ब्रिटेन की राजनीतिक एकता को लेकर नई चिंता उस समय सामने आई, जब वेल्स, स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड के शीर्ष नेताओं ने सोमवार को वेल्स के कार्डिफ में मुलाकात की और एक अहम समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते में तीनों क्षेत्रों के लिए अधिक स्वायत्तता और अपने भविष्य को लेकर जनमत संग्रह कराने के अधिकार की मांग की गई है। इन नेताओं की एकजुटता को ब्रिटेन की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के लिए बड़ा संदेश माना जा रहा है। समझौते के बाद यह संभावना भी चर्चा में है कि आने वाले समय में वेल्स, स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड ब्रिटेन से अलग होने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
ब्रिटिश सरकार को साफ चेतावनी: तीनों क्षेत्रों के नेताओं ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम और उनकी सरकार को संवैधानिक बदलाव के लिए तैयार रहने का संदेश दिया है। उनका कहना है कि इन इलाकों का भविष्य यूरोपीय संघ के साथ है और इसलिए उनके राजनीतिक अधिकारों को लेकर नए सिरे से विचार किया जाना चाहिए। समझौते में ब्रिटेन की संसद की ओर संकेत करते हुए कहा गया कि इन द्वीपों और पूरी दुनिया में इस घटनाक्रम पर नजर रखने वालों के लिए इससे स्पष्ट संकेत कोई और नहीं हो सकता कि वेस्टमिंस्टर का समय अब समाप्त होने की ओर है। इस रुख ने ब्रिटेन के भीतर सत्ता और अधिकारों के बंटवारे को लेकर बहस को और तेज कर दिया है।
स्कॉटलैंड की आजादी का रास्ता: स्कॉटलैंड को लेकर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम पहले ही अपना रुख सामने रख चुके हैं। उन्होंने सांसदों से कहा था कि यदि सहमति बनती है तो वह स्कॉटलैंड की आजादी के लिए एक और जनमत संग्रह की मंजूरी दे सकते हैं। ऐसे में स्कॉटलैंड में स्वतंत्रता को लेकर चल रही मांग को राजनीतिक स्तर पर नई ताकत मिलती दिखाई दे रही है। वहीं उत्तरी आयरलैंड के मामले में गुड फ्राइडे समझौता उसे आयरलैंड के साथ एकीकरण पर जनमत संग्रह कराने का संवैधानिक अधिकार देता है। मतदान तब कराया जा सकता है, जब ऐसी संभावना दिखाई दे कि उत्तरी आयरलैंड की जनता ब्रिटेन से अलग होने के पक्ष में फैसला कर सकती है।
तीनों जगह आजादी समर्थक दल सत्ता में: ब्रिटेन के लिए चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि पहली बार स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड में आजादी के समर्थन वाली पार्टियां सत्ता में हैं। ये राजनीतिक दल अपने-अपने क्षेत्रों के भविष्य को लेकर ज्यादा अधिकार और स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं। तीनों क्षेत्रों के नेताओं का एक साथ आकर समझौते पर हस्ताक्षर करना इसी राजनीतिक रुख को और स्पष्ट करता है। अब सवाल केवल अधिक अधिकारों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इन क्षेत्रों के भविष्य और ब्रिटेन के साथ उनके संबंधों को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। इससे ब्रिटेन की केंद्रीय सरकार के सामने संवैधानिक बदलाव की चुनौती बढ़ती जा रही है।
ट्रंप के बयान ने बढ़ाई बेचैनी: इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान भी ब्रिटेन के लिए चिंता बढ़ाने वाला रहा। आयरलैंड की यात्रा के दौरान ट्रंप ने कहा था कि वह संयुक्त आयरलैंड को देखना पसंद करेंगे। उन्होंने उत्तरी आयरलैंड के आयरलैंड में शामिल होने को भी अच्छी बात बताया था। उनके इस रुख के बाद ब्रिटेन की सरकार पर दबाव और बढ़ गया है, क्योंकि उत्तरी आयरलैंड को लेकर पहले से ही संवैधानिक व्यवस्था मौजूद है। ऐसे समय में अमेरिका की ओर से आया यह बयान ब्रिटेन की आंतरिक राजनीतिक स्थिति के लिए एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम बन गया है।
ब्रिटेन के भविष्य पर उठे सवाल: वेल्स, स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड के नेताओं का समझौता, आजादी समर्थक दलों का सत्ता में होना, स्कॉटलैंड में नए जनमत संग्रह की संभावना और उत्तरी आयरलैंड के संवैधानिक अधिकार—इन सभी घटनाक्रमों ने ब्रिटेन के भविष्य को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। तीनों क्षेत्रों के नेता अधिक स्वायत्तता और अपने भविष्य पर निर्णय लेने के अधिकार की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर ब्रिटेन की सरकार के सामने इन मांगों से निपटने और संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव को लेकर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में यह समझौता ब्रिटेन की राजनीतिक एकता के लिए एक अहम मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।














































