भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष के पंद्रह दिनों को ही पितृपक्ष कहा जाता है।
इस बार पितृपक्ष का प्रारंभ 10 सितंबर से हो चुका है। पितृ पक्ष के दिनों में लोग अपने पूर्वजों की मृत्युतिथि पर श्राद्ध संपन्न कराते हैं। धार्मिक मान्यता है कि पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पिंडदान सीधे पितरों तक पहुंचता है। माना जाता है कि पितृ पक्ष के दौरान यमराज भी पितरों की आत्मा को मुक्त कर देते हैं, ताकि वे धरती पर अपने वंशजों के बीच रहकर अन्न और जल ग्रहण कर संतुष्ट हो सकें। पितृपक्ष के दिनों में लोग अपने पितरों को याद कर उनके नाम पर उनका पिंडदान कर्म, तर्पण और दान आदि करते हैं। मान्यता है कि जब लोग अपना शरीर त्याग कर चले जाते हैं, तब उनकी आत्मा की शांति के लिए गयाजी में श्रद्धा से पिंडदान और तर्पण किया जाता है। कहते हैं गयाजी में पिंडदान करने से पितरों को शक्ति मिलती है और वह शक्ति पितरों को परलोक पहुंचाने में मदद करती है। पिंडदान व श्राद्ध कर्म में बिहार का गया तीर्थ सर्वोपरि है। आइए जानते हैं गयाजी में श्राद्ध कर्म करने के पीछे के कारण
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गया में पिंडदान का महत्व
पितृपक्ष में देश में 55 ऐसे स्थान हैं जिसमें पिंडदान और तर्पण किए जाने की परंपरा है लेकिन गया में पिंडदान का अलग महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार जो श्रद्धालु गया में पिंडदान करते हैं उनके 108 कुल और 7 पीढ़ियों का उद्धार होता है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीहरि यहां पर पितृ देवता के रूप में विराजमान रहते हैं। इसीलिए इसे पितृ तीर्थ भी कहा जाता है। गया की इसी महत्ता के कारण लाखों लोग हर साल यहां पर अपने पूर्वजों का पिंडदान करने आते हैं।
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- श्रीराम जी के वन जाने के बाद दशरथ जी का मृत्यु हो गयी थी। इस दौरान सीता जी ने गया में ही दशरथ जी की प्रेत आत्मा को पिंड दिया था। इसीलिए उस समय से इस स्थान को तर्पण और पिंडदान के लिए सर्वोपरि माना जाता है।
- ब्रह्मा जी ने गयासुर को वरदान दिया था, जो भी लोग गया में पितृपक्ष के अवधि में इस स्थान पर अपने पितर को पिंडदान करेगा उनको मोक्ष मिलेगा।
- गया में फल्गु नदी में स्पर्श करने से पितर को मोक्ष मिलता है। इसके साथ ही गया क्षेत्र में तिल के साथ समी पत्र में पिंड देने से पितर का अक्षयलोक को प्राप्त होता है।
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- मान्यता है गया में पिंडदान करने से कोटि तीर्थ तथा अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। यहां पर श्राद्ध करने वाले को कोई काल में पिंड दान कर सकते है।
- गया जी में माता सीता ने तर्पण किया था। गया में पिंडदान करने से आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए इस स्थान को मोक्ष स्थली भी कहा जाता है।
- गया में भगवान विष्णु स्वयं पितृदेव के रूप में निवास करते हैं। गया में श्राद्ध कर्म और तर्पण विधि करने से कुछ शेष नहीं रह जाता और व्यक्ति पितृऋण से मुक्त हो जाता है।



































