष महत्व दिया गया है और देवताओं की पूजा से पहले पितरों को प्रसन्न करना कल्याणकारी माना गया है। इसी कारण पितृ पक्ष में पूर्वजों के लिए श्रद्धापूर्वक किए गए कर्मकांड को परिवार की सुख-समृद्धि और वंश की निरंतरता से जोड़कर देखा जाता है।
पिंडदान के पीछे की मान्यता: पिंडदान की परंपरा को केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति स्मरण और तृप्ति का माध्यम भी माना गया है। मान्यता के अनुसार प्रत्येक पीढ़ी में मातृकुल और पितृकुल की पूर्ववर्ती पीढ़ियों के गुणसूत्र मौजूद रहते हैं। इसी विचार के प्रतीकात्मक रूप में चावल से बनाए गए पिंडों को पिता, दादा, परदादा और अन्य पूर्वजों के शरीर का प्रतीक माना जाता है। अनुष्ठान में इन पिंडों को आपस में मिलाकर फिर अलग-अलग किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह प्रक्रिया उन सभी पूर्वजों की तृप्ति के लिए की जाती है जिनका वंशानुगत संबंध श्राद्ध करने वाले व्यक्ति से जुड़ा हुआ है। इस तरह पिंडदान के माध्यम से व्यक्ति अपने ज्ञात और अज्ञात पूर्वजों का स्मरण करता है तथा उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा प्रकट करता है।
बारह पिंडों की विधि: पिंडदान करते समय दाहिने हाथ में पिंड लेकर मंत्रोच्चार के साथ पितृतीर्थ मुद्रा में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके उसे थाली या पत्तल में स्थापित करने की परंपरा बताई गई है। पितृतीर्थ मुद्रा में दक्षिणाभिमुख होकर बायां घुटना मोड़कर बैठने का विधान बताया जाता है। इसके बाद बारह पिंड निकाले जाते हैं और प्रत्येक पिंड अलग-अलग श्रेणी के लिए समर्पित किया जाता है। पहला पिंड देवताओं, दूसरा ऋषियों, तीसरा दिव्य मानवों, चौथा दिव्य पितरों और पांचवां यम के लिए माना जाता है। छठा पिंड मनुष्य पितरों के नाम, सातवां मृतात्मा के नाम, आठवां पुत्र और पत्नी से रहित दिवंगतों के नाम तथा नौवां उच्छिन्न कुलवंश वालों के नाम समर्पित किया जाता है। दसवां पिंड गर्भपात से मृत्यु को प्राप्त होने वालों के लिए और ग्यारहवां तथा बारहवां पिंड इस जन्म या अन्य जन्म के बंधुओं के निमित्त माना जाता है। इस प्रकार बारह पिंडों के माध्यम से अलग-अलग दिवंगत आत्माओं का स्मरण और तर्पण किया जाता है।
पिंडों पर अर्पण और मंत्र जाप: बारहों पिंडों पर क्रमशः दूध, दही और मधु अर्पित करने के बाद पितरों की तृप्ति के लिए प्रार्थना और मंत्र जाप किया जाता है। इस अवसर पर पितरों की शांति और तृप्ति की कामना की जाती है। श्राद्ध और पितृपूजन के महत्व को स्पष्ट करते हुए धार्मिक ग्रंथों में यह भाव व्यक्त किया गया है कि समय पर श्राद्ध करने से कुल में किसी को कष्ट नहीं रहता और पितृपूजन से आयु, संतान, यश, कीर्ति, पुष्टि, बल, समृद्धि, पशुधन, सुख, धन और धान्य की प्राप्ति होती है। इसी परंपरा में पितृकार्य को देवकार्य से भी विशेष माना गया है और पितरों को पहले तृप्त करने को शुभ बताया गया है। श्राद्ध के दिन खीर, पूड़ी, सब्जी और दिवंगत पूर्वज की पसंद का कोई भोजन तैयार कर उन्हें भोग लगाने की परंपरा भी है। कई परंपराओं में गोबर से बने उपले या कंडों की कोर पर भोजन रखकर पितरों को अर्पित किया जाता है और दाहिनी ओर पानी छोड़ा जाता है। कुछ शास्त्रीय परंपराओं में पके चावल, दूध और तिल को मिलाकर पिंड बनाने तथा इसे सपिंडीकरण से जोड़कर देखा गया है। यहां पिंड को शरीर का प्रतीक माना जाता है और पूर्वजों के निमित्त पिंड अर्पित करके उनके आशीर्वाद से संतान, संपत्ति, विद्या और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
कौओं को भोजन कराने की परंपरा: पितृ पक्ष के श्राद्ध कर्म में कौओं के लिए भोजन निकालने की परंपरा भी विशेष रूप से प्रचलित है। धार्मिक मान्यता में कौए को पितरों का प्रतीक माना गया है और ऐसा विश्वास है कि कौओं को भोजन कराने अथवा उनके निमित्त भोजन निकालने से पितरों को भोजन प्राप्त होता है और उनकी तृप्ति होती है। इसी कारण श्राद्ध के भोजन में कौओं के लिए भी हिस्सा निकालने की परंपरा निभाई जाती है। पितृ पक्ष के प्रथम दिन कौओं को पहला निमंत्रण देने, फिर पूर्वज की मृत्यु की तिथि पर भोजन कराने, नवमी तिथि पर दोबारा आमंत्रित करने और अंत में पितृ विसर्जन के अवसर पर भोजन कराने की परंपरा बताई गई है। इस प्रकार पितृ पक्ष में श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, पूर्वजों के पसंदीदा भोजन का भोग और कौओं को भोजन अर्पित करने जैसी परंपराओं के माध्यम से दिवंगत पूर्वजों का स्मरण किया जाता है और उनकी तृप्ति तथा परिवार के लिए सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।














































