मां चंद्रघंटा की पूजा का महत्व: शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन यानी १३ अक्टूबर २०२६, मंगलवार को मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की उपासना की जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा की विधिपूर्वक पूजा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि, साहस तथा मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। देवी का यह स्वरूप भक्तों की रक्षा करने वाला और कल्याणकारी माना जाता है। मान्यता है कि मां चंद्रघंटा अपने अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर दुष्ट शक्तियों का सामना करने के लिए सदैव तत्पर रहती हैं। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र के आकार की घंटी सुशोभित है, जिसकी ध्वनि को नकारात्मक शक्तियों से भक्तों की रक्षा करने वाला माना जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और प्रत्येक दिन देवी को उनकी प्रिय वस्तुएं, फूल तथा भोग अर्पित किए जाते हैं। श्रद्धालु इन दिनों व्रत, साधना और पूजा के माध्यम से माता रानी का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विधिपूर्वक आराधना करने से मनोकामनाओं की पूर्ति और जीवन में सकारात्मकता आने की मान्यता है।
पूजा का शुभ मुहूर्त और समय: १३ अक्टूबर को मां चंद्रघंटा की पूजा के लिए सुबह और शाम दोनों समय शुभ मुहूर्त बताए गए हैं। ब्रह्म मुहूर्त सुबह ४ बजकर ५४ मिनट से ५ बजकर ४३ मिनट तक रहेगा, जबकि प्रातः संध्या का समय सुबह ५ बजकर १९ मिनट से ६ बजकर ३२ मिनट तक है। अभिजीत मुहूर्त दोपहर १२ बजकर १ मिनट से १२ बजकर ४८ मिनट तक रहेगा। शाम को गोधूलि मुहूर्त ६ बजकर १७ मिनट से ६ बजकर ४२ मिनट तक बताया गया है और सायाह्न संध्या का समय शाम ६ बजकर १७ मिनट से ७ बजकर ३१ मिनट तक रहेगा। श्रद्धालु अपनी सुविधा के अनुसार इन समयों में पूजा-अर्चना कर सकते हैं। पूजा के दौरान घर के मंदिर या पूजा स्थल की स्वच्छता बनाए रखें और देवी की प्रतिमा अथवा तस्वीर के साथ कलश को ईशान कोण में स्थापित करने का विधान बताया गया है। नवरात्रि के तीसरे दिन सफेद, सुनहरे, पीले या लाल रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इन रंगों को मां चंद्रघंटा की प्रिय रंग परंपरा से जोड़ा जाता है। पूजा करते समय मन में किसी के प्रति द्वेष या गलत भावना न रखें और श्रद्धा के साथ माता का ध्यान करें।
मां दुर्गा को भूलकर भी न चढ़ाएं ये चीजें: नवरात्रि में मां दुर्गा को भोग और फूल अर्पित करते समय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुछ वस्तुओं से परहेज किया जाता है। पूजा में तुलसी के पत्तों का उपयोग वर्जित माना गया है। इसके अलावा केतकी, कनेर, नागकेसर, धतूरा और मदार के फूल अर्पित नहीं करने चाहिए। मुरझाए हुए फूल भी पूजा में इस्तेमाल नहीं करने चाहिए। फल चढ़ाते समय नाशपाती, सूखा नारियल, अंजीर, अनानास, खट्टे फल, नींबू और इमली से परहेज करने की मान्यता बताई गई है। कीड़े लगे, कटे-फटे, अत्यधिक खट्टे या कड़वे तथा पक्षियों द्वारा जूठे किए गए फल भी देवी को अर्पित नहीं करने चाहिए। भोग तैयार करते समय सात्विकता और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना जरूरी माना जाता है। भोग में नमक, लहसुन और प्याज का इस्तेमाल न करें और यह भी ध्यान रखें कि इनका स्पर्श भोजन में न हो। पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री स्वच्छ होनी चाहिए। इन नियमों का पालन श्रद्धालु धार्मिक परंपराओं के अनुसार करते हैं, ताकि पूजा श्रद्धा, पवित्रता और विधि-विधान के साथ संपन्न हो सके।
मां चंद्रघंटा का स्वरूप और प्रिय भोग: मां चंद्रघंटा का वाहन सिंह है और उनकी दस भुजाओं में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र तथा पूजा से जुड़ी वस्तुएं सुशोभित मानी जाती हैं। उनके दाहिने हाथों में कमल का फूल, धनुष, जपमाला और बाण बताए गए हैं, जबकि एक हाथ अभय मुद्रा में रहता है। बाईं ओर के हाथों में त्रिशूल, गदा, कमंडल और तलवार का वर्णन मिलता है तथा एक हाथ वरद मुद्रा में रहता है। देवी का यह स्वरूप शक्ति, साहस, शांति और भक्तों के कल्याण का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा को दूध, खीर और दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाने की परंपरा है। इसके साथ थोड़ा शुद्ध शहद भी अर्पित किया जा सकता है। पूजा में सफेद कमल या पीले गुलाब के फूल अथवा उनकी माला चढ़ाने का विधान बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा की उपासना से साहस बढ़ता है, मन को शांति मिलती है और जीवन की परेशानियों का सामना करने की शक्ति प्राप्त होती है। देवी का शांत और कल्याणकारी स्वरूप भक्तों को धैर्य तथा सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
मां चंद्रघंटा की पूजा विधि और मंत्र: पूजा के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और घर तथा पूजा स्थल पर गंगाजल छिड़ककर शुद्धि करें। इसके बाद मां चंद्रघंटा का ध्यान करते हुए घी या तेल का दीपक जलाएं। देवी को फूल, माला, रोली, अक्षत, फल, धूप और दीप अर्पित करें। फिर दूध से बनी मिठाई या खीर का भोग लगाएं। पूजा के दौरान दुर्गा स्तुति, दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ किया जा सकता है। इसके बाद मां चंद्रघंटा की आरती करें और मंत्रों का जाप करके शंख तथा घंटा बजाते हुए पूजा संपन्न करें। मां चंद्रघंटा का प्रमुख मंत्र है—“ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥” इसके अतिरिक्त “या देवी सर्वभूतेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥” और “पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥” मंत्र का भी जाप किया जाता है। श्रद्धालु आरती के दौरान मां से सुख, शांति, सुरक्षा और मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना कर सकते हैं।
मां चंद्रघंटा की आरती और पूजा का समापन: पूजा के अंत में श्रद्धापूर्वक मां चंद्रघंटा की आरती करें। आरती की शुरुआत “जय माँ चन्द्रघण्टा सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे काम॥” से होती है। आगे देवी को शीतलता प्रदान करने वाली, मन को प्रसन्न करने वाली और संकटों से रक्षा करने वाली माता के रूप में नमन किया जाता है। आरती में भक्त अपनी मनोकामनाएं माता के सामने रखने, शीश झुकाकर प्रार्थना करने और देवी से अपनी रक्षा करने की विनती करते हैं। इसमें देवी के पवित्र स्वरूप, उनकी कृपा और भक्तों के प्रति उनके स्नेह का गुणगान किया जाता है। आरती के बाद मां को प्रणाम करें और परिवार की सुख-समृद्धि तथा सभी के कल्याण की कामना करें। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा में स्वच्छता, सात्विक भोग, उचित पूजा सामग्री और श्रद्धा का विशेष महत्व माना जाता है। देवी की उपासना करते समय मन शांत रखें और किसी के प्रति नकारात्मक भावना न रखें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धापूर्वक की गई पूजा से भक्तों को आत्मबल, मानसिक शांति और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की प्रेरणा मिलती है।














































