नई दिल्ली: युद्ध की आधुनिक तकनीक में ‘बंकर बस्टर’ बमों को सबसे घातक माना जाता है, लेकिन ईरान की भौगोलिक स्थिति ने इन दावों पर सवालिया निशान लगा दिया है। अमेरिका के मशहूर B-52 बॉम्बर्स भी ईरान के मिसाइल सबवे सिस्टम के सामने बेअसर नजर आ रहे हैं।
ग्रेनाइट की ताकत का गणित ईरान की इन सुरंगों के ऊपर मौजूद ग्रेनाइट की परत सामान्य कंक्रीट से लगभग 25 गुना अधिक मजबूत है। सैन्य इंजीनियरिंग के नजरिए से, इतनी गहराई और कठोरता को भेदने के लिए जो ऊर्जा चाहिए, वह फिलहाल किसी भी पारंपरिक मिसाइल या जेट के पास नहीं है।
- ईरानी बेस की गहराई: 440 से 500 मीटर।
- अमेरिकी क्षमता: अधिकतम 60 मीटर मिट्टी या 18 मीटर कंक्रीट।
रणनीतिक बदलाव 1990 के दशक से शुरू हुई ईरान की यह भूमिगत रणनीति अब उसके अस्तित्व की ढाल बन चुकी है। सतह पर मौजूद लॉन्चरों को भले ही इजराइली डिफेंस सिस्टम निशाना बना लें, लेकिन ईरान की मुख्य प्रहार क्षमता इन अभेद्य सुरंगों के भीतर सुरक्षित है। यह आधुनिक युद्ध कौशल का एक ऐसा उदाहरण है जहाँ ‘भूगोल’ सबसे बड़ा हथियार बनकर उभरा है।





































