मिडल ईस्ट (Middle East) एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर ला दिया था। हालांकि, नाटो महासचिव मार्क रूट के साथ बैठक से ठीक पहले अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के युद्धविराम (Ceasefire) पर सहमति बनी है, लेकिन ट्रंप के तेवर अभी भी आक्रामक हैं।
“सभ्यता मिटाने” की भयावह धमकी (Threat of Total Annihilation): सीजफायर से पहले ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी थी कि यदि उनकी शर्तें नहीं मानी गईं, तो वह ईरान के पावर प्लांट्स और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों (Bridges and Infrastructure) को निशाना बनाएंगे। उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि “आज रात पूरी सभ्यता मिट जाएगी।” यह बयान ट्रंप की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ (Maximum Pressure Policy) का हिस्सा माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान को बातचीत की मेज पर पूरी तरह झुकाना है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और वैश्विक अर्थव्यवस्था (Strait of Hormuz and Global Economy): ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी दी थी, जो दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल पारगमन मार्ग (Oil Transit Route) है। इसके बंद होने से गैस की कीमतें आसमान छूने लगी थीं। नए सीजफायर समझौते के तहत इस जलमार्ग को फिर से खोलने का प्रावधान है, जिससे वैश्विक बाजार को बड़ी राहत मिली है। ट्रंप का मानना है कि इस संकट में नाटो को अमेरिका का सैन्य और आर्थिक रूप से साथ देना चाहिए था।
मार्को रूबियो और भविष्य की रणनीति (Marco Rubio’s Role): अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भी इस मामले में सक्रियता दिखाई है। उन्होंने नाटो प्रमुख के साथ रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान संकट पर चर्चा की। रूबियो का प्रयास “बोझ साझा करने” (Burden Sharing) पर केंद्रित है, जिसका अर्थ है कि यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा के लिए अधिक रक्षा बजट (Defense Budget) खर्च करना होगा। ट्रंप प्रशासन की स्पष्ट नीति है कि अमेरिका अब दुनिया का “मुफ्त बॉडीगार्ड” बनकर नहीं रहेगा।
निष्कर्ष: ट्रंप की ये धमकियाँ केवल बयानबाजी नहीं हैं, बल्कि एक नए विश्व क्रम (New World Order) का संकेत हैं जहाँ अमेरिका अपनी शर्तों पर गठबंधन जारी रखना चाहता है। यदि नाटो देशों ने अपना योगदान नहीं बढ़ाया, तो भविष्य में अमेरिका और यूरोप के रक्षा संबंध पूरी तरह टूट सकते हैं।




































