संसद की कार्रवाई के दौरान इस हफ्ते दो दर्जन से अधिक सांसदों को सस्पेंड किया जा चुका है। इस कार्रवाई ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। एक तरफ कहा जा रहा है कि इन सांसदों का व्यवहार संसदीय गरिमा के अनुकूल नहीं था, इसलिए उन पर गाज गिरी। वहीं विपक्ष का कहना है कि इन सांसदों पर अनावश्यक रूप से कड़ी कार्रवाई की गई है। दोनों पक्षों की बहस के बीच एक रिपोर्ट भी है, जिसके आंकड़े दिखाते हैं कि एनडीए शासनकाल के दौरान सांसदों के निलंबन की घटनाओं में इजाफा हुआ है।
एनडीए सरकार में सबसे ज्यादा
इस रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में एनडीए के सत्ता के आने के बाद सांसदों के निलंबन में 170 फीसदी का इजाफा हुआ है। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2006 के मॉनसून सत्र और फरवरी 2014 के बीच करीब 51 सांसदों को दोनों सदनों से सस्पेंड किया गया। वहीं अगस्त 2015 से अब तक यह आंकड़ा बढ़कर 139 सांसदों तक पहुंच गया है। इस मामले ने तूल तब पकड़ लिया जब मंगलवार को राज्यसभा के 19 विपक्षी सांसदों को शेष हफ्ते के लिए निलंबित कर दिया गया। यह लोग महंगाई और जीएसटी में इजाफे पर तत्काल चर्चा की मांग को लेकर हंगामा कर रहे थे। इसके बाद इन सांसदों ने आरोप लगाया कि देश में लोकतंत्र को निलंबित कर दिया गया है। वहीं इसके अगले दिन एक सांसद, जबकि गुरुवार को तीन अन्य को निलंबित कर दिया गया। वहीं इससे पहले सोमवार को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने चार कांग्रेस सदस्यों को पूरे मॉनसून सत्र के लिए सस्पेंड कर दिया था।





































