विशाल गड्ढे ने चौंकाया: चांद की सतह पर वैज्ञानिकों को एक ऐसा विशाल क्रेटर मिला है, जिसने हाल की सबसे बड़ी ज्ञात प्रभावी टक्कर के रिकॉर्ड को नया रूप दिया है। यह गड्ढा करीब 728 फीट यानी 222 मीटर चौड़ा है और इसकी गहराई 141 फीट यानी लगभग 43 मीटर तक बताई गई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इसका निर्माण करीब दो साल पहले किसी क्षुद्रग्रह या धूमकेतु के टूटे हुए हिस्से के चांद से टकराने के बाद हुआ था। घटना इतनी शक्तिशाली थी कि उसके निशान चांद की सतह के बड़े हिस्से में दिखाई दिए। इसके बावजूद वैज्ञानिकों को इसकी जानकारी तत्काल नहीं मिल सकी और लंबे समय बाद तस्वीरों के अध्ययन से इसका पता चला।
मई 2024 की तस्वीरों से सुराग: नासा के लूनर रिकॉनसेंस ऑर्बिटर ने मई 2024 में चांद के पृथ्वी की ओर दिखाई देने वाले हिस्से की तस्वीरें दर्ज की थीं। इन्हीं तस्वीरों में बाद में उस स्थान पर बने नए क्रेटर के संकेत मिले। अगस्त 2025 में वैज्ञानिकों ने उपलब्ध तस्वीरों का विश्लेषण करते हुए इस नए गड्ढे की पहचान की। इसके बाद पिछले जाड़े में लूनर रिकॉनसेंस ऑर्बिटर को उसी क्षेत्र की ज्यादा विस्तृत तस्वीरें लेने के लिए इस्तेमाल किया गया। विस्तृत तस्वीरों के विश्लेषण के बाद इस खोज की पुष्टि इस साल की शुरुआत में हुई। इस तरह करीब दो साल पहले हुई टक्कर का स्पष्ट प्रमाण बाद में वैज्ञानिकों के सामने आया।
पिछले रिकॉर्ड से तीन गुना बड़ा: वैज्ञानिकों के अनुसार, नया क्रेटर लूनर रिकॉनसेंस ऑर्बिटर से करीब एक दशक पहले खोजे गए पिछले रिकॉर्ड वाले गड्ढे से लगभग तीन गुना बड़ा है। इसका नाम दिवंगत वैज्ञानिक थॉमस मैकगेटचिन के नाम पर रखा गया है। मैकगेटचिन ह्यूस्टन स्थित चंद्र एवं ग्रह संस्थान के पूर्व निदेशक रह चुके थे। बुधवार को विज्ञान उन्नति पत्रिका में प्रकाशित दो अलग-अलग अध्ययनों में इस खोज से जुड़े निष्कर्ष सामने आए। वैज्ञानिकों ने इतनी बड़ी टक्कर को बेहद दुर्लभ घटना बताया है। उनके अनुसार, इस स्तर की टक्कर औसतन करीब 132 वर्षों में एक बार होने की संभावना रहती है।
सौ किलोमीटर से ज्यादा असर: टक्कर की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसका प्रभाव सौ किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में महसूस हुआ। वैज्ञानिकों के अनुसार, टक्कर के दौरान चांद की सतह की धूल और चट्टानी मिट्टी बहुत दूर तक उछली। यह सामग्री अनुमान से कहीं अधिक ऊंचे कोण पर बाहर निकली और बड़े क्षेत्र में फैल गई। लूनर रिकॉनसेंस ऑर्बिटर के कैमरों के प्रमुख वैज्ञानिक और अध्ययन के प्रमुख लेखक मार्क रॉबिन्सन ने इस घटना को वैज्ञानिकों के लिए बेहद दुर्लभ अवसर बताया। अध्ययन में इसे प्रभावी रूप से जीवन में एक बार मिलने वाला अवलोकन कहा गया है। इस घटना ने चांद पर अचानक होने वाले सतही बदलावों को समझने के लिए नया आंकड़ा उपलब्ध कराया है।
मिट्टी की परतों में बड़ी हलचल: दूसरे अध्ययन में क्रेटर के आसपास करीब सात किलोमीटर चौड़ा ठंडा क्षेत्र भी पाया गया। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह क्षेत्र बताता है कि टक्कर ने चांद की ऊपरी मिट्टी को ढीला करने के साथ उसकी परतों को उलट-पुलट दिया। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजिलिस के सह-लेखक डेविड पेज ने इस प्रक्रिया की तुलना बगीचे की मिट्टी को पलटने से की। टक्कर के कारण सामान्य रूप से सतह के नीचे रहने वाली सामग्री ऊपर आ गई और सतही पदार्थ दूसरी जगह फैल गया। लूनर रिकॉनसेंस ऑर्बिटर की वर्ष 2009 से जारी निगरानी ने वैज्ञानिकों को चांद की सतह में ऐसे बदलावों का अध्ययन करने में मदद की है।
चंद्र बेस के लिए नई चुनौती: वैज्ञानिकों के अनुसार, चांद की ऊपरी एक इंच यानी करीब दो सेंटीमीटर मिट्टी उल्कापिंडों से उछली सामग्री के कारण लगभग हर अस्सी हजार साल में पलट जाती है। यह गति पहले लगाए गए अनुमानों से ज्यादा तेज बताई गई है। इसी कारण अपोलो अभियानों के अंतरिक्ष यात्रियों के पैरों के निशान भी हमेशा सुरक्षित रहने की धारणा सही नहीं मानी जा रही है। मार्क रॉबिन्सन के अनुसार, इस समय-सीमा में वे निशान बहुत पहले गायब हो चुके होते। अब इस नई खोज का एक अहम पहलू भविष्य के चंद्र बेस की सुरक्षा है। वैज्ञानिक यह पता लगाने की दिशा में काम करेंगे कि ऐसी टक्करों से निकली चट्टानें और मलबा प्रस्तावित चंद्र बेस तक पहुंचने पर कितना जोखिम पैदा कर सकते हैं, जिससे इंजीनियर भविष्य की संरचनाओं को संभावित टक्करों से अधिक सुरक्षित बना सकें।














































