17 सितंबर 2026 का दिन धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस दिन विश्वकर्मा पूजा, कन्या संक्रांति, लोलार्क षष्ठी और सूर्य षष्ठी जैसे कई महत्वपूर्ण पर्व और धार्मिक अवसर एक साथ पड़ रहे हैं। इसके अलावा शाम के समय स्कंद दर्शन का भी विशेष महत्व रहेगा। ऐसे में यह दिन भगवान विश्वकर्मा, सूर्य देव और भगवान कार्तिकेय की आराधना के लिए विशेष माना जा सकता है।
विश्वकर्मा पूजा मुख्य रूप से निर्माण, शिल्प, वास्तु, तकनीक, मशीन, औजार और कार्यक्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए महत्वपूर्ण होती है। इस दिन कारखानों, दुकानों, कार्यालयों, प्रतिष्ठानों और घरों में मौजूद मशीनों तथा औजारों की पूजा की जाती है। वहीं कन्या संक्रांति पर सूर्य देव की उपासना और दान-पुण्य का महत्व बताया गया है। लोलार्क षष्ठी तथा सूर्य षष्ठी में सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है, जबकि स्कंद दर्शन भगवान कार्तिकेय की पूजा और बाधाओं से मुक्ति की कामना से जुड़ा है।
विश्वकर्मा पूजा 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी। इस दिन सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश के साथ कन्या संक्रांति भी होगी।
- विश्वकर्मा पूजा की तारीख: 17 सितंबर 2026
- कन्या संक्रांति क्षण: सुबह 7:58 बजे
- विश्वकर्मा पूजा का प्रमुख शुभ समय: सुबह 7:58 बजे से दोपहर 12:40 बजे तक
- विस्तृत पूजा का शुभ समय: सुबह 7:15 बजे से शाम 4:15 बजे तक
- अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:51 बजे से दोपहर 12:40 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त को पूजा-पाठ और शुभ कार्यों के लिए विशेष महत्व दिया जाता है। इसलिए जो लोग विश्वकर्मा पूजा के लिए सबसे शुभ समय चुनना चाहते हैं, वे इस अवधि में भगवान विश्वकर्मा की आराधना कर सकते हैं।
विश्वकर्मा पूजा की पूरी सामग्री
भगवान विश्वकर्मा की पूजा के लिए पहले से सामग्री तैयार रखना शुभ माना जाता है। पूजा में निम्न सामग्री रखी जा सकती है—
- भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर या मूर्ति
- भगवान गणेश की प्रतिमा
- लकड़ी की चौकी
- पीला या लाल कपड़ा
- नवग्रह
- मिट्टी का कलश
- जनेऊ
- हल्दी
- रोली
- सिंदूर
- चंदन
- अक्षत
- मौली या कलावा
- सुपारी
- लौंग
- इलायची
- पान के पत्ते
- आम के पत्ते
- धूप
- कपूर
- देसी घी
- घी का दीपक
- हवन कुंड
- आम की लकड़ी
- गंगाजल
- सूखा गोला
- जटावाला नारियल
- पीले और लाल फूल, विशेषकर गेंदे के फूल
- मौसमी फल
- मिठाई
- इत्र
- दही
- खीरा
- शहद
- पंचमेवा
- हलवा
- पूजा में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख औजार और मशीनें
कार्यस्थल की प्रकृति के अनुसार कंप्यूटर, वाहन, मशीन, उपकरण और दूसरे प्रमुख साधनों को भी पूजा में शामिल किया जा सकता है।
विश्वकर्मा पूजा की विधि
विश्वकर्मा पूजा के दिन सबसे पहले घर, पूजा स्थल और कार्यस्थल की अच्छी तरह सफाई करें। विशेष रूप से फैक्ट्री, दुकान, कार्यालय या मशीनों वाले स्थान पर स्वच्छता का ध्यान रखें।
- सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल पर लकड़ी की चौकी रखें और उस पर पीला या लाल कपड़ा बिछाएं।
- चौकी पर भगवान विश्वकर्मा और भगवान गणेश की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
- पूजा स्थल पर कलश स्थापित करके दीप और धूप प्रज्वलित करें।
- भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा पर गंगाजल से अभिषेक करें।
- भगवान को वस्त्र, चंदन, रोली, अक्षत और पुष्प अर्पित करें।
- मशीनों, औजारों, वाहनों और कंप्यूटर सहित प्रमुख उपकरणों की सफाई करके उन पर भी गंगाजल छिड़कें।
- सभी प्रमुख औजारों और मशीनों पर रोली तथा अक्षत का तिलक लगाएं।
- फूल चढ़ाकर फल, मिठाई और हलवे का भोग लगाएं।
- भगवान विश्वकर्मा के मंत्रों का जाप करें।
- श्रद्धापूर्वक भगवान विश्वकर्मा की आरती करें।
- अंत में परिवार, कर्मचारियों और कार्यस्थल पर मौजूद लोगों को प्रसाद वितरित करें।
भगवान विश्वकर्मा के विशेष मंत्र
पूजा के दौरान श्रद्धा के साथ इन मंत्रों का जाप किया जा सकता है—
ॐ आधार शक्तपे नम:ॐ कूमयि नम:ॐ अनन्तम नम:पृथिव्यै नम:ॐ धराधराय नमःॐ स्थूतिस्माय नमःॐ विश्वरक्षकाय नमःॐ दुर्लभाय नमःॐ स्वर्गलोकाय नमःॐ पंचवकत्राय नमःॐ विश्वलल्लभाय नमःॐ धार्मिणे नमःॐ विश्वकर्मणे नमःॐ आधारशक्तये नमःॐ कूर्माय नमः
विशेष प्रार्थना मंत्र—
विश्वकर्मा महाभाग सुचित्रकर्मण प्रदायक। मया पूजितोऽसि देवेश कर्मसिद्धि प्रदायक भवेत्॥
भगवान विश्वकर्मा की संपूर्ण आरती
ओम जय श्री विश्वकर्मा, प्रभु जय श्री विश्वकर्मा।
सकल सृष्टि के कर्ता, रक्षक स्तुति धर्मा।। (1)
ओम जय श्री विश्वकर्मा, प्रभु जय श्री विश्वकर्मा।
आदि सृष्टि में विधि को, श्रुति उपदेश दिया।
जीव मात्र का जग में, ज्ञान विकास किया।। (2)
ओम जय श्री विश्वकर्मा, प्रभु जय श्री विश्वकर्मा।
ऋषि अंगिरा ने तप से, शांति नहीं पाई।
ध्यान किया जब प्रभु का, सकल सिद्धि आई।। (3)
ओम जय श्री विश्वकर्मा, प्रभु जय श्री विश्वकर्मा।
रोग ग्रस्त राजा ने जब आश्रय लीना।
संकट मोचन बन कर दूर दुःख कीना।। (4)
ओम जय श्री विश्वकर्मा, प्रभु जय श्री विश्वकर्मा।
जब रथकार दम्पति, तुम्हारी टेर करी।
सुनकर दीन प्रार्थना, विपत्ति हरी सगरी।। (5)
ओम जय श्री विश्वकर्मा, प्रभु जय श्री विश्वकर्मा।
एकानन चतुरानन, पंचानन राजे।
द्विभुज, चतुर्भुज, दसभुज, सकल रूप साजे।। (6)
ओम जय श्री विश्वकर्मा, प्रभु जय श्री विश्वकर्मा।
ध्यान धरे जब पद का, सकल सिद्धि आवे।
मन दुविधा मिट जाये, अटल शांति पावे।। (7)
ओम जय श्री विश्वकर्मा, प्रभु जय श्री विश्वकर्मा।
श्री विश्वकर्मा जी की आरती जो कोई जन गावे।।
कहत गजानन्द स्वामी, सुख सम्पत्ति पावे।। (8)
ओम जय श्री विश्वकर्मा, प्रभु जय श्री विश्वकर्मा।
भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी पौराणिक मान्यता कथा
पौराणिक मान्यताओं में भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि का प्रथम शिल्पकार, वास्तुकार और दिव्य निर्माणकर्ता माना गया है। उन्हें ब्रह्मा जी का सातवां पुत्र बताया जाता है। धार्मिक कथाओं के अनुसार उन्होंने देवताओं के लिए अनेक दिव्य भवनों, नगरों और अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया।
मान्यता है कि सतयुग का स्वर्गलोक, त्रेतायुग की सोने की लंका, द्वापरयुग की द्वारका नगरी और हस्तिनापुर जैसे महत्वपूर्ण स्थानों के निर्माण में भगवान विश्वकर्मा की भूमिका रही। भगवान शिव का त्रिशूल, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र और इंद्र का वज्र भी उनके द्वारा निर्मित बताए जाते हैं।
एक कथा के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच संघर्ष के दौरान देवताओं की सहायता के लिए महर्षि दधीचि की अस्थियों से अस्त्र तैयार किए गए थे। इसी कारण भगवान विश्वकर्मा की पूजा को शिल्प, तकनीक, निर्माण और कार्यकुशलता से जोड़कर देखा जाता है।
विश्वकर्मा पूजा पर क्या करें और क्या न करें
क्या करें:
- कार्यस्थल, मशीनों और औजारों की अच्छी तरह सफाई करें।
- मशीनों की आवश्यक ऑयलिंग और देखभाल करें।
- प्रमुख उपकरणों पर रोली-अक्षत लगाकर पूजा करें।
- कर्मचारियों और श्रमिकों को सम्मान दें।
- सामर्थ्य के अनुसार कर्मचारियों को उपहार या बोनस दें।
- पूजा के बाद प्रसाद वितरित करें।
क्या न करें:
- पूजा के दिन मशीनों और औजारों का अनावश्यक व्यावसायिक इस्तेमाल न करें।
- लोहे या किसी अन्य उपकरण का अपमान न करें।
- कार्यस्थल पर गंदगी न रखें।
- पूजा के दौरान विवाद और क्रोध से बचें।
पूजा के दिन मशीनों को विश्राम देने की परंपरा कई कार्यस्थलों पर विशेष रूप से निभाई जाती है।
विश्वकर्मा पूजा का विशेष उपाय
यदि व्यापार में लगातार मंदी चल रही हो या फैक्ट्री में बार-बार नुकसान हो रहा हो, तो पूजा के दिन अपने सबसे पुराने औजार पर काले धागे में एक छोटी सुपारी बांधकर उसे तिजोरी या मुख्य मशीन के पास रखने की परंपरा बताई गई है। इसे व्यापारिक सुरक्षा और स्थिरता की कामना से किया जाता है।
कन्या संक्रांति 2026: सूर्य पूजा और पुण्य काल
17 सितंबर को सूर्य सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को संक्रांति कहा जाता है। इसी कारण इस दिन कन्या संक्रांति मनाई जाएगी।
- संक्रांति प्रवेश काल: सुबह 7:58 बजे
- पुण्य काल: सुबह 7:58 बजे से दोपहर 2:30 बजे तक
कन्या संक्रांति पर सूर्य देव की आराधना, स्नान, अर्घ्य और दान-पुण्य का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन सूर्य देव की उपासना से आत्मविश्वास, तेज, आरोग्य और मान-सम्मान की कामना की जाती है।
कन्या संक्रांति की पूजा सामग्री
- तांबे का लोटा
- गंगाजल
- स्वच्छ जल
- लाल चंदन
- लाल फूल, जैसे गुलाब या गुड़हल
- अक्षत
- काली मिर्च
- गेहूं
- गुड़
- तांबे के बर्तन
- दान के लिए अनाज और वस्त्र
कन्या संक्रांति की पूजा विधि
- सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें।
- स्नान के पानी में गंगाजल मिलाया जा सकता है।
- तांबे के लोटे में स्वच्छ जल भरें।
- इसमें लाल चंदन, अक्षत और लाल पुष्प डालें।
- सूर्य देव की ओर मुख करके अर्घ्य दें।
- अर्घ्य देते समय
ॐ घृणि सूर्याय नमःमंत्र का जाप करें। - जल की धार के बीच से सूर्य देव के दर्शन करें।
- इसके बाद गायत्री मंत्र का पाठ करें।
- जरूरतमंद व्यक्ति या योग्य ब्राह्मण को अनाज, वस्त्र अथवा अन्य उपयोगी सामग्री का दान करें।
कन्या संक्रांति पर क्या करें और क्या न करें
क्या करें:
- तांबे के बर्तन का दान करें।
- गेहूं और गुड़ दान करें।
- लाल वस्त्र का दान करें।
- सूर्य देव को अर्घ्य दें।
- संयमित जीवनशैली अपनाएं।
क्या न करें:
- पुण्य काल में तामसिक भोजन से बचें।
- मदिरा और मांसाहार से दूर रहें।
- किसी से विवाद या कटु वाद-विवाद न करें।
- क्रोध में कोई निर्णय न लें।
सूर्य देव के मंत्र
ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमःॐ घृणि सूर्याय नमःॐ भास्कराय नमः
पारंपरिक श्लोक—
पुण्यं ददाति संक्रांतिः पापं हरति सर्वदा। तस्मात् स्नानं च दानं च कर्तव्यं भूतिमिच्छता॥
कन्या संक्रांति का विशेष उपाय
नौकरी में पदोन्नति रुक गई हो या सामाजिक मान-सम्मान में कमी महसूस हो रही हो, तो कन्या संक्रांति के दिन सवा किलो गेहूं और आधा किलो गुड़ तांबे के बर्तन में रखकर मंदिर में दान करने की परंपरा बताई गई है।
लोलार्क षष्ठी 2026: संतान सुख और सूर्य आराधना का पर्व
17 सितंबर को लोलार्क षष्ठी का भी धार्मिक महत्व रहेगा। इसे लोलार्क छठ के नाम से भी जाना जाता है। विशेष रूप से संतान सुख, संतान के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना से इस दिन सूर्य देव की आराधना और पवित्र स्नान किया जाता है।
- षष्ठी तिथि की समाप्ति: 17 सितंबर को सुबह 10:47 बजे
- विशेष नियम: सूर्य स्नान और अर्घ्य की धार्मिक प्रक्रिया निर्धारित समय के भीतर पूरी करने की परंपरा है।
लोलार्क षष्ठी की सामग्री
- तांबे का पात्र
- गंगाजल
- कच्चा दूध
- लाल चंदन
- अक्षत
- आक के फूल
- बेलपत्र
- दूर्वा
- मौसमी फल
- लाल वस्त्र
- कोहड़ा या कद्दू
- इच्छानुसार कोई फल या सब्जी
लोलार्क षष्ठी की पूजा विधि
परंपरा के अनुसार श्रद्धालु वाराणसी के प्रसिद्ध लोलार्क कुंड में स्नान करते हैं। जो लोग वहां नहीं जा सकते, वे घर पर पवित्र जल से स्नान कर सूर्य देव की पूजा कर सकते हैं।
- सूर्योदय से पहले स्नान की तैयारी करें।
- पवित्र जल से स्नान करें।
- तांबे के पात्र से सूर्य देव को अर्घ्य दें।
- संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपती साथ में स्नान और सूर्य पूजा करते हैं।
- पूजा के बाद किसी फल या सब्जी का त्याग करने का संकल्प लिया जाता है।
- जिस वस्तु का त्याग करने का संकल्प लें, उसे आगे भी निभाने की परंपरा है।
लोलार्क कुंड की पौराणिक कथा
काशी के लोलार्क कुंड को सूर्य उपासना से जुड़ा अत्यंत प्राचीन तीर्थ माना जाता है। धार्मिक कथा के अनुसार, माता सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव अत्यंत व्याकुल थे। इसी कालखंड में सूर्य देव ने इस क्षेत्र में तपस्या की थी।
मान्यता है कि सूर्य के तेज से यहां कुंड प्रकट हुआ। सूर्य देव इस स्थान की महिमा देखकर आनंद से झूम उठे, इसलिए इसका नाम लोलार्क पड़ा। एक अन्य कथा में देवासुर संग्राम के दौरान सूर्य देव के रथ का एक पहिया यहां गिरने से कुंड के निर्माण की बात कही गई है।
धार्मिक मान्यताओं में लोलार्क कुंड में स्नान को चर्म रोगों से मुक्ति और संतान सुख की कामना से जोड़ा जाता है।
लोलार्क षष्ठी पर क्या करें और क्या न करें
क्या करें:
- सूर्य देव को तांबे के पात्र से अर्घ्य दें।
- संतान सुख और संतान के स्वास्थ्य की कामना करें।
- फल या सब्जी के त्याग का संकल्प लें तो उसे ईमानदारी से निभाएं।
- धार्मिक नियमों और संयम का पालन करें।
क्या न करें:
- निर्धारित षष्ठी काल के बाद धार्मिक स्नान या अर्घ्य की प्रक्रिया न करें।
- झूठ बोलने से बचें।
- ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- संकल्प लेकर उसका उल्लंघन न करें।
लोलार्क षष्ठी के मंत्र
ॐ लोलार्काय नमःॐ सवित्रे नमः
विशेष श्लोक—
नमो धर्माय महते सूर्ययामिततेजसे। जगत्प्रसूतिहेतूनां लोलार्काय नमो नमः॥
संतान के लिए विशेष उपाय
संतान की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना से लोलार्क षष्ठी के दिन तांबे के छोटे टुकड़े पर सूर्य का चित्र बनवाकर उसे लाल धागे में धारण कराने की परंपरा बताई गई है।
सूर्य षष्ठी 2026: सूर्य देव की विशेष आराधना
17 सितंबर को सूर्य षष्ठी की पूजा का भी महत्व रहेगा। षष्ठी तिथि को सूर्योपासना से जोड़कर देखा जाता है। इस दिन सूर्य देव को अर्घ्य देने, मंत्र जाप करने और व्रत रखने की परंपरा है।
- षष्ठी तिथि: 17 सितंबर को सुबह 10:47 बजे तक
- धार्मिक मान्यता: उदयातिथि के कारण सूर्योपासना के लिए षष्ठी का महत्व बना रहेगा।
सूर्य षष्ठी पूजा सामग्री
- लाल चंदन
- अक्षत
- लाल फूल
- कपूर
- केसर
- शुद्ध घी
- कलावा
- धूप
- तांबे का लोटा
- आचमनी
- खजूर या गुड़ से बनी खीर
सूर्य षष्ठी की पूजा विधि
- सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- संभव हो तो लाल रंग के वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल पर सूर्य देव का चित्र या यंत्र स्थापित करें।
- धूप और दीप प्रज्वलित करें।
- सूर्य देव को लाल चंदन का तिलक लगाएं।
- केसर मिश्रित अक्षत अर्पित करें।
- लाल पुष्प चढ़ाएं।
- गुड़ या खजूर से बनी खीर का भोग लगाएं।
- तांबे के लोटे से सूर्य देव को तीन बार अर्घ्य दें।
- सूर्य चालीसा का पाठ करें।
- अंत में आरती करें।
सूर्य षष्ठी की पौराणिक मान्यताएं
सूर्य षष्ठी की कथा भगवान राम और माता सीता से भी जोड़ी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद अयोध्या लौटने और राज्याभिषेक के अवसर पर श्रीराम ने माता सीता के साथ सूर्य नारायण की विशेष उपासना की थी।
एक अन्य मान्यता के अनुसार द्वापर युग में कुंती पुत्र कर्ण सूर्य देव के महान उपासक थे। वे नदी में खड़े होकर सूर्य की आराधना करते थे। सूर्य देव की उपासना से उन्हें विशेष शक्ति और अजेयता का वरदान प्राप्त होने की कथा कही जाती है।
सूर्य षष्ठी के व्रत और पूजा को आरोग्य, तेज, आत्मविश्वास और सामाजिक प्रतिष्ठा की कामना से जोड़ा जाता है।
सूर्य षष्ठी पर क्या करें और क्या न करें
क्या करें:
- फलाहार व्रत रखें।
- शाम को नमक रहित मीठा भोजन ग्रहण करने की परंपरा निभाएं।
- सूर्य देव को अर्घ्य दें।
- सूर्य मंत्र और स्तोत्र का पाठ करें।
क्या न करें:
- क्रोध न करें।
- देर तक सोने से बचें।
- घर के बुजुर्गों का अपमान न करें।
- विशेष रूप से पिता का अनादर न करें।
सूर्य षष्ठी के मंत्र
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमःॐ आदित्याय नमःॐ मार्तण्डाय नमः
नेत्र और हड्डियों के लिए उपाय
जिन लोगों को आंखों या हड्डियों से संबंधित परेशानी रहती है, वे सूर्य षष्ठी के दिन नेत्रोपनिषद या आदित्य हृदय स्तोत्र का तीन बार पाठ कर सकते हैं। सूर्य देव को अर्पित जल की कुछ बूंदें आंखों पर लगाने की परंपरा भी बताई गई है।
स्कंद दर्शन 2026: शाम को करें भगवान कार्तिकेय की पूजा
17 सितंबर की शाम भगवान कार्तिकेय यानी स्कंद देव के दर्शन और पूजन का भी विशेष महत्व रहेगा।
- पूजन का उत्तम समय: शाम 6:15 बजे से रात 8:30 बजे तक
- विशेष समय: संध्याकाल और प्रदोष काल
स्कंद पूजा सामग्री
- भगवान कार्तिकेय की तस्वीर या मूर्ति
- भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा
- मोर पंख
- लाल या नीले फूल
- चंदन
- अक्षत
- कलावा
- घी का दीपक
- सुगंधित धूप
- पंचामृत
- फल
- मोदक या कंदमूल
स्कंद दर्शन की पूजा विधि
- शाम के समय स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूजा स्थल पर बैठें।
- भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा को पंचामृत और जल से स्नान कराएं।
- चंदन का तिलक लगाएं।
- अक्षत और पुष्प अर्पित करें।
- भगवान के वाहन मोर की प्रतीकात्मक उपस्थिति के रूप में मोर पंख चढ़ाएं।
- लाल या नीले फूल अर्पित करें।
- फल और मिठाई का भोग लगाएं।
- घी का दीपक जलाएं।
- भगवान कार्तिकेय की आरती करें।
- शत्रुओं, भय और जीवन की बाधाओं से मुक्ति की प्रार्थना करें।
भगवान कार्तिकेय और तारकासुर की कथा
भगवान कार्तिकेय को भगवान शिव और माता पार्वती का पुत्र तथा देवताओं का सेनापति माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार तारकासुर नामक असुर ने ऐसा वरदान प्राप्त किया था कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही संभव होगा।
तारकासुर के अत्याचार से देवता और तीनों लोक परेशान हो गए। इसके बाद भगवान शिव के तेज से कार्तिकेय का प्राकट्य हुआ। छह कृतिकाओं ने उनका पालन-पोषण किया, जिसके कारण वे कार्तिकेय कहलाए और छह मुख होने के कारण षडानन के नाम से भी प्रसिद्ध हुए।
धार्मिक मान्यता के अनुसार भाद्रपद शुक्ल षष्ठी के दिन भगवान स्कंद ने तारकासुर का वध किया था। इसलिए इस दिन उनके दर्शन और पूजा को भय, शत्रु बाधा तथा मुकदमे से जुड़ी परेशानियों से मुक्ति की कामना के साथ जोड़ा जाता है।
स्कंद दर्शन पर क्या करें और क्या न करें
क्या करें:
- भगवान कार्तिकेय को मोर पंख अर्पित करें।
- संभव हो तो मंदिर जाकर दर्शन करें।
- लाल फूल चढ़ाएं।
- बाधाओं और शत्रु भय से मुक्ति की प्रार्थना करें।
क्या न करें:
- किसी जीव या पक्षी को नुकसान न पहुंचाएं।
- मोर या मुर्गों को परेशान न करें।
- तामसिक भोजन से बचें।
- पूजा के दौरान क्रोध और विवाद से दूर रहें।
स्कंद देव के मंत्र
ॐ शारवानाभावाया नमःॐ स्कंदाय नमःॐ कुमाराय नमः
विशेष मंत्र—
ज्ञानशक्तिधरा स्कन्द वल्लीकल्याणा सुन्दर। देवसेनापते ब्रह्मन्य षण्मुखाय नमो नमः॥
कोर्ट-कचहरी और शत्रु बाधा के लिए उपाय
यदि किसी व्यक्ति का मामला लंबे समय से कोर्ट-कचहरी में चल रहा है या शत्रु लगातार परेशान कर रहे हैं, तो स्कंद दर्शन की शाम भगवान कार्तिकेय के सामने छह मुख वाला यानी छह बत्तियों वाला घी का दीपक जलाने और छह लाल फूल अर्पित करने की परंपरा बताई गई है।
17 सितंबर का धार्मिक सार
17 सितंबर 2026 का दिन कई महत्वपूर्ण धार्मिक अवसरों के कारण विशेष रहेगा। सुबह विश्वकर्मा पूजा के माध्यम से कार्यस्थल, मशीनों और औजारों की पूजा की जाएगी। इसी दिन कन्या संक्रांति के पुण्यकाल में सूर्य देव को अर्घ्य और दान-पुण्य किया जा सकता है। इसके साथ लोलार्क षष्ठी और सूर्य षष्ठी में सूर्य आराधना, स्नान और संतान सुख की कामना का महत्व रहेगा। शाम को स्कंद दर्शन के माध्यम से भगवान कार्तिकेय की पूजा की जाएगी।
इस दिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्वच्छता, संयम, दान, सूर्योपासना, कार्यस्थल के उपकरणों का सम्मान और जरूरतमंदों की सहायता जैसे कार्यों को विशेष महत्व दिया जा सकता है। पूजा-पाठ में श्रद्धा और नियमों का पालन करते हुए अपने सामर्थ्य के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान करना इस दिन की प्रमुख विशेषताओं में शामिल रहेगा।
















































