सदन में कैराना सांसद का प्रभावी कूटनीतिक कदम समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने लोकसभा की कार्यवाही के दौरान ‘नारी शक्ति वंदन’ कानून की पेचीदगियों को लेकर सत्ता पक्ष को कटघरे में खड़ा किया। कैराना से निर्वाचित सांसद ने अपनी पार्टी के नेतृत्व से भी अधिक सूक्ष्म और व्यापक दृष्टिकोण पेश किया, जिसे राजनीतिक हलकों में एक अत्यंत चतुर कदम माना जा रहा है। इकरा ने न केवल विधेयक की कमियों को उजागर किया, बल्कि परिसीमन और जनगणना जैसी शर्तों को लागू करने की समयसीमा पर भी सरकार की नियत पर सवाल उठाए। उनका यह भाषण संसदीय इतिहास में उनकी एक परिपक्व नेता की छवि पेश करता है।
धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए समावेशी कोटे की पैरवी 16 अप्रैल 2026 को सदन को संबोधित करते हुए इकरा हसन ने आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण का मुद्दा उठाया। जहां सपा के अन्य बड़े नेताओं ने मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय की महिलाओं के लिए कोटे की मांग की थी, वहीं इकरा ने इसे व्यापक रूप देते हुए ‘धार्मिक अल्पसंख्यकों’ की महिलाओं के लिए कोटे की मांग कर डाली। उन्होंने तर्क दिया कि देश की सभी अल्पसंख्यक महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति चुनौतीपूर्ण है, इसलिए उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए विशेष प्रावधान अनिवार्य हैं। इस दांव के जरिए उन्होंने सरकार के ‘असंवैधानिक’ वाले तर्क को चुनौती देने की कोशिश की है।
पिछड़े वर्गों का सशक्तिकरण और वित्तीय सहायता का मुद्दा इकरा हसन ने ओबीसी और समाज के अंतिम पायदान पर खड़ी महिलाओं के लिए सब-कोटा सुनिश्चित करने की मांग को दोहराया। उन्होंने सदन का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि गरीब और पिछड़ी महिलाओं के पास चुनाव लड़ने के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं होती। उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसी महिलाओं के लिए विशेष वित्तीय प्रावधान किए जाएं और चुनावी खर्च में राज्य की ओर से सहयोग प्रदान किया जाए। उनका कहना है कि जब तक चुनाव लड़ना महंगा रहेगा, तब तक गरीब महिलाएं आरक्षण के बावजूद संसद और विधानसभाओं तक नहीं पहुंच पाएंगी।
चुनावी स्टंट और सरकारी मंशा पर प्रश्नचिन्ह सांसद ने सदन में यह स्पष्ट किया कि महिला आरक्षण अब केवल एक वैधानिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि सरकार के लिए यह वोट बैंक की राजनीति का जरिया बन गया है। उन्होंने कहा कि चूंकि यह बिल 2023 में ही सर्वसम्मति से स्वीकार किया जा चुका है, तो अब इसे लागू करने में किसी भी प्रकार का विलंब केवल राजनीतिक मंशा को दर्शाता है। इकरा ने आरोप लगाया कि सरकार इस बिल के वास्तविक लाभों को जनता तक पहुँचाने के बजाय केवल श्रेय लेने की राजनीति में व्यस्त है, जो देश की आधी आबादी के साथ अन्याय है।
संवैधानिक प्रक्रियाओं का ढाल की तरह उपयोग परिसीमन और जनगणना को आरक्षण लागू करने की पूर्व शर्त बनाने पर इकरा हसन ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि सरकार इन प्रक्रियाओं का उपयोग एक ढाल की तरह कर रही है ताकि महिलाओं के अधिकारों को स्थगित रखा जा सके। उन्होंने इसे महिलाओं के साथ ‘विश्वासघात’ बताते हुए कहा कि यदि सरकार वास्तव में महिलाओं को नेतृत्व की भूमिका में देखना चाहती है, तो वह इन जटिलताओं को बीच में नहीं लाती। उन्होंने मांग की कि आरक्षण को बिना किसी बाहरी शर्त के जल्द से जल्द लागू किया जाए।
समय सीमा के विरोधाभास पर सरकार की घेराबंदी अपने भाषण के समापन पर इकरा ने आरक्षण लागू होने के वर्ष को लेकर जारी भ्रम पर प्रहार किया। उन्होंने याद दिलाया कि पहले यह दावा किया गया था कि आरक्षण 2034 के उपरांत ही संभव है, लेकिन अब चुनावी लाभ के लिए इसे 2029 की समयसीमा में बांधा जा रहा है। इकरा ने इस विरोधाभास को सरकार की घबराहट का संकेत बताया और कहा कि महिलाओं को गुमराह करने के बजाय सरकार को ईमानदारी से यह बताना चाहिए कि वे कब तक वास्तव में अपनी सीटों पर आरक्षण का लाभ देख सकेंगी। उनके इन सवालों ने सत्ता पक्ष को असहज स्थिति में डाल दिया है।



































