पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए ने हाल ही में आपस में हाथ मिलाकर एक बड़ा रक्षा समझौता किया था जिसे मक्का डिफेंस पैक्ट नाम दिया गया था। इस समझौते के नियमों के मुताबिक यदि पाकिस्तान, सऊदी अरब या तुर्किए में से किसी भी एक देश पर कोई सशस्त्र हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर संयुक्त हमला माना जाएगा। इस करार में यह भी तय हुआ था कि तीनों देश मिलकर ऐसी किसी भी बाहरी आक्रामकता का मिलकर डटकर मुकाबला करेंगे। लेकिन यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब पर मिसाइल और ड्रोन से हमला करने के बाद पाकिस्तान इस समझौते से पूरी तरह मुकर गया है। इस घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि रणनीतिक मोर्चों पर पाकिस्तान अपने सहयोगियों का साथ निभाने में पूरी तरह विफल साबित होता है।
हूती विद्रोहियों का हमला यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के कई बेहद प्रमुख तेल भंडारों और सैन्य ठिकानों को अपने हमलों का निशाना बनाया है। इन खतरनाक मिसाइल और ड्रोन हमलों से सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था के सामने एक गंभीर और बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। ऐसे समय में जब सऊदी अरब को अपने रक्षा सहयोगियों से सैन्य मदद की सबसे अधिक आवश्यकता थी, पाकिस्तान पीछे हट गया। हूती विद्रोहियों के इन लगातार हमलों ने मक्का डिफेंस पैक्ट की असलियत दुनिया के सामने लाकर रख दी है। सऊदी अरब को यह उम्मीद कभी नहीं रही होगी कि संकट के इस दौर में उसका सबसे बड़ा सहयोगी देश इस तरह पीठ दिखा देगा।
रक्षा मंत्री का रुख पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी सफाई देते हुए एक बेहद गैर-जिम्मेदाराना बयान दिया है। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्हें पूरी उम्मीद है कि ईरान इन हूती विद्रोहियों पर खुद ही पूरी तरह काबू पा लेगा। ख्वाजा आसिफ का यह भी कहना था कि ईरान एक इस्लामिक मुल्क है और पाकिस्तान की उसके साथ पुरानी हमदर्दी जुड़ी हुई है। इसी अजीब तर्क का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि इस मामले में पाकिस्तान को सैन्य दखल देने की कोई जरूरत है। रक्षा मंत्री के इन बयानों से साफ हो गया है कि पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ किए गए अपने आधिकारिक समझौतों की शर्तों को ताक पर रख रहा है।
विदेश मंत्रालय के बयान पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने भी एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी। जब उनसे सैन्य कार्रवाई को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि अभी ऐसी किसी भी चीज पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि जब भी सही समय आएगा, तब हम इस समझौते के तहत किसी भी प्रकार की उचित कार्रवाई पर विचार करेंगे। विदेश मंत्रालय का यह बयान इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पाकिस्तान हूती विद्रोहियों के खिलाफ किसी भी सैन्य संघर्ष में सीधे तौर पर उलझना नहीं चाहता है। सऊदी अरब के लिए यह बहुत बड़ा झटका है क्योंकि संकट की इस घड़ी में पाकिस्तान ने कूटनीतिक बहानेबाजी का सहारा लिया है।
अचानक बदले तेवर बीते कुछ समय पहले तक सऊदी अरब पर हुए हमलों को लेकर पाकिस्तान के शासकों और मंत्रियों के तेवर काफी ज्यादा तल्ख हुआ करते थे। लेकिन अब इस्लामाबाद के ये कड़े तेवर अचानक पूरी तरह बदल चुके हैं और सरकार ने साफ कर दिया है कि किसी सैन्य कार्रवाई पर बात नहीं होगी। इसका सीधा मतलब यह है कि जिस सैन्य गठजोड़ के दम पर पाकिस्तान बड़ी-बड़ी डींगें हांक रहा था, वह पहले ही टेस्ट में बुरी तरह फेल हो गया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय का यह भी कहना है कि हूती मिलिटेंट्स ऐसे हमले पहले भी करते रहे हैं और यह कोई नई बात नहीं है। उनका तर्क है कि वर्तमान हालात ऐसे नहीं हैं कि पाकिस्तान अपनी सेना को युद्ध के मैदान में उतारने का जोखिम उठाए।
मुग़ालते में जनता विश्लेषकों का मानना है कि जनरल आसिम मुनीर ने पाकिस्तान की भोली-भाली जनता को मुग़ालते में रखने के लिए ही सऊदी अरब से मक्का पैक्ट पर साइन किए थे। इस पैक्ट के मुताबिक सऊदी पर हमला होने पर पाकिस्तान को अपनी फौज भेजनी थी, लेकिन अब हूती हमलों के बाद नेता केवल बयानबाजी कर रहे हैं। इससे पहले भी पाकिस्तान ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप को झांसा दिया था कि वह ईरान से डील करवाकर उन्हें सरेंडर करवा देगा। लेकिन जब असल समय आया तो पाकिस्तान के सभी दावे झूठे साबित हुए और उसके सारे हथकंडे दुनिया के सामने पूरी तरह बेनकाब हो गए। अब सऊदी अरब पर हुए हमले के बाद पाकिस्तान एक बार फिर बुरी तरह एक्सपोज हो गया है और ईरान के डर से वह पूरी तरह लाचार नजर आ रहा है।












































