पश्चिमी एशिया में चीन की गहरी दिलचस्पी पिछले हफ्ते सामने आई जब उसने मध्यस्थता कर सऊदी अरब और ईरान की दोस्ती कराई. यह एक महत्वाकांक्षी दांव के तौर पर देखा जा रहा है। चीन का यह कदम लंबे तक इस क्षेत्र में राजनीतिक प्रभाव की मंशा जो जाहिर करता है।
चीन की इस पहल से अमेरिका की सिरदर्दी तो बढ़ी है साथ ही साथ भारत के लिए भी पश्चिमी एशिया जियो पॉलिटिकल दोहराव सामने आ रहे हैं।
कभी दुश्मन थे ईरान और सऊदी
2014 से यमन में शुरू हुआ छद्म युद्ध में दोनों देश – ईरान और सऊदी अरब के लिए गले की फांस बन गया था। जहां ईरान हौथी विद्रोहियों का समर्थन कर रहा था, और सऊदी अमेरिका की तरफ से समर्थित खाड़ी देशों के गठबंधन का नेतृत्व कर रहा था। अप्रैल 2022 में संयुक्त राष्ट्र की तरफ से समझौता वार्ता लागू हुई, और पिछले अक्टूबर में छह महीने के युद्धविराम के समाप्त होने के बाद भी लड़ाई फिर से शुरू नहीं हुई है।
किसी को विश्वास नहीं है कि यह सौदा सुन्नी राजशाही और शिया गणराज्य के बीच सभी मतभेदों को समाप्त कर देगा। अब इस स्थिति में चीन में तय किए गए समझौते से यमन में स्थायी शांति हो सकती है। साथ ही साथ लेबनान, सीरिया और अन्य क्षेत्र में सऊदी-ईरान की शत्रुता भी समाप्त हो सकती है।
अमेरिका और भारत ने किया बेमन से स्वागत?
उधर अमेरिका ने चीन के साथ अपने टकराव पूर्ण संबंधों के बावजूद समझौते का तुरंत स्वागत किया। अमेरिका ने कहा कि अगर यह स्थायी शांति लाती है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसमें किसने मध्यस्थता की।
दुनिया के बाकी हिस्सों की तरह चीन के नए अवतार से अचंभित भारत को इस क्षेत्र में अपने प्रमुख विरोधी की तरफ से की जा रही दलाली किए गए सौदे पर अपनी चुप्पी तोड़ने में एक सप्ताह लग गया। भारत ने कहा, “भारत के पश्चिम एशिया के विभिन्न देशों के साथ अच्छे संबंध हैं और इस क्षेत्र में हमारे स्थायी हित हैं। भारत ने मतभेदों को हल करने के लिए हमेशा बातचीत और कूटनीति की वकालत की है।”
ऐसे में ड्रैगन की चाल का के खिलाफ भारत और साथ ही साथ अमेरिका को कौन सा कदम उठाना होगा जिससे पश्चिमी एशिया में चीन का प्रभाव कम हो सके।



































