नोएडा का रणक्षेत्र और सरकारी तंत्र की घेराबंदी: उत्तर प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक जिले गौतमबुद्ध नगर में हाल ही में वेतन सुधार की मांग को लेकर हुआ आंदोलन एक भयावह संघर्ष में तब्दील हो गया। 13 अप्रैल की तारीख नोएडा के इतिहास में हिंसा और आगजनी के दिन के रूप में दर्ज हुई, जहाँ श्रमिकों ने आक्रोश में आकर सरकारी तंत्र और सार्वजनिक वाहनों को भारी क्षति पहुँचाई। पुलिस प्रशासन को स्थिति बहाल करने के लिए कड़े प्रयास करने पड़े और समूचे जनपद में सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए गए। इसी बीच, सत्ता पक्ष की ओर से इस बवाल को ‘विपक्ष की रची हुई साजिश’ बताए जाने के बाद प्रदेश की राजनीति में एक नया विवाद जन्म ले चुका है।
सपा प्रमुख का कड़ा रुख और ‘साजिश’ का खंडन: योगी सरकार के मंत्रियों द्वारा लगाए गए आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए अखिलेश यादव ने इसे सरकार का स्वयं के द्वारा निर्मित संकट बताया। उन्होंने कहा कि मजदूरों की वाजिब मांगों की अनदेखी करना ही इस हिंसा का मूल कारण है। कन्नौज सांसद ने सरकार से प्रश्न किया कि यदि वे इसे एक साजिश मान रहे हैं, तो उनका खुफिया विभाग (इंटेलिजेंस) क्या सो रहा था? उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अपनी अक्षमता को ढंकने के लिए विपक्ष पर दोष मढ़ने का पुराना पैंतरा अपना रही है, जबकि हकीकत यह है कि यह आंदोलन सरकार की नीतियों का ही परिणाम है।
नोएडा की प्रतिष्ठा और सरकारी अक्षमता: अखिलेश यादव ने अपनी बात को विस्तार देते हुए कहा कि नोएडा जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित केंद्र में इतनी बड़ी हिंसा होना सरकार के लिए शर्म की बात है। उन्होंने कहा कि जिस स्थान के विकास के कसीदे पीएम और सीएम पढ़ते थे, वहां आज मजदूर सड़कों पर पत्थर उठाने को विवश हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि सरकार ने खुद ही इस आंदोलन को उग्र होने दिया क्योंकि वे मजदूरों को इंसान नहीं समझते। उनके अनुसार, यदि प्रशासन को इस विद्रोह के संकेतों की पूर्व जानकारी नहीं थी, तो इस सरकार को सत्ता में रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है क्योंकि यह पूर्ण रूप से विफल है।
बंगाल चुनाव और खुफिया तंत्र का भटकाव: इंटेलिजेंस की विफलता पर और अधिक प्रहार करते हुए सपा अध्यक्ष ने कहा कि यूपी सरकार केवल भ्रामक प्रचार में माहिर है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब नोएडा में कई दिनों से विरोध प्रदर्शन की सुगबुगाहट थी, तब इंटेलिजेंस ने इसकी जानकारी क्यों नहीं दी? उन्होंने व्यंग्य किया कि शायद उत्तर प्रदेश का पूरा इंटेलिजेंस अमला बंगाल के चुनावी रण में प्रचार के काम में लगा हुआ था। अखिलेश ने स्पष्ट किया कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मजदूरों की मांगों को साजिश का नाम देना उनके संघर्ष का अपमान है और यह सरकार केवल अपनी विफलताओं का दोष दूसरों पर डालना जानती है।
श्रमिकों के अधिकार और क्षेत्रीय तुलना: अखिलेश यादव ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब मुख्यमंत्री का ध्यान केवल धन्नासेठों के लाभ पर रहेगा, तो साधारण मजदूर को अपनी आजीविका के लिए संघर्ष करना ही पड़ेगा। उन्होंने कहा कि आज की महंगाई ने मजदूरों का जीना दूभर कर दिया है। उन्होंने यह भी मुद्दा उठाया कि यदि निकटवर्ती राज्यों ने श्रमिकों की वेतन संबंधी शर्तों को मान लिया है, तो उत्तर प्रदेश सरकार को ऐसा करने में क्या आपत्ति है? उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर मजदूरों के बीच भेदभाव पैदा कर रही है, जिसका परिणाम इस उग्र प्रदर्शन के रूप में सामने आया है।
संवाद की कमी और निवेश पर संकट: अखिलेश ने अंत में समिति के गठन पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यह केवल एक दिखावा है। उन्होंने पूछा कि हिंसा और आगजनी का इंतजार क्यों किया गया? यदि सरकार वास्तव में न्याय करना चाहती थी, तो यह कदम बहुत पहले उठाया जा सकता था। उन्होंने सरकार को चेतावनी दी कि बिना मजदूरों के सहयोग के कोई भी निवेश या उद्योग सफल नहीं हो सकता। यदि आज इन श्रमिकों का शोषण किया गया और उनकी आवाज दबाई गई, तो आने वाले समय में उत्तर प्रदेश के औद्योगिक विकास का सपना कभी पूरा नहीं होगा, क्योंकि यही मजदूर उद्योगों की असली रीढ़ हैं।





































