भारत समेत दुनियाभर में चाय और कॉफी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। सुबह की शुरुआत से लेकर काम के दौरान थकान मिटाने तक लोग इन पेय पदार्थों का सेवन करते हैं। कुछ लोग चाय या कॉफी को इतना गर्म पीना पसंद करते हैं कि कप से भाप निकलती रहती है। लेकिन इसी आदत को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। अब एक बड़े अध्ययन में बहुत गर्म पेय पदार्थों के सेवन और ग्रासनली यानी भोजन की नली के एक प्रकार के कैंसर के बीच संबंध की ओर ध्यान दिलाया गया है।
इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कैंसर में प्रकाशित अध्ययन में करीब 10 लाख लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोध में विशेष रूप से ग्रासनली के स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा के मामलों पर ध्यान दिया गया, जो दुनिया में ग्रासनली के कैंसर का सबसे आम रूप है। अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार पेय पदार्थ का तापमान जितना अधिक था, इस प्रकार के कैंसर का जोखिम उतना अधिक पाया गया। बहुत गर्म पेय पसंद करने वाले लोगों में जोखिम गुनगुने पेय पसंद करने वालों की तुलना में तीन गुना से अधिक तक पाया गया।
बहुत गर्म पेय और ग्रासनली के कैंसर का संबंध
ग्रासनली शरीर की वह मांसपेशीय नली है जो मुंह से भोजन और पेय पदार्थों को पेट तक पहुंचाती है। बहुत अधिक तापमान वाले पेय पदार्थ इस नली की अंदरूनी परत को बार-बार गर्मी के संपर्क में ला सकते हैं। लंबे समय तक ऐसी आदत रहने पर ऊतक को नुकसान पहुंचने की संभावना को लेकर वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है।
अध्ययन में लोगों से उनके गर्म पेय पीने की आदत के बारे में जानकारी ली गई। प्रतिभागियों से पूछा गया कि वे प्रतिदिन छह से कम गर्म पेय लेते हैं या छह अथवा उससे अधिक। साथ ही उनसे यह भी पूछा गया कि उन्हें पेय गर्म, बहुत गर्म या गुनगुना किस तापमान पर पसंद है।
शोध में शामिल लगभग आधे प्रतिभागियों ने बताया कि वे प्रतिदिन छह या उससे अधिक गर्म पेय पदार्थ लेते हैं। करीब 15 प्रतिशत लोगों ने अपने पेय को बहुत गर्म पसंद करने की जानकारी दी।
तापमान बढ़ने के साथ जोखिम भी बढ़ा
अध्ययन के निष्कर्षों में पेय पदार्थ के तापमान और ग्रासनली के स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा के जोखिम के बीच संबंध देखा गया। जिन लोगों को गर्म पेय पसंद थे, उनमें गुनगुने पेय पसंद करने वालों की तुलना में जोखिम लगभग दोगुना पाया गया।
वहीं, जो लोग बहुत गर्म पेय पीना पसंद करते थे, उनमें यह जोखिम तीन गुना से भी अधिक पाया गया। इसका मतलब यह है कि केवल चाय या कॉफी पीना ही मुद्दा नहीं है, बल्कि उसे किस तापमान पर पिया जा रहा है, यह भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
शोधकर्ताओं ने पेय पदार्थ की मात्रा को भी ध्यान में रखा। तापमान का प्रभाव अलग करने के बाद पाया गया कि रोजाना छह या उससे अधिक गर्म पेय लेने वालों में छह से कम गर्म पेय लेने वालों की तुलना में ग्रासनली के स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा का जोखिम करीब 71 प्रतिशत अधिक था।
इन निष्कर्षों के आधार पर बहुत गर्म चाय-कॉफी को थोड़ा ठंडा करके या गुनगुने तापमान पर पीने की सलाह दी जाती है। हालांकि किसी व्यक्ति के कैंसर का जोखिम केवल एक आदत से तय नहीं होता और अध्ययन में पाया गया संबंध यह साबित नहीं करता कि गर्म पेय अकेले कैंसर का कारण हैं।
ग्रासनली का कैंसर कितना गंभीर है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर एजेंसी, इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 में दुनिया में ग्रासनली के कैंसर के करीब 6.04 लाख नए मामले सामने आए थे और लगभग 5.44 लाख मौतें हुई थीं।
एजेंसी ने यह भी अनुमान लगाया है कि वर्ष 2040 तक दुनियाभर में ग्रासनली के कैंसर के मामलों में 50 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हो सकती है और हर साल करीब 10 लाख नए मामले सामने आ सकते हैं।
ग्रासनली के कैंसर के कई जोखिम कारक हो सकते हैं। इसलिए केवल चाय या कॉफी के तापमान पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। तंबाकू, शराब, खान-पान, उम्र, जीवनशैली और अन्य व्यक्तिगत स्वास्थ्य कारक भी कैंसर के जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं।
चाय और कॉफी पूरी तरह नुकसानदायक नहीं
गर्म पेय को लेकर सामने आई चिंता का अर्थ यह नहीं है कि चाय और कॉफी का सेवन पूरी तरह बंद कर देना चाहिए। सीमित मात्रा में इन दोनों पेय पदार्थों को कई अध्ययनों में स्वास्थ्य के कुछ लाभों से जोड़ा गया है। इनके प्रभाव व्यक्ति की कुल मात्रा, कैफीन की संवेदनशीलता, उसमें डाली गई चीनी और दूध तथा व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर कर सकते हैं।
चाय में कैटेचिन और थियाफ्लेविन जैसे पौधों से मिलने वाले यौगिक पाए जाते हैं, जबकि कॉफी में विभिन्न पॉलीफेनॉल मौजूद होते हैं। ये एंटीऑक्सीडेंट गुणों से जुड़े यौगिक हैं और शरीर में ऑक्सीडेटिव तनाव तथा सूजन से संबंधित प्रक्रियाओं पर प्रभाव डाल सकते हैं।
चाय-कॉफी के संभावित फायदे
एंटीऑक्सीडेंट का स्रोत
चाय और कॉफी दोनों में ऐसे यौगिक पाए जाते हैं जिनमें एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं। ये शरीर में बनने वाले मुक्त कणों से होने वाले कोशिकीय नुकसान को कम करने में भूमिका निभा सकते हैं। चाय में कैटेचिन और कॉफी में पॉलीफेनॉल प्रमुख रूप से चर्चा में रहते हैं।
ऊर्जा और एकाग्रता में मदद
चाय और कॉफी में मौजूद कैफीन मस्तिष्क में एडेनोसिन के प्रभाव को रोकने में मदद करता है। इसके कारण थकान कम महसूस हो सकती है और सतर्कता तथा ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कुछ समय के लिए बेहतर हो सकती है।
कॉफी में आम तौर पर कैफीन की मात्रा चाय से अधिक होती है, इसलिए इसका प्रभाव कई लोगों को अधिक तेज महसूस होता है। चाय का प्रभाव अपेक्षाकृत हल्का और धीरे महसूस हो सकता है।
कुछ पुरानी बीमारियों के जोखिम से संबंध
कुछ शोधों में सीमित मात्रा में चाय या कॉफी पीने को टाइप-2 मधुमेह, हृदय रोग और स्ट्रोक जैसे कुछ रोगों के कम जोखिम से जोड़ा गया है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि चाय या कॉफी इन बीमारियों से बचाव की गारंटी देती है।
लिवर के संदर्भ में संभावित लाभ
कॉफी के सेवन और लिवर स्वास्थ्य के बीच संबंध पर भी कई अध्ययन हुए हैं। कुछ शोधों में नियमित कॉफी सेवन को लिवर से संबंधित कुछ समस्याओं के कम जोखिम से जोड़ा गया है। हालांकि इसे फैटी लिवर का निश्चित इलाज या लिवर की “गंदगी साफ करने” वाला उपाय मानना सही नहीं है।
मानसिक स्वास्थ्य और चयापचय
कैफीन और चाय-कॉफी में मौजूद जैव सक्रिय यौगिकों को कुछ अध्ययनों में अवसाद, पार्किंसंस रोग और अन्य न्यूरोलॉजिकल स्थितियों के जोखिम से जोड़ा गया है। कैफीन शरीर की ऊर्जा खपत और सतर्कता पर भी प्रभाव डाल सकता है, लेकिन वजन कम करने के लिए केवल चाय या कॉफी पर निर्भर रहना उचित नहीं है।
अधिक चाय-कॉफी पीने के नुकसान
लाभ तभी संभव हैं जब सेवन संतुलित हो। अत्यधिक कैफीन लेने या गलत समय पर चाय-कॉफी पीने से कई लोगों को परेशानी हो सकती है।
नींद खराब और बेचैनी
कैफीन तंत्रिका तंत्र को उत्तेजित करता है। अधिक मात्रा लेने पर कुछ लोगों में बेचैनी, घबराहट, चिंता, चिड़चिड़ापन और दिल की धड़कन तेज महसूस हो सकती है। शाम या रात में कैफीन लेने से नींद आने में परेशानी भी हो सकती है।
एसिडिटी और पाचन की परेशानी
कुछ लोगों में चाय या कॉफी, खासकर खाली पेट लेने पर, एसिडिटी, सीने में जलन और पेट की परेशानी बढ़ा सकती है। अत्यधिक चाय के सेवन से टैनिन जैसे यौगिकों के कारण कुछ लोगों में पाचन संबंधी असुविधा भी हो सकती है।
आयरन के अवशोषण पर असर
चाय में मौजूद कुछ यौगिक भोजन से मिलने वाले गैर-हीम आयरन के अवशोषण को कम कर सकते हैं। इसलिए जिन लोगों में आयरन की कमी या एनीमिया की समस्या है, उन्हें भोजन के साथ या तुरंत बाद चाय पीने की आदत पर डॉक्टर या आहार विशेषज्ञ से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।
कैफीन पर निर्भरता
जो लोग लंबे समय तक अधिक मात्रा में कैफीन लेते हैं, उनमें अचानक सेवन कम करने पर सिरदर्द, थकान, चिड़चिड़ापन या कमजोरी जैसी शिकायतें हो सकती हैं। इसलिए मात्रा कम करनी हो तो धीरे-धीरे कमी करना कई लोगों के लिए आसान रहता है।
ब्लड प्रेशर पर अस्थायी असर
कैफीन कुछ लोगों में थोड़े समय के लिए रक्तचाप बढ़ा सकता है। जिन लोगों को उच्च रक्तचाप या कैफीन के प्रति अधिक संवेदनशीलता है, उन्हें अपनी व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार सेवन की मात्रा तय करनी चाहिए।
चाय और कॉफी में क्या अंतर है?
| विशेषता | चाय | कॉफी |
|---|---|---|
| कैफीन | आम तौर पर कम | आम तौर पर अधिक |
| प्रमुख यौगिक | कैटेचिन, थियाफ्लेविन्स | पॉलीफेनॉल्स |
| प्रभाव | अपेक्षाकृत हल्की और स्थिर सतर्कता | अधिक तेज सतर्कता और ऊर्जा का अनुभव |
| अधिक सेवन की समस्या | एसिडिटी, नींद और पाचन संबंधी परेशानी हो सकती है | बेचैनी, धड़कन और अनिद्रा हो सकती है |
यह तुलना सामान्य है। वास्तविक कैफीन की मात्रा चाय या कॉफी के प्रकार, मात्रा, बनाने की विधि और कप के आकार के अनुसार काफी बदल सकती है।
चाय-कॉफी पीने का सही तरीका क्या हो सकता है?
सबसे महत्वपूर्ण बात पेय पदार्थ को बहुत गर्म अवस्था में न पीना है। कप में डालने के तुरंत बाद उसे पीने के बजाय कुछ देर ठंडा होने दें। इससे मुंह और ग्रासनली को अत्यधिक गर्मी से बचाने में मदद मिल सकती है।
खाली पेट लेने से बचें
यदि चाय या कॉफी से आपको एसिडिटी होती है तो सुबह उठते ही खाली पेट इसका सेवन करने के बजाय पहले पानी पिएं और कुछ हल्का भोजन करने के बाद लें।
मात्रा पर नजर रखें
कैफीन की कुल मात्रा पर ध्यान देना जरूरी है। दिए गए विवरण में सामान्य तौर पर दिन में 2 से 3 कप और लगभग 200 से 300 मिलीग्राम कैफीन तक सीमित रहने की सलाह दी गई है, लेकिन व्यक्तिगत सहनशीलता अलग-अलग होती है।
गर्भावस्था, कुछ हृदय संबंधी स्थितियों, चिंता, नींद की समस्या या कुछ दवाओं के इस्तेमाल की स्थिति में कैफीन की उचित मात्रा अलग हो सकती है।
चीनी कम करें
बहुत अधिक चीनी वाली चाय या कॉफी का नियमित सेवन अतिरिक्त कैलोरी बढ़ा सकता है। इसलिए जरूरत के अनुसार चीनी कम करना बेहतर विकल्प हो सकता है।
ब्लैक कॉफी या कम दूध-चीनी वाली चाय कई लोगों के लिए कम कैलोरी वाला विकल्प हो सकती है। हालांकि दूध को कॉफी में मिलाने से स्वास्थ्य पर होने वाले प्रभावों के बारे में दिए गए सभी दावों को सामान्य नियम नहीं माना जाना चाहिए।
रात में कैफीन से दूरी
यदि कैफीन से नींद प्रभावित होती है तो सोने से कम से कम छह घंटे पहले इसका सेवन बंद करना उपयोगी हो सकता है। संवेदनशील लोगों को इससे भी पहले कैफीन बंद करने की आवश्यकता पड़ सकती है।
सबसे जरूरी बात: तापमान को नजरअंदाज न करें
चाय या कॉफी पीने वालों के लिए इस अध्ययन से निकलने वाली प्रमुख सावधानी पेय की गर्मी को लेकर है। यदि कप से तेज भाप निकल रही है और पेय मुंह में लेते ही जलन महसूस होती है, तो उसे कुछ देर ठंडा होने देना बेहतर है।
दिन में कई कप चाय-कॉफी पीने की आदत हो तो मात्रा पर भी नजर रखें। पेय को बहुत गर्म न पीना, कैफीन की कुल मात्रा नियंत्रित रखना, पर्याप्त पानी पीना, संतुलित भोजन करना और नींद का ध्यान रखना स्वस्थ जीवनशैली का हिस्सा है।
साथ ही, चाय या कॉफी को कैंसर का एकमात्र कारण मानना सही नहीं होगा। ग्रासनली के कैंसर का जोखिम कई कारकों से प्रभावित हो सकता है। लगातार निगलने में परेशानी, भोजन अटकने जैसा महसूस होना, बिना वजह वजन कम होना, लंबे समय तक सीने या गले में असहजता अथवा अन्य लगातार बने रहने वाले लक्षण हों तो चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है।
निष्कर्ष यही है कि चाय और कॉफी का आनंद लिया जा सकता है, लेकिन उसे बहुत गर्म पीने की आदत से बचना और कुल कैफीन सेवन को संतुलित रखना ज्यादा समझदारी भरा तरीका है।
















































