ज्योतिष शास्त्र में सभी 9 ग्रहों की अपनी-अपनी खास विशेषताएं होती हैं। जिनमें से कुछ ग्रह बहुत ही शुभ तो कुछ अशुभ फल देने वाले होते हैं।
सभी 9 ग्रहों में एक शनि ग्रह हैं जिनका ज्योतिष शास्त्र और धार्मिक लिहाज से विशेष महत्व होता है। सभी नौ ग्रहों में शनि को न्यायाधिपति और कर्मफल दाता ग्रह माना गया है। यह व्यक्तियों को उसके द्वारा किए गए कार्यो के आधार पर ही शुभ या अशुभ फल प्रदान करते हैं। शनि सभी ग्रहों में सबसे धीमी चाल से चलने वाले ग्रह हैं जिस कारण से इनका प्रभाव जातकों के ऊपर लंबे समय तक रहता है। शनि का नाम आते ही लोगों के मन में डर पैदा हो जाता है। शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या बहुत ही मारक होती है। जिन लोगों के ऊपर शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या आ जाती है उनके जीवन में उन्हें तमाम तरह की परेशानियों और बीमारियों का सामना करना पड़ता है। शनि की टेढ़ी नजर से व्यक्ति को उसके हर एक काम में असफलताएं प्राप्त होने लगती हैं। ज्योतिष में शनि की तिरछी नजर और चाल बहुत ही मायने रखती हैं। शनि की द्दष्टि बहुत ही हानिकारक मानी गई है। शनि बहुत ही मंद गति से एक से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं। ढ़ाई वर्षों में शनिदेव एक राशि से दूसरी राशि में जाते हैं। आइए जानते हैं शनि की द्दष्टि को क्यों अशुभ माना गया है और यह सबसे धीमी चाल से क्यों चलते हैं, क्या है इसके पीछे की कथा?
क्यों मानी जाती है शनि की अशुभ द्दष्टि ?
पौराणिक कथा के अनुसार जब शनिदेव युवा हुए तो उनके पिता सूर्यदेव ने उनका विवाह चित्ररथ की कन्या से करवा दिया। वह सती-साध्वी नारी सतत तपस्या में रत रहने वाली और परम तेजस्विनी थी। एक दिन वह ऋतु स्नान कर पुत्र प्राप्ति की इच्छा लिए शनिदेव के पास पहुंची,पर शनिदेव तो भगवान श्री कृष्ण के ध्यान में लीन थे,उन्हें ब्राह्य ज्ञान बिल्कुल नहीं था। उनकी पत्नी प्रतीक्षा करके थक गई,अपना ऋतुकाल निष्फल जानकर उन्होंने क्रोध में आकर शनिदेव को श्राप दे दिया कि ‘आज से तुम जिसकी ओर दृष्टि करोगे,उसका अंमगल हो जाएगा’। पत्नी के श्राप के कारण तभी से शनिदेव अपना सिर नीचा करके रहने लगे,क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि किसी का अनिष्ट हो।
शनि की धीमी चाल के पीछे की कथा ?
पुराणों के अनुसार भगवान शंकर ने अपने परम भक्त दधीचि मुनि के यहां पुत्र रूप में जन्म लिया। भगवान ब्रह्मा ने इनका नाम पिप्पलाद रखा,लेकिन जन्म से पहले ही इनके पिता दधीचि मुनि की मृत्यु हो गईऔर माँ सती हो गईं। युवा होने पर जब पिप्पलाद ने देवताओं से अपने माता-पिता की मृत्यु का कारण पूछा तो उन्होंने शनिदेव की कुदृष्टि को इसका कारण बताया। पिप्पलाद यह सुनकर बड़े क्रोधित हुए और उन्होंने शनिदेव के ऊपर अपने ब्रह्म दंड का प्रहार किया। शनिदेव ब्रह्म दंड का प्रहार नहीं सह सकते थे इसलिए वे उससे डर कर भागने लगे। तीनों लोकों की परिक्रमा करने के बाद भी ब्रह्म दंड ने शनिदेव का पीछा नहीं छोड़ा और उनके पैर पर आकर लगा। ब्रह्म दंड पैर पर लगने से शनिदेव लंगड़े हो गए, तब देवताओं ने पिप्पलाद मुनि से शनिदेव को क्षमा करने के लिए कहा। देवताओं ने कहा कि शनिदेव तो न्यायाधीश हैं और वे तो अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं। देवताओं के आग्रह पर पिप्पलाद मुनि ने शनिदेव को क्षमा कर दिया और वचन लिया कि शनि जन्म से लेकर 16 साल तक की आयु तक के शिवभक्तों को कष्ट नहीं देंगे यदि ऐसा हुआ तो शनिदेव भस्म हो जाएंगे। तभी से पिप्पलाद मुनि का स्मरण करने मात्र से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है।



































