महत्वपूर्ण विधेयकों पर वोटिंग से पहले सियासी मंथन लोकसभा में तीन प्रमुख विधेयकों पर होने वाले मतदान की घड़ी जैसे-जैसे करीब आ रही है, वैसे-वैसे दिल्ली का सियासी पारा चढ़ता जा रहा है। इसी क्रम में यह खबर सुर्खियाँ बटोर रही है कि केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ बंद कमरे में 15 मिनट की लंबी बातचीत की है। हालांकि इस मुलाकात के आधिकारिक विवरण साझा नहीं किए गए हैं, लेकिन जानकारों का मानना है कि सरकार सदन में सुचारू कामकाज और विपक्ष के रुख को भांपने का प्रयास कर रही है। अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया से साफ है कि वे सरकार के किसी भी प्रस्ताव को आसानी से स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं।
सत्ता पक्ष की नीति और नियत पर अखिलेश का प्रहार प्रेस वार्ता के दौरान अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि सदन में जो माहौल दिखाई दे रहा है, वह सरकार के पक्ष में नहीं है। अखिलेश ने पुराने अनुभवों का हवाला देते हुए कहा कि भाजपा ने अतीत में कई वादे किए लेकिन उन्हें कभी पूरा नहीं किया, इसलिए उनकी बातों पर अब कोई विश्वास नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भाजपा चुनाव और सदन की प्रक्रियाओं को अपने अनुकूल मोड़ने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है, जिसके प्रति समूचा विपक्ष गोलबंद हो रहा है।
सदन के भीतर अंतरात्मा की आवाज का आह्वान संसद भवन के बाहर संवाददाताओं से बातचीत में सपा प्रमुख ने ‘पीडीए’ के नारे को दोहराया। उन्होंने दावा किया कि भाजपा गठबंधन में शामिल कई दलित और पिछड़े सांसद मानसिक रूप से विपक्ष के विचारों के साथ हैं। अखिलेश ने कहा कि भाजपा अपनी सुविधा के अनुसार गिरगिट की तरह रंग बदलती है। उनका मानना है कि जब मतदान का समय आएगा, तो कई ऐसे सांसद जो वर्तमान में सत्ता पक्ष की कुर्सियों पर आसीन हैं, वे देश के व्यापक हित और संविधान की रक्षा के लिए अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनेंगे और विपक्ष के रुख का समर्थन करेंगे।
विपक्षी दलों का संख्यात्मक समीकरण और एकजुटता विपक्ष के संख्या बल को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच यह स्पष्ट हुआ है कि कांग्रेस, सपा, टीएमसी और डीएमके जैसे बड़े दलों ने अपने सांसदों को सदन में उपस्थित रहने के लिए कड़े निर्देश दिए हैं। इन चार प्रमुख दलों के 174 सांसदों की सक्रिय उपस्थिति ही सरकार के लिए मुश्किल खड़ी करने हेतु पर्याप्त मानी जा रही है। विपक्षी सूत्रों का दावा है कि यदि मतदान के दिन एनडीए की एकजुटता में जरा भी कमी आई, तो विपक्ष अपने संख्या बल के आधार पर संविधान संशोधन जैसे महत्वपूर्ण विधायी कार्यों को रोकने में सफल हो सकता है।
क्षेत्रीय दलों का समर्थन और बढ़ता हुआ कुनबा विपक्षी एकता का विस्तार लगातार बढ़ रहा है। सदन में वामपंथी दलों (सीपीएम, सीपीआई), आरजेडी, आम आदमी पार्टी और शिवसेना (यूबीटी) जैसे दलों का साथ मिलने से विपक्ष का मनोबल बढ़ा हुआ है। इसके अतिरिक्त बीएपी, एमडीएमके और केरल कांग्रेस जैसे छोटे लेकिन महत्वपूर्ण दलों के सांसदों की उपस्थिति से विपक्ष का आंकड़ा 200 के पार पहुँचने का अनुमान है। रणनीतिकारों का कहना है कि यह केवल एक विरोध नहीं बल्कि एक संगठित मोर्चा है जो सरकार की नीतियों को सदन के भीतर चुनौती देने के लिए तैयार खड़ा है।
ऐतिहासिक मतदान और आगामी राजनैतिक दिशा लेख के अंत में यह स्पष्ट होता है कि आगामी मतदान केवल विधायी प्रक्रिया नहीं बल्कि शक्ति प्रदर्शन का एक बड़ा मंच होगा। अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दल यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि वे सदन में कमजोर नहीं हैं। 15 मिनट की उस रहस्यमयी बातचीत के बाद अखिलेश का सख्त रुख यह संकेत देता है कि सदन में टकराव की स्थिति बनी रहेगी। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार अपने सहयोगियों को एकजुट रख पाती है या विपक्ष अपने दावों के अनुरूप सत्ता पक्ष के भीतर सेंध लगाने में कामयाब होता है।



































