इस्लामाबाद: ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रहे युद्ध में पाकिस्तान एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर खड़ा है, जहां से उसके लिए ना आगे जाने का रास्ता है और ना ही पीछे हटने का। पाकिस्तान की ये मुश्किलें केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि गहरी रणनीतिक और घरेलू हैं।
सबसे बड़ा संकट ईरान के साथ संबंधों और घरेलू मोर्चे पर है। 28 फरवरी को संघर्ष की शुरुआत में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया आबादी वाले देश पाकिस्तान में भारी विरोध प्रदर्शन हुए थे। इसके अलावा, ईरान के साथ बलूचिस्तान सीमा पर पहले से ही तनाव (जनवरी 2024 की झड़पें) और अफगान तालिबान के साथ संघर्ष ने पाकिस्तान को उलझा रखा है।
असली खतरा सऊदी अरब को लेकर है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान अब होर्मुज स्ट्रेट पर औपचारिक नियंत्रण और भविष्य में सैन्य कार्रवाई न होने की गारंटी मांग रहा है। अगर बातचीत विफल होती है और ईरान सऊदी अरब पर हमले जारी रखता है, तो इस्लामाबाद और रियाद के बीच हुआ ‘रक्षा समझौता’ पाकिस्तान के लिए बड़ी मुसीबत बन जाएगा। इस समझौते के तहत पाकिस्तान को सऊदी अरब की सैन्य मदद करनी होगी। यदि पाकिस्तान ने ऐसा किया, तो ईरान की तरफ से भी इस्लामाबाद पर सीधा निशाना बनाए जाने का पूरा खतरा है।



































