महिला आरक्षण पर सत्ता और विपक्ष में टकराव संसद के निचले सदन में महिला आरक्षण विधेयक को लेकर सत्ताधारी दल और विरोधी खेमे के बीच एक बार फिर तलवारें खिंच गई हैं। समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने इस कानून के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की, जबकि सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पुरानी बातों का हवाला देते हुए सरकार को घेरने की कोशिश की। इस बहस ने न केवल सदन के भीतर हलचल पैदा की, बल्कि देश की राजनीति में भी महिला आरक्षण के भीतर कोटे के मुद्दे को फिर से केंद्र में ला दिया है। दोनों ही पक्षों ने अपने-अपने तर्कों के साथ एक-दूसरे की घेराबंदी की, जिससे कार्यवाही काफी समय तक बाधित रही।
धर्मेंद्र यादव का विरोध और पुरानी मांगों का दोहराव सांसद धर्मेंद्र यादव ने अपने संबोधन में कश्मीर और असम की परिस्थितियों का उदाहरण देते हुए सरकार की नीयत पर संदेह जताया। उन्होंने तर्क दिया कि यह बिल अधूरा है क्योंकि इसमें पिछड़ी जातियों और मुस्लिम महिलाओं के लिए कोई अलग प्रावधान नहीं किया गया है। यादव ने कड़े स्वर में कहा कि बिना सामाजिक विविधता के यह आरक्षण केवल एक दिखावा बनकर रह जाएगा। उन्होंने मांग की कि सरकार 2023 के बिल की खामियों को दूर करे और इसे अधिक समावेशी बनाकर दोबारा पेश करे। उनके अनुसार, जब तक हाशिए पर रहने वाली महिलाओं को प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा, यह आंदोलन अधूरा रहेगा।
केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू का संवैधानिक जवाब सरकार की ओर से मोर्चा संभालते हुए केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने विपक्ष के दावों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि विपक्ष जानबूझकर मजहब के नाम पर देश की महिलाओं को बांटने की कोशिश कर रहा है। रिजिजू ने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान किसी भी व्यक्ति को उसके धर्म के आधार पर आरक्षण देने की वकालत नहीं करता है और सपा के नेताओं को ऐसी बातें करके संवैधानिक मर्यादा नहीं तोड़नी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार की प्राथमिकता नारी शक्ति को सशक्त बनाना है, जिसमें हर वर्ग की महिला शामिल है, और इसे संकीर्ण राजनीतिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
जनगणना और राजनीतिक पारदर्शिता का मुद्दा अखिलेश यादव ने चर्चा में शामिल होते हुए सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाए। उन्होंने कहा कि सरकार आंकड़ों के साथ खेल रही है और जाति जनगणना कराने से बच रही है क्योंकि उसे डर है कि सच सामने आने पर सामाजिक समीकरण बदल जाएंगे। अखिलेश ने जोर देकर कहा कि पारदर्शी लोकतंत्र के लिए जातिगत जनगणना अनिवार्य है, जिससे यह पता चल सके कि किस वर्ग की महिलाओं को आरक्षण की सबसे ज्यादा जरूरत है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की यह जल्दबाजी केवल चुनाव को ध्यान में रखकर की गई है, न कि महिलाओं के वास्तविक उत्थान के लिए।
अमित शाह की नसीहत और जातिगत राजनीति पर प्रहार गृह मंत्री अमित शाह ने अखिलेश यादव के वक्तव्य का जवाब देते हुए कहा कि कुछ लोग केवल नकारात्मकता फैलाने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि जनगणना का कार्य शुरू हो चुका है और जातिगत आंकड़ों पर भी सरकार का रुख स्पष्ट है। शाह ने समाजवादी पार्टी की विचारधारा पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वे घरों तक की जाति तय करने की मानसिकता रखते हैं। उन्होंने सदन को आश्वस्त किया कि जनगणना एक वैज्ञानिक और संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसे सरकार पूरी जिम्मेदारी के साथ पूरा कर रही है और इसे किसी राजनीतिक दल की इच्छा के अनुसार संचालित नहीं किया जा सकता।
अखिलेश का प्रधानमंत्री पर निशाना और टिकट वितरण का विवाद बहस के दौरान जब अमित शाह ने कहा कि सपा चाहे तो अपने सारे टिकट मुस्लिम महिलाओं को दे दे, तो अखिलेश यादव ने इसे गंभीरता से लेते हुए प्रधानमंत्री की ओर निशाना साधा। उन्होंने याद दिलाया कि जब प्रधानमंत्री को चुनाव में पिछड़ों के समर्थन की दरकार थी, तब उन्होंने अपनी पिछड़ी जाति की पहचान को प्रमुखता से पेश किया था। अखिलेश ने सवाल उठाया कि जब वोट की बात आती है तो पिछड़ापन याद आता है, लेकिन जब अधिकार देने की बारी आती है तो इसे असंवैधानिक बता दिया जाता है। इस बहस ने महिला आरक्षण के मुद्दे को एक नए राजनीतिक मोड़ पर खड़ा कर दिया है।



































