टीवी से पहले संघर्ष का दौर: टीवी की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले अभिनेता विवेक दहिया आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, लेकिन अभिनय के क्षेत्र में सफलता हासिल करने से पहले उनकी जिंदगी में संघर्ष का एक ऐसा दौर भी रहा है, जब वह ब्रिटेन में पढ़ाई कर रहे थे। उस समय उन्होंने अपने खर्चों के लिए परिवार पर आर्थिक रूप से निर्भर रहने के बजाय खुद कमाने का रास्ता चुना। हाल ही में एक इंटरव्यू में विवेक ने विदेश में बिताए अपने छात्र जीवन की यादें साझा कीं और बताया कि पढ़ाई के साथ उन्होंने कई तरह के छोटे-बड़े काम किए। उनके संघर्ष से जुड़ा सबसे दिलचस्प किस्सा डोमिनोज के लिए पिज्जा डिलीवरी करने का रहा, जब वह ग्राहकों के घर पिज्जा पहुंचाने के लिए बीएमडब्ल्यू कार का इस्तेमाल करते थे।
18 साल की उम्र में पहुंचे ब्रिटेन: विवेक दहिया ने बताया कि जब वह करीब 18 साल के थे, तब ब्रिटेन में पढ़ाई कर रहे थे और उसी दौरान उन्होंने अपने खर्चों के लिए खुद कमाने का फैसला किया। नौकरी की तलाश शुरू करते हुए उन्होंने अपना सीवी प्रिंट कराया और शहर के अलग-अलग स्टोर्स में जाकर उसे जमा करना शुरू किया। विदेश में पढ़ाई के दौरान बिना अनुभव के किसी बड़ी या गंभीर नौकरी की शुरुआत करना उनके लिए आसान नहीं था। विवेक के मुताबिक उस समय कई छात्र अपने सीवी में भारत में गैर-सरकारी संगठनों के साथ काम करने जैसी चीजों का अनुभव भी लिखते थे, क्योंकि शुरुआती नौकरी पाने के लिए सीवी में किसी तरह का अनुभव दिखाना जरूरी माना जाता था। उन्होंने बताया कि उस दौर में ब्रिटेन में पढ़ने वाले कई छात्रों के बीच इस तरह अनुभव दर्शाने का तरीका आम था।
बारटेंडर बनने का सपना टूटा: विदेश में नौकरी तलाशने के दौरान विवेक की नजर एक बार के बाहर बारटेंडर की नौकरी की वैकेंसी पर पड़ी। उन्हें यह काम काफी आकर्षक और ग्लैमरस लगा था और वह कॉकटेल बनाने तथा ग्लास के साथ काम करने की कल्पना कर रहे थे। वह अपने एक दोस्त के साथ वहां नौकरी मांगने पहुंचे और दोनों को उम्मीद थी कि उन्हें बारटेंडर के तौर पर काम करने का अवसर मिलेगा। हालांकि वहां के मैनेजर ने दोनों को बारटेंडर की जिम्मेदारी देने से इनकार कर दिया और कहा कि रात शुरू होने के बाद वे दूसरे कामों में मदद कर सकते हैं। दोनों दोस्तों ने नौकरी स्वीकार कर ली, लेकिन काम शुरू होने के बाद उन्हें जल्द ही समझ आ गया कि यह वैसा बिल्कुल नहीं था जैसा उन्होंने सोचा था।
टेबल से कूड़ेदान तक काम: विवेक ने बताया कि बार में उन्हें स्प्रे और कपड़े की मदद से टेबल साफ करने की जिम्मेदारी दी गई। रात बढ़ने के साथ काम और मुश्किल होता गया तथा उन्हें फर्श पर पड़ी टूटी बोतलों और कांच के टुकड़ों को भी उठाना पड़ा। बार-बार झुककर काम करने के कारण कुछ ही समय में उनकी कमर में दर्द होने लगा। इसके बाद मैनेजर ने उन्हें कूड़ेदानों से कचरा उठाने का काम भी सौंप दिया। काम का वास्तविक स्वरूप उनकी उम्मीदों से इतना अलग था कि विवेक और उनके दोस्त ने वहां से नौकरी छोड़ने का फैसला कर लिया। विवेक के दोस्त ने मैनेजर से कहा कि वह काम छोड़ रहा है और इसके बाद विवेक भी उसके साथ वहां से निकल गए।
कई जगहों पर किया काम: ब्रिटेन में पढ़ाई के दौरान विवेक का संघर्ष केवल बार की नौकरी तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अलग-अलग जगहों पर काम करके अपने खर्च पूरे करने और खुद को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश जारी रखी। विवेक ने बताया कि उन्होंने टॉयलेट पेपर बनाने वाली फैक्ट्री में भी काम किया था। इसके अलावा उन्होंने एलजी टीवी फैक्ट्री और कॉल सेंटर में भी नौकरी की। इन कामों का उनके अभिनय करियर से सीधा संबंध नहीं था, लेकिन छात्र जीवन में इनसे उन्हें अपनी जरूरतें पूरी करने और अपने पैरों पर खड़े होने का अनुभव मिला। इसी दौर में उन्होंने डोमिनोज के लिए डिलीवरी बॉय के तौर पर भी काम किया, जहां से उनके संघर्ष की कहानी का सबसे अनोखा किस्सा सामने आया।
BMW से पहुंचाते थे पिज्जा: विवेक ने बताया कि डोमिनोज के लिए पिज्जा डिलीवर करते समय उनके पास बीएमडब्ल्यू कार थी और वह उसी कार से ग्राहकों के घर पिज्जा पहुंचाने जाते थे। जब वह पिज्जा लेकर किसी ग्राहक के दरवाजे पर पहुंचते और बीएमडब्ल्यू से उतरते, तो कई बार लोग उन्हें देखकर हैरान रह जाते थे। एक तरफ उनके पास महंगी कार थी और दूसरी तरफ छात्र जीवन के खर्च पूरे करने के लिए वह पिज्जा डिलीवरी का काम कर रहे थे। विवेक के अनुसार अलग-अलग तरह की नौकरियों के इन अनुभवों ने उन्हें अनुशासन, काम के प्रति ईमानदारी और कार्यस्थल पर सही व्यवहार जैसी महत्वपूर्ण बातें सीखने में मदद की। उन्होंने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए माना कि इन छोटे-बड़े कामों ने उन्हें मेहनत को करीब से समझने और जिंदगी को अलग नजरिए से देखने का अनुभव दिया।















































