वैश्विक तनाव के बीच चीन का अप्रत्याशित प्रवेश ईरान और अमेरिका के मध्य बढ़ते हुए सैन्य और राजनीतिक तनाव ने अब एक नया रूप ले लिया है, क्योंकि इस शतरंज की बाजी में चीन ने अपनी निर्णायक चाल चल दी है। बीजिंग ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ की नाकेबंदी की चर्चाओं पर विराम लगाते हुए अमेरिका को सख्त चेतावनी जारी की है। चीनी सरकार ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि ईरान के साथ उसके आर्थिक और रणनीतिक संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे राष्ट्रीय हितों का हिस्सा हैं। चीन ने साफ कर दिया है कि यदि किसी तीसरी महाशक्ति ने इन संबंधों को बाधित करने या कमजोर करने की चेष्टा की, तो चीन इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानेगा और इसके परिणाम अत्यंत भयावह होंगे।
रक्षा मंत्री का सख्त बयान और अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग की सुरक्षा चीन के रक्षा मंत्री डॉन्ग जुन ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि चीन अब किसी भी राष्ट्र की “एकतरफा दादागीरी” को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। उन्होंने विशेष रूप से यह उल्लेख किया कि होर्मुज़ का जलमार्ग चीन की ऊर्जा सुरक्षा के लिए जीवनरेखा के समान है और इसे किसी भी हाल में खुला रखा जाना अनिवार्य है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस मार्ग में सैन्य बाधा पहुंचाई गई, तो चीन चुपचाप तमाशा नहीं देखेगा। चीनी विदेश मंत्रालय ने भी अमेरिका की संभावित नाकेबंदी को एक अदूरदर्शी और खतरनाक कदम बताया है, जिससे न केवल क्षेत्रीय तनाव बढ़ेगा बल्कि संपूर्ण वैश्विक आर्थिक ढांचा चरमरा सकता है।
टैरिफ वार की धमकी और चीन का जवाबी आदेश ईरान को हथियारों की आपूर्ति के मुद्दे पर अमेरिका और चीन के बीच ठन गई है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दिए जाने के बावजूद, चीन ने स्पष्ट किया है कि वह अपने अंतरराष्ट्रीय समझौतों से पीछे नहीं हटेगा। इसके प्रत्युत्तर में चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग ने एक विशेष आदेश पारित किया है, जो चीनी हितों की रक्षा के लिए एक ढाल का काम करेगा। यह आदेश कहता है कि यदि कोई भी विदेशी शक्ति अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए चीन के विकास पथ या सुरक्षा व्यवस्था में दखलअंदाजी करेगी, तो चीन आनुपातिक और प्रभावी जवाबी कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र और तैयार है।
राष्ट्रपति जिनपिंग की अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को नसीहत चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने वाशिंगटन का नाम लिए बिना यह स्पष्ट कर दिया है कि चीन की कूटनीति अब रक्षात्मक नहीं बल्कि सक्रिय है। उन्होंने विश्व के नेताओं को याद दिलाया कि अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करना सभी की जिम्मेदारी है, न कि केवल छोटे देशों की। जिनपिंग ने बल देकर कहा कि चीन किसी भी दबाव में झुकने वाला राष्ट्र नहीं है। उन्होंने अमेरिका को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने और वैश्विक सुरक्षा एवं विकास के बीच सामंजस्य बिठाने की सलाह दी। चीनी नेतृत्व का यह कड़ा रुख दर्शाता है कि वे अब मध्य पूर्व के मामलों में एक मूक दर्शक बनकर रहने के बजाय एक प्रमुख खिलाड़ी की भूमिका निभाना चाहते हैं।
UAE के साथ बातचीत और द्विपक्षीय संप्रभुता का सम्मान अबू धाबी के क्राउन प्रिंस खालिद बिन मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान की बीजिंग यात्रा के दौरान चीन-ईरान संबंधों पर चर्चा एक महत्वपूर्ण बिंदु रही। जब क्राउन प्रिंस ने ईरान के साथ चीन की नजदीकियों पर सवाल उठाए, तो राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बहुत ही सधे हुए लेकिन सख्त शब्दों में कहा कि दोस्ती अपनी जगह है और राष्ट्र की संप्रभुता अपनी जगह। उन्होंने स्पष्ट किया कि UAE चीन का साझेदार जरूर है, लेकिन वह यह तय नहीं कर सकता कि चीन किसके साथ अपने संबंध रखेगा। जिनपिंग ने खाड़ी देशों को परामर्श दिया कि वे ईरान के साथ आपसी संवाद बढ़ाएं, क्योंकि मध्य पूर्व की शांति के लिए आपसी सहयोग ही एकमात्र मार्ग है।
आर्थिक रणनीतियां और रूस के साथ बढ़ती जुगलबंदी चीन की वैश्विक रणनीति का एक बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व में अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को सुरक्षित करना है। चीन के लिए सऊदी अरब, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात से तेल की आपूर्ति, साथ ही कतर से पेट्रोकेमिकल और गैस का आयात उसकी विकास दर के लिए अपरिहार्य है। अरब देशों के साथ चीन का 400 अरब डॉलर का वार्षिक व्यापार उसे इस क्षेत्र में एक अनिवार्य शक्ति बनाता है। अमेरिका के घटते प्रभाव का लाभ उठाते हुए चीन अब रूस के साथ मिलकर इस क्षेत्र में एक नई व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देना और मध्य पूर्व के संसाधनों पर अपनी पकड़ को और अधिक पुख्ता करना है।



































