सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना, भक्ति और समर्पण का सबसे उत्तम समय माना जाता है। इस पावन मास में चारों ओर शिव-भक्ति की लहर दौड़ जाती है। विशेष रूप से महिलाएं और कुंवारी कन्याएं भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करने और मनचाहे वर की कामना के लिए सावन सोमवार और सोलह सोमवार का व्रत पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ रखती हैं।
व्रत और उपवास के दौरान मन में कई तरह के धार्मिक और व्यावहारिक प्रश्न उठना स्वाभाविक है। महिलाओं के मन में सबसे आम और बड़ा सवाल यह होता है कि यदि सावन सोमवार के दिन या सोलह सोमवार के व्रत के दौरान मासिक धर्म (Periods) आ जाएं, तो क्या व्रत टूट जाता है? क्या व्रत को बीच में छोड़ देना चाहिए? आइए, धार्मिक मान्यताओं, शास्त्रों और विद्वानों के मत के अनुसार इस विषय पर विस्तार से चर्चा करते हैं।
क्या मासिक धर्म के दौरान व्रत रखना चाहिए?
2 अगस्त 2026 को इस वर्ष का पहला सावन सोमवार का व्रत रखा जाएगा। ऐसे में कई महिलाएं, जिन्होंने पहले से व्रत का संकल्प लिया हुआ है, वे इस असमंजस में रहती हैं कि पीरियड्स के दौरान व्रत को जारी रखें या नहीं।
धार्मिक विद्वानों और ज्योतिषियों का स्पष्ट मानना है कि यदि किसी महिला ने सावन के सोमवार या सोलह सोमवार के व्रत का संकल्प (Resolution) ले लिया है, तो मासिक धर्म आने पर उस व्रत को खंडित नहीं माना जाता और न ही उसे बीच में छोड़ना चाहिए। आप अपना व्रत सामान्य रूप से जारी रख सकती हैं।
विशेष नियम: पीरियड्स के दौरान शारीरिक रूप से व्रत रखा जा सकता है, लेकिन इस अवस्था में मंदिर में प्रवेश करना, शिवलिंग का साक्षात स्पर्श करना, या प्रत्यक्ष रूप से पूजा-पाठ की सामग्री को छूने से पूरी तरह परहेज करने की सलाह दी जाती है।
मन की श्रद्धा और भक्ति का महत्व
सनातन धर्म अत्यंत वैज्ञानिक और उदार है। शास्त्रों में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि मासिक धर्म (Menstruation) एक अत्यंत ही प्राकृतिक और जैविक प्रक्रिया है। इसे लेकर मन में किसी भी प्रकार की हीन भावना या अपराधबोध नहीं लाना चाहिए।
- आंतरिक शुद्धि: भगवान शिव केवल जल या बेलपत्र के भूखे नहीं हैं, वे तो भक्तों के भाव और सच्ची श्रद्धा के भूखे हैं।
- संकल्प की शक्ति: ईश्वर बाहरी कर्मकांडों से कहीं अधिक मन की पवित्रता और आपके संकल्प की दृढ़ता को देखते हैं। इसीलिए, किसी प्राकृतिक कारण से संकल्पित व्रत को बीच में छोड़ना न तो आवश्यक है और न ही उचित माना गया है।
पीरियड्स में कैसे करें भगवान शिव की पूजा? (मानसिक पूजा विधान)
यदि आप मासिक धर्म के कारण मंदिर जाकर शिवलिंग पर जलाभिषेक नहीं कर पा रही हैं, तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है। हिंदू धर्म में मानसिक पूजा (Mental Worship) को प्रत्यक्ष पूजा के समान ही—बल्कि उससे भी अधिक—फलदायी माना गया है।
आप निम्नलिखित विधियों से अपनी आराधना पूर्ण कर सकती हैं:
- मानसिक स्मरण और ध्यान: घर पर ही किसी स्वच्छ स्थान पर थोड़ी दूरी पर बैठ जाएं। आँखें बंद करके भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य स्वरूप का मानसिक ध्यान करें। कल्पना करें कि आप स्वयं शिवलिंग पर जल और बेलपत्र अर्पित कर रही हैं।
- मंत्रों का मानसिक जाप: पूजा में शब्दों से अधिक भाव प्रबल होते हैं। आप मन ही मन ‘ॐ नमः शिवाय’ या महामृत्युंजय मंत्र का निरंतर जाप कर सकती हैं।
- पाठ और स्तुति: आप बिना पुस्तक को स्पर्श किए, मोबाइल फोन के माध्यम से या यदि आपको याद हो, तो शिव चालीसा, शिव रुद्राष्टकम या शिव स्तुति का पाठ सुन और गा सकती हैं।
- परिजनों का सहयोग लें: यदि घर में शिव जी की स्थापना है, तो आप अपने परिवार के किसी अन्य सदस्य (पति, भाई, या बच्चों) के माध्यम से भगवान शिव को जल, पुष्प, और भोग अर्पित करवा सकती हैं।
इन महत्वपूर्ण बातों का अवश्य रखें ध्यान
मासिक धर्म के दौरान व्रत रखते समय आध्यात्मिक नियमों के साथ-साथ स्वास्थ्य का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए:
- स्पर्श से बचें: घर के मंदिर, भगवान की मूर्ति, तस्वीर, और पूजा की सामग्री (जैसे रोली, चंदन, अक्षत) को सीधे तौर पर स्पर्श न करें।
- दूरी बनाए रखें: भगवान के आसन से थोड़ी दूरी पर बैठकर ही अपना ध्यान और प्रार्थना संपन्न करें।
- खान-पान का नियम: व्रत के दौरान जो फलाहार आप सामान्य रूप से ग्रहण करती हैं, वही फलाहार पीरियड्स के दौरान भी लिया जा सकता है।
- स्वास्थ्य ही प्राथमिकता है: सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिससे कमजोरी, दर्द या अत्यधिक शारीरिक असुविधा हो सकती है। यदि आपका स्वास्थ्य बिल्कुल भी साथ नहीं दे रहा है, तो स्वयं को कष्ट देकर भूखे रहना उचित नहीं है। शास्त्रों में भी बीमारी या शारीरिक अक्षमता की स्थिति में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। ईश्वर कभी नहीं चाहते कि उनका भक्त कष्ट में रहे।
भगवान भोलेनाथ अत्यंत दयालु हैं और वे आपकी सच्ची निष्ठा और प्रेमपूर्ण भाव को सहर्ष स्वीकार करते हैं। अतः बिना किसी संशय के, पूरे श्रद्धा-भाव से अपना व्रत पूर्ण करें।


























































