स्वप्न शास्त्र की मूल व्याख्या: स्वप्न शास्त्र की मान्यता के अनुसार हर सपना भविष्य की घटना का संकेत नहीं माना जाता। कई सपने व्यक्ति के जागृत जीवन में देखी गई चीजों, सुनी हुई बातों, मन की इच्छा, अनुभव, कल्पना अथवा शरीर में वात-पित्त-कफ के असंतुलन के कारण भी आ सकते हैं। प्राचीन विवेचन में स्वप्नों को सात प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया है। इनमें दृष्ट, श्रुत, अनुभूत, प्रार्थित और कल्पित स्वप्न ऐसे माने गए हैं जिनका सामान्यतः कोई निश्चित फल नहीं माना जाता, जबकि भाविक स्वप्न को भविष्य में घटित होने वाली घटना से संबंधित माना गया है। दोषज स्वप्न शरीर में वात, पित्त और कफ के विकृत होने से उत्पन्न होने वाला बताया गया है। इस दृष्टि से किसी भी सपने को देखकर तुरंत निष्कर्ष निकालना उचित नहीं माना गया है। स्वप्न किस समय देखा गया, उसकी प्रकृति क्या थी और जागने के बाद उसका प्रभाव कैसा रहा, इन बातों को भी पारंपरिक स्वप्न-विचार में महत्व दिया गया है। रात्रि के पहले प्रहर में देखे गए स्वप्न का फल एक वर्ष में, दूसरे प्रहर का लगभग आठ महीने में, तीसरे प्रहर का तीन महीने में और चौथे प्रहर का करीब एक महीने में मिलने की मान्यता बताई गई है। ब्रह्म मुहूर्त में देखे गए स्वप्न का फल लगभग दस दिन में और सूर्योदय से कुछ समय पहले देखे गए स्वप्न का फल इससे भी जल्दी मिलने की परंपरागत धारणा है। अलग-अलग आचार्यों के मत में इन समय-सीमाओं में अंतर भी बताया गया है, जैसे दूसरे प्रहर के लिए चन्द्रसेन मुनि ने सात महीने तथा चौथे प्रहर के लिए वराहमिहिर ने 16 दिन की अवधि मानी है। इस प्रकार स्वप्न शास्त्र में सपनों को केवल दृश्य के आधार पर नहीं, बल्कि उनके कारण, समय और स्वरूप के आधार पर समझने की परंपरा रही है।
धन और सफलता से जुड़े शुभ स्वप्न: पारंपरिक स्वप्न शास्त्र में अनेक ऐसे दृश्य बताए गए हैं जिन्हें आर्थिक लाभ, सफलता, संपत्ति या उन्नति से जोड़ा गया है। स्वप्न में सांप, बिच्छू या अन्य कीड़ों के काटने के बावजूद भय या शोक महसूस न होना धन प्राप्ति का संकेत माना गया है। कालागुरु, चंदन, रोध्र और तगर को घिसते हुए, उनकी सुगंध से प्रसन्न होते हुए या उनका लेप करते हुए देखना धन वृद्धि से जोड़ा गया है। पुष्पित शाल्मली, केले और देवदारु अथवा नीम जैसे वृक्षों पर बैठना या चढ़ना भी संपत्ति प्राप्ति का संकेत माना गया है। पीले या लाल फल-फूल किसी को देते हुए दिखाई देना सोने-चांदी के लाभ का सूचक बताया गया है। श्रेष्ठ बैलों के रथ पर सवार होकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर जाते हुए देखना भी धन प्राप्ति से संबंधित माना गया है। सिर पर पर्वत, घर, खंडहर या चमकदार पदार्थ दिखाई देना स्वास्थ्य और पृथ्वी के सुख के संकेत के रूप में बताया गया है। मिट्टी के हाथी पर सवार होकर सुखपूर्वक समुद्र पार करना और उसी अवस्था में जाग जाना अत्यंत उन्नत स्थिति तथा पृथ्वी पर अधिकार मिलने का संकेत माना गया है। सफेद भवन, फूलों, फलों और शाखाओं से भरपूर वृक्ष देखना कार्यों के सफल होने का संकेत बताया गया है। दूध, तेल और घी का दर्शन भी शुभ माना गया है, जिसमें विशेष रूप से दूध को शुभ बताया गया है, हालांकि इन पदार्थों का स्वप्न में भोजन करना इसी अर्थ में शुभ नहीं माना गया। किसी व्यक्ति की गोद को सुंदर धान्य, फल और पुष्प से भरते हुए देखना बहुत अधिक धन प्राप्ति का संकेत माना गया है। सुंदर रूप वाली कन्या या आर्या का दर्शन सुंदर स्त्री की प्राप्ति से जोड़ा गया है। इसी तरह कलश का दर्शन धन, आरोग्य और पुत्र प्राप्ति से तथा कलशी का दर्शन घर में कन्या के जन्म से संबंधित माना गया है। अन्न का स्वप्न सामान्यतः अर्थ लाभ और संतान प्राप्ति का संकेत बताया गया है, हालांकि सफेद अन्न को इष्ट मित्रों की प्राप्ति, पीले अन्न को हर्ष, लाल अन्न को रोग और काले अन्न को मृत्यु से जोड़ने वाले मत भी दिए गए हैं। जैनाचार्य भद्रबाहु के मत में काला अगुरु देखना अर्थ लाभ का संकेत है, चन्द्रसेन मुनि के अनुसार इससे सुख और वराहमिहिर के मत में धन के साथ स्त्री लाभ की संभावना मानी गई है। बृहस्पति के मत में इससे इष्ट मित्रों के दर्शन तथा मयूखाचार्य और देवज्ञ गणपति के मत में अर्थ लाभ के लिए विदेश गमन का संकेत माना गया है।
शुभ दृश्य और विजय के संकेत: कुछ स्वप्नों को स्वप्न शास्त्र में प्रतिष्ठा, विजय, स्वास्थ्य और उपलब्धि से जोड़ा गया है। सफेद मांस, सफेद आसन, सफेद सवारी, सफेद माला धारण करना अथवा अन्य सफेद वस्तुओं का दर्शन शुभ माना गया है। वृष, गाय, हाथी, मंदिर, वृक्ष, प्रासाद और पर्वत पर स्वयं चढ़ते हुए देखना या किसी दूसरे व्यक्ति को इन पर आरोहण करते देखना अर्थ लाभ का संकेत माना गया है। शस्त्रों का दिखाई देना शुभ फल देने वाला बताया गया है, जबकि शस्त्र से शरीर पर सामान्य चोट लगना अथवा हाथ में शस्त्र लेकर दूसरे व्यक्ति का सामना करना विजय का संकेत माना गया है। शत्रुओं को शस्त्रों से परास्त कर पृथ्वी और पर्वतों को अपने अधीन करने का दृश्य अथवा शुभ पर्वत पर स्वयं चढ़ना राज्याभिषेक से जोड़ा गया है। स्वप्न में जीभ को शस्त्र से छेदते हुए देखना क्षत्रियों के लिए राज्य प्राप्ति और अन्य लोगों के लिए अभ्युदय का संकेत बताया गया है। स्वयं को हरे और सफेद वृक्षों से घिरा देखना तथा उसी समय जाग जाना, अथवा स्वयं को अग्नि से जलता हुआ देखना और फिर भी बंधन या संकट से मुक्त हो जाना भी एक विशेष संकेत के रूप में बताया गया है। अग्नि से जुड़े स्वप्नों में भी अलग-अलग अर्थ दिए गए हैं। धुएं वाली अग्नि को चन्द्रसेन मुनि ने उत्तम कांति से जोड़ा है, जबकि वराहमिहिर और मार्कण्डेय के अनुसार प्रज्वलित अग्नि कार्यसिद्धि का संकेत हो सकती है। देवज्ञ गणपति के मत में अग्नि का भक्षण करते हुए देखना भूमिलाभ और स्त्री रत्न की प्राप्ति का संकेत है, जबकि बृहस्पति के मत में प्रज्वलित अग्नि का दर्शन कल्याणकारी माना गया है। स्वयं को आसन, शय्या, वाहन या यान पर बैठे हुए अग्नि से जलते देखना और उसी समय जाग जाना धन-धान्य प्राप्ति का संकेत बताया गया है। हालांकि अग्नि में जलकर मृत्यु का स्वप्न रोगी के लिए मृत्यु और स्वस्थ व्यक्ति के लिए बीमारी का संकेत माना गया है, वहीं घर या किसी अन्य वस्तु को जलते देखना शुभ बताया गया है। वराहमिहिर के मत में अग्नि की प्राप्ति भी शुभ मानी गई है। आकाश के संबंध में भद्रबाहु ने निर्मल आकाश को शुभ, लाल आभा वाले प्रकाश को कष्टप्रद और नीले आकाश को मनोरथ सिद्ध करने वाला बताया है। इस तरह एक ही विषय के अलग-अलग रूपों के आधार पर स्वप्न का फल बदलने की परंपरा दिखाई देती है।
अशुभ संकेत और सावधानी वाले स्वप्न: स्वप्न शास्त्र में कुछ दृश्यों को संकट, बीमारी, भय, धनहानि अथवा जीवन में कठिन परिस्थितियों से जोड़ा गया है। काले वस्त्र पहनकर काले घोड़े पर सवार होकर दक्षिण दिशा की ओर जाते हुए देखना अत्यंत अशुभ माना गया है और इसे मृत्यु का संकेत बताया गया है। इसी प्रकार भयंकर और विकृत रूप वाली काली स्त्री का उत्तर या दक्षिण दिशा की ओर खींचना भी शीघ्र मृत्यु से संबंधित माना गया है। जटाधारी, सिर मुंडित, विरूप, मलिन अथवा मैले वस्त्रों वाली स्त्री को ग्लानि के साथ देखना सामूहिक भय का सूचक बताया गया है। तपस्वी पुण्डरीक अथवा विकल भिक्षु को देखकर जाग जाना ग्लानि फल से जोड़ा गया है। भूमि पर किसी वस्तु के फैल जाने और जल में उसका नष्ट हो जाना महान भय का संकेत माना गया है। अपने शरीर पर लता, गुल्म, वृक्ष या बांबी जैसी चीजें उगती हुई देखना शरीर के विनाश का संकेत बताया गया है। मस्तक पर माला, बांस, गुल्म, खजूर या हरे वृक्ष उगते हुए दिखाई देना एक सप्ताह के भीतर मृत्यु से जोड़ा गया है। हृदय में इस प्रकार के वृक्ष उगते हुए दिखाई देने पर हृदय रोग से विनाश का संकेत बताया गया है, जबकि शरीर के किसी विशेष अंग पर वृक्ष या ऐसी वस्तु उत्पन्न होती दिखाई दे तो उसी अंग से संबंधित बीमारी का संकेत माना गया है। लाल माला या लाल सूत्र से शरीर के किसी अंग को बंधा हुआ देखना उस अंग में क्लेश का संकेत बताया गया है। अंधकारमय वन, भूमि, गुफा या सुरंग में प्रवेश करते हुए देखना रोग का सूचक माना गया है। गंदे पानी या कीचड़ वाले कुएं में गिरना अथवा डूबना स्वस्थ व्यक्ति के रोगी होने और रोगी व्यक्ति के लिए मृत्यु का संकेत बताया गया है। तालाब या नदी में प्रवेश करते हुए देखना रोगी के लिए मरणतुल्य कष्ट से जोड़ा गया है। नाई को स्वयं अपनी या किसी दूसरे की हजामत करते देखना कष्ट के साथ धन और पुत्र के नाश से संबंधित बताया गया है, हालांकि विभिन्न आचार्यों ने इसके अलग-अलग फल बताए हैं। गणपति दैवज्ञ के मत में इससे माता-पिता की मृत्यु, मार्कण्डेय के मत में पत्नी के साथ माता-पिता की मृत्यु और बृहस्पति के मत में पुत्र की मृत्यु का संकेत बताया गया है। इसी प्रकार अत्यधिक आनंद के साथ खेल खेलना भी एक प्रकार का दुस्वप्न माना गया है, जिसके संबंध में बृहस्पति ने रोना, शोक और पश्चाताप, ब्राह्मवैवर्त पुराण ने धनहानि, ज्येष्ठ पुत्र या कन्या की मृत्यु तथा पत्नी को कष्ट, नारद ने संतान नाश और पाराशर ने धनक्षय के साथ अपकीर्ति का फल बताया है।
दिशा, वस्तु और विशेष स्वप्न संकेतों का अर्थ: स्वप्न में दिखाई देने वाली दिशा का भी पारंपरिक स्वप्न-विचार में अलग महत्व बताया गया है। दक्षिण दिशा की ओर गमन को धनहानि और कष्ट, पश्चिम दिशा की ओर जाना अपमान, उत्तर दिशा की ओर जाना स्वास्थ्य लाभ और पूर्व दिशा की ओर जाना धन प्राप्ति का संकेत माना गया है। यदि कोई मकर या घड़ियाल व्यक्ति को खींचता हुआ दिखाई दे तो इसका एक विशेष अर्थ बताया गया है। जो व्यक्ति कारागार में बंद हो अथवा मुकदमे में फंसा हो, उसके लिए ऐसा स्वप्न मुक्ति और बंधन से छुटकारे का संकेत माना गया है। लाल गंध, चंदन या पुष्पमाला से स्वयं को सज्जित देखना वराहमिहिर के मत में शीघ्र मृत्यु का संकेत बताया गया है, जबकि सफेद रंग की वस्तुओं का अनुलेपन शुभ फलदायी माना गया है। कपास देखने के संबंध में भी अलग फल बताए गए हैं। स्वस्थ व्यक्ति द्वारा कपास देखना रोग की ओर और रोगी द्वारा देखना मृत्यु की ओर संकेत माना गया है, जबकि किसी दूसरे को कपास देते हुए देखना लाभप्रद बताया गया है। नाचता हुआ छिन्न कबंध दिखाई देना आधि, व्याधि और धन के नाश से जोड़ा गया है तथा वराहमिहिर के मत में इसे मृत्यु का संकेत माना गया है। कौआ, गिद्ध, उल्लू और कुत्ते चारों ओर से घेरकर भय उत्पन्न करते दिखाई दें तो मृत्यु का संकेत माना गया है, जबकि इन्हें किसी दूसरे व्यक्ति को भयभीत करते देखना दूसरे व्यक्ति की मृत्यु से जोड़ा गया है। कुमारी कन्या को देखना अर्थ लाभ और संतान प्राप्ति का संकेत बताया गया है, हालांकि वराहमिहिर के अनुसार कुमारी कन्या के साथ आलिंगन का स्वप्न कष्ट और धनक्षय से संबंधित माना गया है। इसी तरह स्वप्न में स्त्री का स्वयं को पुरुष और पुरुष का स्वयं को स्त्री देखना शीघ्र ही पारिवारिक बंधन में बंधने का संकेत बताया गया है। रक्त से अभिषिक्त होकर विवाह करते देखना लंबे समय तक धन-धान्य और संपत्ति से वंचित रहने का संकेत माना गया है। वहीं भूमि, वृक्ष, पर्वत, मंदिर और अन्य ऊंचे स्थानों पर चढ़ने वाले स्वप्नों को सामान्यतः अर्थ लाभ से जोड़ा गया है। इस पूरे विवेचन से यह संकेत मिलता है कि स्वप्न शास्त्र में केवल वस्तु का दिखाई देना ही पर्याप्त नहीं माना गया, बल्कि उसके रंग, दिशा, व्यक्ति की स्थिति और स्वप्न के दौरान होने वाली घटना के अनुसार अर्थ अलग-अलग बताया गया है।
पाप स्वप्नों की शांति और स्वप्न फल का निष्कर्ष: स्वप्न शास्त्र में अशुभ या पाप स्वप्न दिखाई देने पर उनकी शांति के लिए देवताओं, साधुजनों, बंधुजनों और द्विजों का पूजन, सत्कर्म तथा उपवास करने का विधान बताया गया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि ऊपर बताए गए स्वप्न अपने-अपने पारंपरिक संकेतों के अनुसार फल देने वाले माने जाते हैं, जबकि अन्य स्वप्नों को उनके निमित्त और व्यक्ति के स्वभाव के अनुसार समझना चाहिए। इस पूरे स्वप्न-विचार का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि प्राचीन परंपरा स्वयं सभी सपनों को समान महत्व नहीं देती। दृष्ट, श्रुत, अनुभूत, प्रार्थित और कल्पित स्वप्नों को सामान्यतः निष्फल माना गया है, जबकि भाविक स्वप्न को वास्तविक फल देने वाला बताया गया है और दोषज स्वप्न को शारीरिक दोषों से उत्पन्न माना गया है। इसलिए किसी भयावह सपने को देखकर तुरंत भयभीत होने के बजाय उसके स्वरूप, समय और कारण पर विचार करने की परंपरा रही है। स्वप्न शास्त्र में शुभ संकेतों के साथ दान, पूजा, सत्कर्म, उपवास और धार्मिक आचरण को महत्व दिया गया है। प्राचीन मान्यता के अनुसार जो पवित्र आत्मा इस स्वप्न अध्याय का अध्ययन करता है, वह राजाओं द्वारा पूज्य होता है और पुण्य प्राप्त करता है। इस प्रकार स्वप्न शास्त्र का यह विस्तृत विवेचन सपनों को शुभ-अशुभ संकेतों, समय, दिशा, वस्तुओं, मानसिक स्थिति और पारंपरिक मान्यताओं के आधार पर समझने की एक प्राचीन पद्धति प्रस्तुत करता है।













































