जन्मदिन के उपहार स्वरूप सत्या ने लहरों पर हासिल की विजय प्रयागराज के नैनी इलाके में रहने वाली एक नन्हीं बालिका ने अपने पराक्रम से सबको स्तब्ध कर दिया है। देवेंद्र भारती की सुपुत्री सत्या भारती ने अपने चौथे जन्मदिन को यादगार बनाते हुए यमुना नदी को तैरकर पार करने का चुनौतीपूर्ण लक्ष्य हासिल किया है। इस छोटी सी बच्ची ने ब्रेस्ट स्टाइल तैराकी का प्रदर्शन करते हुए 900 मीटर के फासले को महज 21 मिनट और 28 सेकंड में तय कर लिया। वर्तमान में सत्या ने अपनी स्कूली शिक्षा भी शुरू नहीं की है, परंतु खेल के प्रति उसके समर्पण ने उसे एक छोटी उम्र की महानायक बना दिया है। वह अभी बचपन की अठखेलियों की उम्र में है, मगर नदी की गहराई उसके हौसलों के सामने कम नजर आई।
एक वर्ष के कठिन परिश्रम और समर्पण का सुखद परिणाम सत्या की इस सफलता के पीछे उनके कोच त्रिभुवन निषाद की कड़ी मेहनत और पिता देवेंद्र भारती का प्रोत्साहन है। पिछले एक साल से सत्या निरंतर तैराकी का प्रशिक्षण ले रही है। देवेंद्र भारती, जिनका मुख्य कार्य बालू का खनन करना है, स्वयं भी एक कुशल तैराक हैं और अपनी बेटी के भीतर छिपी संभावनाओं को उन्होंने बहुत पहले पहचान लिया था। जब वे सत्या को लेकर कोच निषाद के पास पहुंचे, तो कोच ने भी बच्ची की एकाग्रता और सीखने की ललक को देखते हुए उसे ट्रेनिंग देना स्वीकार किया। आज उसी प्रशिक्षण का फल है कि सत्या ने लहरों के बीच अपनी पहचान बनाई है।
कोच त्रिभुवन निषाद और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार करने का जज्बा प्रशिक्षक त्रिभुवन निषाद पिछले 40 वर्षों से भी अधिक समय से तैराकी के क्षेत्र में सक्रिय हैं और बच्चों को तराशने का काम कर रहे हैं। उनके ‘नवजीवन तैराकी क्लब’ का इतिहास गौरवशाली रहा है, जहाँ से निकले बच्चों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कीर्तिमान स्थापित किए हैं। निषाद बताते हैं कि उनके सिखाए हुए कई बच्चे आज खेल के माध्यम से सरकारी नौकरियों में उच्च पदों पर आसीन हैं। सत्या के बारे में उनका दृष्टिकोण बहुत स्पष्ट है; वे कहते हैं कि इस बच्ची में वह चिंगारी है जो भविष्य में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश के तिरंगे का मान बढ़ा सकती है।
मासूमियत और बड़े सपनों का अद्भुत संगम सत्या भारती अभी स्पष्ट रूप से बोलने में सक्षम नहीं है, लेकिन जब वह अपनी तुतलाती आवाज में तैराकी और अपने गुरुओं की चर्चा करती है, तो सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। उसने बताया कि वह पिछले एक साल से पानी के साथ अभ्यास कर रही है। यद्यपि वह अभी किसी स्कूल का हिस्सा नहीं है, लेकिन उसका सपना बहुत बड़ा है; वह खाकी वर्दी पहनकर पुलिस अधिकारी के रूप में देश की सेवा करना चाहती है। खेल के प्रति उसकी यह रुचि और करियर को लेकर उसकी यह मासूम इच्छा उसके उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करती है।
अभिभावकीय समर्थन और सफलता की नई ऊंचाइयों की ओर कदम पिता देवेंद्र भारती अपनी बेटी के उज्ज्वल भविष्य को लेकर अत्यंत गंभीर हैं और उसे एक नेशनल चैंपियन बनाने का सपना संजोए हुए हैं। उनका कहना है कि वे अपनी आर्थिक सीमाओं के बावजूद सत्या की ट्रेनिंग में किसी प्रकार की बाधा नहीं आने देंगे। देवेंद्र के अनुसार, 4 वर्ष की अल्पायु में यमुना पार करना केवल एक शुरुआत है। वे मानते हैं कि यदि सत्या को सही समय पर उच्च स्तरीय कोचिंग और सुविधाएं प्राप्त होती रहीं, तो वह दिन दूर नहीं जब वह देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर लाएगी और प्रयागराज का नाम रोशन करेगी।
बाल प्रतिभा के सम्मान और संरक्षण की आवश्यकता सत्या भारती की इस हैरतअंगेज उपलब्धि ने यह संदेश दिया है कि छोटे शहरों और साधारण परिवारों में भी असाधारण प्रतिभाएं जन्म लेती हैं। यमुना की लहरों के बीच 21 मिनट तक संघर्ष कर विजय प्राप्त करना किसी चमत्कार से कम नहीं है। स्थानीय निवासियों और खेल विशेषज्ञों का मानना है कि सत्या जैसी प्रतिभाओं को यदि सरकारी स्तर पर प्रोत्साहन मिले, तो वे ओलंपिक जैसे बड़े आयोजनों में भारत की पदक तालिका को बढ़ा सकते हैं। सत्या की यह कहानी आज हर उस बच्चे के लिए मिसाल है जो अपने सपनों को पंख देना चाहता है।



































