भारत और अमेरिका की सेनाओं के बीच 22वां संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘युद्ध अभ्यास 2026’ 15 सितंबर से शुरू होकर 28 सितंबर तक चलेगा। इस बार दोनों देशों की सेनाओं के प्रशिक्षण का दायरा एक ही तरह के इलाके तक सीमित नहीं है, बल्कि दो अलग-अलग परिचालन क्षेत्रों में एक साथ अभ्यास किया जा रहा है। राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्र में सैनिक अलग तरह की युद्ध परिस्थितियों का सामना करेंगे, जबकि उत्तराखंड के ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्र में अभियान चलाने की क्षमताओं को परखा जाएगा। पहली बार इस तरह एक ही अभ्यास में बिल्कुल अलग भूभागों को शामिल किया गया है, जिससे दोनों सेनाओं को विभिन्न परिस्थितियों में संयुक्त अभियान चलाने का अनुभव मिल रहा है।
बीकानेर के पास रेगिस्तानी अभ्यास: राजस्थान में अभ्यास का चरण बीकानेर के पास स्थित महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में हो रहा है। यहां सैनिक रेगिस्तानी क्षेत्र में लंबी दूरी तक मार करने वाली फायरिंग और सटीक हमलों का अभ्यास कर रहे हैं। इसके साथ सैन्य गतिविधियों को तेजी से संचालित करने और संयुक्त अभियानों में बेहतर तालमेल स्थापित करने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। दोनों देशों की सेनाएं खुले और गर्म इलाके में अपनी संचालन क्षमता को परख रही हैं। इस चरण में संयुक्त अभियान के दौरान फायर सहायता, कमान और संचार जैसी महत्वपूर्ण सैन्य प्रक्रियाओं में आपसी समन्वय बढ़ाने का भी अभ्यास किया जा रहा है।
औली में पहाड़ी युद्ध की तैयारी: अभ्यास का दूसरा महत्वपूर्ण चरण उत्तराखंड के औली में चल रहा है। भारतीय और अमेरिकी सैनिक यहां ऊंचाई वाले इलाके में युद्ध संचालन की तैयारी कर रहे हैं। कठिन पहाड़ी भूभाग में अभियान चलाने के साथ हवाई आवाजाही और रसद व्यवस्था इस चरण के प्रमुख हिस्से हैं। औली वास्तविक नियंत्रण रेखा से करीब 95 किलोमीटर दूर है, इसलिए यहां का भूभाग अभ्यास को अलग तरह की परिचालन चुनौती देता है। दोनों सेनाएं ऐसी परिस्थितियों में एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करने, आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था बनाए रखने और संयुक्त अभियान को प्रभावी ढंग से संचालित करने की क्षमता को मजबूत कर रही हैं।
ड्रोन रोधी क्षमता पर भी जोर: करीब 700 सैनिक इस अभ्यास में हिस्सा ले रहे हैं और दोनों देशों से लगभग 350-350 सैनिक शामिल हैं। अभ्यास में पहली बार अमेरिकी मोबाइल कम ऊंचाई, धीमी गति और छोटे मानवरहित विमान से निपटने वाली एकीकृत प्रणाली को भारत में तैनात किया जा रहा है। इसके माध्यम से ड्रोन से आने वाले खतरे को पहचानने, उसकी निगरानी करने और उसे निष्क्रिय करने की क्षमताओं का अभ्यास किया जाएगा। युद्ध अभ्यास में कमान केंद्र आधारित अभ्यास, क्षेत्रीय प्रशिक्षण और संयुक्त जीवंत गोलीबारी प्रदर्शन जैसे चरण भी रखे गए हैं। इससे सैनिकों को वास्तविक सैन्य परिस्थितियों के करीब प्रशिक्षण देने और संयुक्त कार्रवाई की क्षमता मजबूत करने का अवसर मिल रहा है।
साझा होगी युद्ध की नई सीख: दोनों देशों की सेनाएं इस अभ्यास के दौरान अपनी आधुनिक तकनीक और हथियार प्रणालियों के साथ युद्ध से मिले अनुभवों को भी साझा कर रही हैं। वर्तमान समय के युद्धों में ड्रोन, ड्रोन रोधी प्रणालियां, सटीक मार और कई स्तरों पर एक साथ संचालित होने वाले अभियान महत्वपूर्ण हो गए हैं। इसी बदलते युद्ध स्वरूप को ध्यान में रखते हुए अभ्यास में नई सैन्य तकनीक और रणनीतियों को शामिल किया गया है। कमान, संचार, अग्नि सहायता, रसद और अभियान संबंधी प्रक्रियाओं में आपसी तालमेल बढ़ाना भी इसका अहम उद्देश्य है। अमेरिकी राजदूत सर्गियो गोर भी अभ्यास के महत्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शामिल होने वाले हैं, जो दोनों देशों के बढ़ते रक्षा सहयोग को दर्शाता है।
हिमालय से रेगिस्तान तक साझी तैयारी: भारत और अमेरिका के बीच यह सैन्य अभ्यास वर्ष 2004 में शुरू हुआ था और तब से दोनों देशों के बीच वार्षिक द्विपक्षीय अभ्यास के तौर पर जारी है। यह अभ्यास बारी-बारी से भारत और अमेरिका में आयोजित होता रहा है, लेकिन इस बार इसका दायरा और स्वरूप अलग है। राजस्थान का युद्धक्षेत्र पाकिस्तान सीमा के करीब है, जबकि उत्तराखंड का ऊंचाई वाला इलाका चीन सीमा के करीब स्थित है। एक ही अभ्यास में इन दोनों तरह के क्षेत्रों को शामिल करके दोनों सेनाएं अलग-अलग परिचालन परिस्थितियों में अपनी संयुक्तता और आपसी संचालन क्षमता को परख रही हैं। इस अभ्यास के जरिए आधुनिक युद्ध की बदलती जरूरतों के अनुरूप दोनों देशों के सैनिकों के बीच तालमेल और प्रशिक्षण को और मजबूत किया जा रहा है।














































