तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने अपनी पार्टी की एक हालिया बैठक में देश की बढ़ती ताकत पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने अपनी AK पार्टी की बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंकारा की पहचान अब पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ेगी। उन्होंने पूरा भरोसा जताया कि उनकी राजधानी अंकारा बहुत जल्द ग्लोबल डिप्लोमेसी के एक बड़े केंद्र के तौर पर अपनी अलग पहचान बनाएगी। एर्दोगन का यह बयान ऐसे समय पर आया है जब दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति उनके देश का दौरा कर रहे हैं। इस नाटो समिट की मेजबानी को तुर्किये अपनी एक बहुत बड़ी कूटनीतिक कामयाबी के रूप में देख रहा है।
ट्रंप और एर्दोगन की दोस्ती: पिछले कुछ हालिया हफ्तों के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोगन का खुलकर और पुरजोर समर्थन किया है। ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय मंचों और बयानों में एर्दोगन की तारीफ करते हुए उन्हें सरेआम “अपना दोस्त” और एक “जबरदस्त नेता” बताया है। अमेरिकी राष्ट्रपति का यह रुख नाटो के उन अन्य सदस्य देशों के लिए बेहद हैरान करने वाला है जो तुर्किये का विरोध करते हैं। ट्रंप और एर्दोगन के बीच की यह बढ़ती नजदीकी नाटो संगठन के भीतर की आंतरिक राजनीति को पूरी तरह प्रभावित कर रही है। दोनों नेताओं के बीच के ये अच्छे व्यक्तिगत संबंध इस बार के अंकारा समिट में बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं।
व्हाइट हाउस का बयान: वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले हफ्ते व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत करते हुए ट्रंप ने एक बड़ा खुलासा किया था। ट्रंप ने मीडिया के सामने साफ कहा था कि अगर यह समिट तुर्किये में राष्ट्रपति एर्दोगन की मेजबानी में नहीं हो रहा होता, तो वह इसमें शामिल नहीं होते। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस समिट में उनकी मौजूदगी की एकमात्र वजह उनके मित्र राष्ट्रपति एर्दोगन और उनकी मेजबानी ही है। ट्रंप के इस बेहद चौंकाने वाले बयान ने नाटो के बाकी तमाम सदस्य देशों को पूरी तरह असमंजस में डाल दिया था। इस बयान से यह साफ हो गया था कि अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए नाटो संगठन से ज्यादा तुर्किये की दोस्ती मायने रखती है।
मार्क रुटे की मौजूदगी: जिस समय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व्हाइट हाउस में पत्रकारों के सामने तुर्किये और एर्दोगन की जमकर तारीफ कर रहे थे, नजारा बेहद दिलचस्प था। उस वक्त नाटो के नए सेक्रेटरी जनरल मार्क रुटे खुद व्हाइट हाउस में ट्रंप के ठीक बगल वाली कुर्सी पर बैठे हुए थे। उनके बगल में बैठे होने के बावजूद ट्रंप ने नाटो को ‘पेपर टाइगर’ कहने और समिट में न आने की बात कहने में कोई संकोच नहीं किया। मार्क रुटे की मौजूदगी में दिया गया ट्रंप का यह बयान नाटो संगठन के लिए एक बहुत बड़ी कूटनीतिक असहजता का कारण बन गया। इससे यह भी जाहिर हो गया कि ट्रंप नाटो के शीर्ष नेतृत्व की बातों को कितनी कम अहमियत देते हैं।
यूरोपीय सुरक्षा और तनाव: इस बार 7 और 8 जुलाई को अंकारा में आयोजित होने वाली नाटो समिट के एजेंडे में कई विवादित मुद्दे शामिल हैं। नाटो के सदस्य देशों के बीच रक्षा बजट के खर्च को आपस में बांटने यानी बर्डन शेयरिंग को लेकर पहले से ही भारी असंतोष है। इसके साथ ही संपूर्ण यूरोपीय महाद्वीप की सुरक्षा व्यवस्था में अमेरिका की असल भूमिका और उसकी जवाबदेही को लेकर भी मतभेद गहरे हैं। यूरोपीय देश चाहते हैं कि अमेरिका उनकी सुरक्षा की पूरी गारंटी ले, जबकि ट्रंप प्रशासन रक्षा खर्च बढ़ाने पर लगातार जोर दे रहा है। इन तमाम अनसुलझे और गंभीर आर्थिक-सैन्य मुद्दों के कारण इस साल की बैठक बेहद तनावपूर्ण माहौल में शुरू हो रही है।
भविष्य की कूटनीति: नाटो समिट के इस पूरे घटनाक्रम और अमेरिकी राष्ट्रपति के बयानों से वैश्विक राजनीति में एक बड़ा बदलाव साफ दिखाई दे रहा है। ट्रंप का एयर फोर्स वन से तुर्किये की धरती पर उतरना और वहां यूक्रेन तथा सीरिया के राष्ट्रपतियों से अलग से बातचीत करना बेहद महत्वपूर्ण है। इन द्विपक्षीय मुलाकातों और नाटो वर्किंग सेशन के नतीजों पर पूरी दुनिया के नीति निर्माताओं की नजरें लगातार टिकी हुई हैं। अंकारा में होने वाले इस पूरे मंथन के बाद ट्रंप द्वारा की जाने वाली अंतिम प्रेस कॉन्फ्रेंस बेहद खास और ऐतिहासिक होगी। उस प्रेस कॉन्फ्रेंस से ही यह पूरी तरह साफ हो पाएगा कि नाटो का भविष्य और वैश्विक सुरक्षा की रूपरेखा क्या होने वाली है।




















































