सनातन धर्म में प्रदोष व्रत का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। यह व्रत भगवान शिव और मां पार्वती को समर्पित होता है। मान्यता है कि प्रदोष काल में विधि-विधान से महादेव और माता पार्वती की पूजा करने से जीवन में सुख-शांति आती है और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। भक्त इस दिन उपवास रखते हैं और संध्या के समय प्रदोष काल में शिव परिवार की पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धापूर्वक प्रदोष व्रत करने से जीवन में मौजूद भय और परेशानियां कम होती हैं तथा सकारात्मकता, सुख और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। सितंबर महीने का दूसरा प्रदोष व्रत भी इसी क्रम में विशेष माना जा रहा है।
सितंबर का दूसरा प्रदोष व्रत कब: वैदिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 23 सितंबर 2026 की रात 10 बजकर 54 मिनट पर शुरू होगी। वहीं त्रयोदशी तिथि का समापन 24 सितंबर 2026 की रात 11 बजकर 18 मिनट पर होगा। प्रदोष व्रत में भगवान शिव की पूजा प्रदोष काल में करने का विधान है और इस बार प्रदोष काल 24 सितंबर को पड़ रहा है। इसलिए सितंबर महीने का दूसरा प्रदोष व्रत 24 सितंबर 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। गुरुवार के दिन पड़ने के कारण इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाएगा।
गुरु प्रदोष व्रत का महत्व: सप्ताह के अलग-अलग दिनों में पड़ने वाले प्रदोष व्रत का धार्मिक परंपराओं में अलग महत्व बताया गया है। गुरुवार को पड़ने वाले प्रदोष को गुरु प्रदोष कहा जाता है। इस दिन भगवान शिव के साथ मां पार्वती की आराधना करने से भक्त आध्यात्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा की कामना करते हैं। प्रदोष काल में शिवलिंग का पूजन, जलाभिषेक और भगवान शिव को प्रिय वस्तुओं का अर्पण विशेष रूप से किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया प्रदोष व्रत साधक के जीवन में सुख-समृद्धि और मानसिक शांति लेकर आ सकता है।
प्रदोष काल में पूजा का महत्व: प्रदोष व्रत में पूजा के लिए प्रदोष काल को सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है। सूर्यास्त के आसपास का यह समय भगवान शिव की उपासना के लिए विशेष माना गया है। भक्त इस दौरान स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और भगवान शिव तथा मां पार्वती की पूजा करते हैं। शिवलिंग पर जल अर्पित करने के साथ बेलपत्र, फूल और अन्य पूजन सामग्री चढ़ाई जाती है। इसके बाद शिव मंत्रों का जाप और आरती की जाती है। मान्यता है कि प्रदोष काल में की गई शिव आराधना से भक्तों को महादेव का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन की परेशानियों से उबरने का आत्मबल मिलता है।
त्रयोदशी तिथि का समय: इस बार भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी 23 सितंबर की रात 10 बजकर 54 मिनट से प्रारंभ होकर 24 सितंबर की रात 11 बजकर 18 मिनट तक रहेगी। चूंकि प्रदोष व्रत का निर्धारण प्रदोष काल में पड़ने वाली त्रयोदशी तिथि के आधार पर किया जाता है, इसलिए व्रत 24 सितंबर को रखा जाएगा। 24 सितंबर को गुरुवार होने की वजह से यह गुरु प्रदोष व्रत होगा। व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को पूजा के लिए स्थानीय पंचांग के अनुसार प्रदोष काल का समय ध्यान में रखना चाहिए और उसी अवधि में भगवान शिव की पूजा संपन्न करनी चाहिए।
शुभ मुहूर्त:-
- प्रदोष काल पूजा का समय: शाम 06:26 बजे से रात 08:49 बजे तक (कुल अवधि: 2 घंटे 23 मिनट)।
- त्रयोदशी तिथि समापन: 24 सितंबर 2026 को रात 11:18 बजे।
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:52 बजे से सुबह 05:40 बजे तक।
- अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:06 बजे से दोपहर 12:55 बजे तक।
आवश्यक पूजा सामग्री:-
- भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति या तस्वीर
- सफेद और पीले पुष्प, माला
- बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र
- कच्चा दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल (पंचामृत के लिए)
- अक्षत (साबुत चावल), रोली, चंदन
- धूप, दीप (दीपक), कपूर, माचिस
- जनेऊ, कलावा (मूली)
- मौसमी फल, मिठाई या खीर का भोग
- पीले वस्त्र या पीला पीतांबर (गुरुवार होने के कारण विशेष महत्व)
पूजा विधि:-
- स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। साफ वस्त्र पहनें और व्रत का संकल्प लें।
- सफाई: घर के मंदिर को साफ करें और गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
- शिव अभिषेक: प्रदोष काल (शाम के समय) में शिव मंदिर जाएं या घर पर ही शिवलिंग का गंगाजल, दूध और पंचामृत से अभिषेक करें।
- श्रृंगार और अर्पण: शिवलिंग या शिव परिवार को चंदन, रोली, बेलपत्र, धतूरा और पीले फूल अर्पित करें।
- मंत्र जाप: ‘ॐ नमः शिवाय’ या महामृत्युंजय मंत्र का कम से कम एक माला जाप करें।
- कथा और आरती: गुरु प्रदोष व्रत की कथा सुनें या पढ़ें। अंत में कपूर या दीपक जलाकर भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें।
गुरु प्रदोष व्रत कथा:-
प्राचीन समय की बात है, एक नगर में तीन मित्र रहते थे—एक का नाम सुधर्मा (ब्राह्मण), दूसरे का नाम सुबुद्धि (क्षत्रिय) और तीसरे का नाम दुर्मति (वैश्य)। ब्राह्मण और क्षत्रिय बहुतधार्मिक थे, जबकि वैश्य नास्तिक और अनीतिज्ञ था। एक दिन दुर्मति की बुरी संगति के कारण तीनों ने तीर्थयात्रा की सोची। यात्रा के दौरान वे एक नगर से गुजर रहे थे, जहाँ के राजा ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया था। ब्राह्मण और क्षत्रिय ने राजा के दर्शन किए और कथा सुनी, लेकिन दुर्मति अहंकार वश वहीं रुक गया। कुछ समय बाद भगवान शिव की कृपा से ब्राह्मण और क्षत्रिय को उत्तम लोक और सुख-समृद्धि की प्राप्ति हुई, जबकि दुर्मति को उसके बुरे कर्मों और शिव-निंदा के कारण भयंकर कष्टों का सामना करना पड़ा। उसे कई प्रकार की बीमारियाँ और आर्थिक तंगी घेर
भगवान शिव की पूजा से जुड़े धार्मिक उपाय:-
- गुरु प्रदोष के दिन शिवलिंग पर केसर मिश्रित दूध या हल्दी मिलाकर अर्पित करें। इससे कुंडली में बृहस्पति मजबूत होता है और विवाह तथा शिक्षा में आ रही बाधाएं दूर होती हैं।
- मंदिर में जाकर चने की दाल और पीले वस्त्र का दान करने से आर्थिक संपन्नता बढ़ती है।
- प्रदोष व्रत के दिन भक्त भगवान शिव और मां पार्वती का ध्यान करके व्रत का संकल्प ले सकते हैं। पूजा के दौरान शिवलिंग पर स्वच्छ जल अर्पित करना, बेलपत्र चढ़ाना और भगवान शिव के मंत्रों का जाप करना धार्मिक रूप से शुभ माना जाता है। संध्या के समय प्रदोष काल में शिव परिवार की पूजा और आरती करने की परंपरा है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार जरूरतमंदों को दान भी कर सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पूरे मन से भगवान शिव की साधना करने से नकारात्मकता दूर करने, मन को शांति देने और जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की कामना की जाती है।
क्या करें और क्या न करें:-
- क्या करें:-
- दिनभर मन में भगवान शिव का स्मरण करते रहें।
- सात्विक भोजन या फलाहार का ही सेवन करें।
- गरीबों और ब्राह्मणों को पीले रंग की वस्तुएं, अन्न या दान दें (गुरुवार का दिन होने से बृहस्पति देव की भी कृपा मिलती है)।
- क्या न करें:–
- तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज) का प्रयोग बिल्कुल न करें।
- किसी का अपमान न करें और न ही झूठ बोलें।
- प्रदोष काल (संध्या समय) में सोएं नहीं, इस समय केवल शिव आराधना करें।
पारण समय और विधि:- गुरु प्रदोष व्रत के पारण का शुभ समय अगले दिन यानी 25 सितंबर 2026 (शुक्रवार) को सुबह 05:58 बजे से सुबह 08:30 बजे के बीच रहेगा। यह समय सूर्योदय के बाद का सबसे उत्तम मुहूर्त है। इस दौरान आप स्नान-ध्यान और शिव जी की कपूर से आरती करने के बाद जल या सात्विक भोजन ग्रहण करके व्रत खोल सकते हैं।













































