एक ही दिन तीन महत्वपूर्ण धार्मिक अवसर
18 सितंबर 2026, शुक्रवार का दिन धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण रहने वाला है। इस दिन संतान सप्तमी यानी मुक्ताभरण सप्तमी, 16 दिवसीय श्री महालक्ष्मी व्रत का आरंभ और ललिता सप्तमी यानी ललिता जयंती एक साथ मनाई जाएगी। संतान सप्तमी का व्रत विशेष रूप से संतान की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य, दीर्घायु और संतान प्राप्ति की कामना से किया जाता है। वहीं श्री महालक्ष्मी व्रत को धन, वैभव, सुख-समृद्धि और आर्थिक स्थिरता से जोड़कर देखा जाता है। ललिता सप्तमी राधा-कृष्ण की प्रिय सखी ललिता जी को समर्पित पर्व है, जिसका ब्रज क्षेत्र में विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है।
संतान सप्तमी के लिए भाद्रपद शुक्ल सप्तमी तिथि 17 सितंबर 2026 को सुबह 10:48 बजे शुरू होकर 18 सितंबर को दोपहर 01:01 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के अनुसार व्रत 18 सितंबर को रखा जाएगा और सप्तमी तिथि के समाप्त होने से पहले मुख्य पूजा, कथा और आवश्यक धार्मिक कार्य पूरे करना महत्वपूर्ण रहेगा। इसी दिन दोपहर 01:01 बजे से भाद्रपद शुक्ल अष्टमी शुरू होगी, जिसके साथ 16 दिवसीय श्री महालक्ष्मी व्रत का प्रथम दिन आरंभ होगा। दूसरी ओर सप्तमी तिथि रहने के कारण इसी दिन ललिता सप्तमी का पूजन भी किया जाएगा।
संतान सप्तमी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त
संतान सप्तमी का व्रत 18 सितंबर 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा। सप्तमी तिथि 17 सितंबर को सुबह 10:48 बजे शुरू हुई थी और 18 सितंबर को दोपहर 01:01 बजे समाप्त होगी। चूंकि यह व्रत उदयातिथि के अनुसार 18 सितंबर को रखा जा रहा है, इसलिए पूजा और कथा का प्रमुख कार्य सप्तमी तिथि के भीतर ही पूरा करना उचित माना गया है।
संतान सप्तमी की पूजा दोपहर के समय करने की परंपरा बताई गई है। इसलिए दोपहर 01:01 बजे सप्तमी तिथि समाप्त होने से पहले पूजा और कथा पूरी कर लेना विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहेगा।
संतान सप्तमी के प्रमुख मुहूर्त
- व्रत की तारीख: 18 सितंबर 2026, शुक्रवार
- सप्तमी तिथि समाप्त: दोपहर 01:01 बजे
- अमृत मुहूर्त: सुबह 09:24 बजे से 11:30 बजे तक
- अभिजित मुहूर्त: सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:40 बजे तक
- राहुकाल: सुबह 10:43 बजे से दोपहर 12:15 बजे तक
- मुख्य पूजा: दोपहर 01:01 बजे से पहले पूरी करें
अमृत मुहूर्त को पूजा के लिए विशेष रूप से शुभ माना गया है। अभिजित मुहूर्त भी अत्यंत शुभ समय माना जाता है, लेकिन राहुकाल के दौरान मुख्य संकल्प या नई शुरुआत करने से बचने की सलाह दी गई है।
संतान सप्तमी की पूजा विधि
संतान सप्तमी की पूजा में भगवान शिव और माता पार्वती के साथ पूरे शिव परिवार का पूजन किया जाता है। व्रत रखने वाली माताएं सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान शिव-पार्वती के सामने संतान के स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुख के लिए व्रत का संकल्प लें।
दोपहर की पूजा के लिए एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद एक सूती या रेशमी धागा लेकर उसमें सात गांठें लगाएं। इस धागे को हल्दी या केसर से रंगा जा सकता है। जिन परिवारों में परंपरा है, वहां चांदी का कड़ा या चूड़ी भी भगवान के सामने रखी जाती है।
पूजा के दौरान शिव परिवार को चंदन, रोली, अक्षत, बेलपत्र और फूल अर्पित करें। शुद्ध घी का दीपक जलाएं। संतान सप्तमी का विशेष भोग सात मीठे पुओं का माना गया है। इन्हें आटे और गुड़ से तैयार करके शुद्ध घी में बनाया जाता है। पूजा के बाद संतान सप्तमी की कथा पढ़ें या सुनें और आरती करें।
पूजा पूरी होने के बाद सात गांठों वाले पवित्र डोरे को भगवान शिव का आशीर्वाद मानकर माताएं अपने दाहिने हाथ की कलाई में धारण करती हैं। कुछ क्षेत्रों में यह डोरा संतान की कलाई पर भी बांधा जाता है। भोग लगाए गए सात पुओं में से कुछ ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को दान किए जाते हैं और शेष प्रसाद ग्रहण करके व्रत का पारण किया जाता है।
संतान सप्तमी की पौराणिक कथा
संतान सप्तमी की कथा में अयोध्या के प्रतापी राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी और उनके राजपुरोहित की पत्नी रूपमती का वर्णन मिलता है। दोनों में गहरी मित्रता थी। एक बार दोनों यमुना तट पर पहुंचीं, जहां उन्होंने कुछ महिलाओं को संतान सप्तमी का व्रत करते देखा। व्रत की महिमा सुनकर दोनों ने भी इसे जीवनभर करने का संकल्प लिया।
लेकिन राजमहल लौटने के बाद रानी चंद्रमुखी अपना संकल्प भूल गईं। दूसरी ओर ब्राह्मणी रूपमती ने संतान सप्तमी के व्रत का नियमपूर्वक पालन जारी रखा। मृत्यु के बाद दोनों को अपने कर्मों के अनुसार अलग-अलग योनियों में जन्म लेना पड़ा। रानी चंद्रमुखी को बंदरिया और लोमड़ी जैसी पशु योनियों में भटकना पड़ा, जबकि रूपमती को अच्छे पद और परिस्थितियां प्राप्त होती रहीं।
समय बीतने के बाद दोनों ने फिर मनुष्य जन्म लिया। पूर्व रानी चंद्रमुखी इस जन्म में ईश्वरी नाम की रानी बनीं। उन्हें संतान तो प्राप्त हुई, लेकिन उनकी संतान जीवित नहीं रहती थी। वहीं पूर्व जन्म की ब्राह्मणी रूपमती अब भूषणा नाम से जन्मी और उसके आठ सुंदर तथा दीर्घायु पुत्र हुए।
रानी ईश्वरी को भूषणा के बच्चों को देखकर ईर्ष्या होने लगी। उसने कई बार उनके बच्चों को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया। कभी उन्हें विष देने की कोशिश की गई तो कभी कुएं में फेंकने का प्रयास किया गया। लेकिन भगवान शिव की कृपा से भूषणा के बच्चों का कोई नुकसान नहीं हुआ।
आखिरकार रानी ईश्वरी ने भूषणा से पूछा कि उसके बच्चों पर ऐसा कौन-सा आशीर्वाद है कि बार-बार संकट आने के बावजूद उनका बाल भी बांका नहीं हुआ। तब भूषणा ने उसे पूर्व जन्म का संकल्प याद दिलाया और बताया कि संतान सप्तमी के व्रत के प्रभाव से उसे संतान सुख और बच्चों की रक्षा का आशीर्वाद प्राप्त हुआ है। इसके बाद रानी ईश्वरी ने भी विधि-विधान से संतान सप्तमी का व्रत शुरू किया और उसे उत्तम संतान सुख प्राप्त हुआ।
संतान सप्तमी के विशेष उपाय और मंत्र
संतान की रक्षा और स्वास्थ्य के लिए पूजा में सात गांठों वाला डोरा या चांदी की चूड़ी भगवान के सामने रखकर पूजित की जाती है। इसे पूरे वर्ष संभालकर रखने की परंपरा बताई गई है। यदि बच्चे को गंभीर बीमारी या नजर लगने जैसी समस्या हो, तो इस पूजित डोरे या चूड़ी को कुछ समय के लिए स्वच्छ जल में रखकर वह जल बच्चे को पिलाने का उपाय बताया गया है।
संतान प्राप्ति की कामना रखने वाले दंपती पति-पत्नी दोनों मिलकर शिव-पार्वती का पंचामृत से अभिषेक करें। इसके बाद सात मीठे पुओं का भोग लगाकर किसी जरूरतमंद बच्चे को खिलाने का उपाय बताया गया है।
संतान सप्तमी के दिन भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करते हुए “ॐ उमामहेश्वराभ्याम् नमः” मंत्र का जाप किया जा सकता है। संतान प्राप्ति की कामना के लिए संतान गोपाल मंत्र का जाप भी किया जाता है—
“ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः।।“
माता गौरी की कृपा के लिए—
“ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तुते।।“
सात गांठों वाला डोरा बांधते समय “ॐ नमः शिवाय” या “महालक्ष्म्यै नमः” का स्मरण किया जा सकता है। मंत्रों का जाप 11, 21 या 108 बार किया जा सकता है। जाप के लिए कुश या ऊन के आसन का प्रयोग करने तथा शिव मंत्र के लिए रुद्राक्ष और गोपाल मंत्र के लिए तुलसी या चंदन की माला का प्रयोग करने की परंपरा बताई गई है।
संतान सप्तमी की पूजा सामग्री
मुख्य पूजा सामग्री
- भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति या तस्वीर
- संभव हो तो पूरे शिव परिवार की तस्वीर
- लकड़ी की चौकी
- लाल या पीला कपड़ा
- तांबे या मिट्टी का कलश
- आम या अशोक के पांच से सात पत्ते
- पानी वाला नारियल
- कलावा
- अक्षत
- गंगाजल
अभिषेक और श्रृंगार सामग्री
- दूध
- दही
- शहद
- शक्कर
- घी
- रोली
- कुमकुम
- हल्दी
- चंदन
- अबीर-गुलाल
- बेलपत्र
- धतूरा
- आक के फूल
- जनेऊ
- मेहंदी
- सिंदूर
- चूड़ियां
- बिंदी
- फूल और माला
भोग और अन्य सामग्री
- सात मीठे पुए
- मौसमी फल
- पान के पत्ते
- सुपारी
- लौंग
- इलायची
- दीपक
- रुई की बत्ती
- शुद्ध देसी घी
- कपूर
- धूपबत्ती
- ब्राह्मण या जरूरतमंद के लिए दक्षिणा
- सात गांठों वाला हल्दी से रंगा हुआ डोरा या चांदी का कड़ा
पारण (व्रत खोलने) का समय: दोपहर 01:01 बजे सप्तमी तिथि समाप्त होने के बाद या शाम को पूजा के मुख्य प्रसाद (7 मीठे पुए) को खाकर व्रत का पारण करें।
18 सितंबर से शुरू होगा 16 दिवसीय श्री महालक्ष्मी व्रत
18 सितंबर 2026, शुक्रवार से 16 दिवसीय श्री महालक्ष्मी व्रत का भी आरंभ होगा। यह व्रत धन, सुख-समृद्धि, वैभव और आर्थिक उन्नति की कामना से किया जाता है। दिए गए विवरण के अनुसार यह व्रत 18 सितंबर से शुरू होकर 03 अक्टूबर 2026 को आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर समाप्त होगा।
18 सितंबर को दोपहर 01:01 बजे से अष्टमी तिथि प्रारंभ होगी। इसलिए इस दिन महालक्ष्मी व्रत के प्रथम दिन की मुख्य पूजा शाम के समय करने की परंपरा बताई गई है।
महालक्ष्मी व्रत के प्रमुख समय
- आरंभ: 18 सितंबर 2026, शुक्रवार
- अष्टमी तिथि प्रारंभ: दोपहर 01:01 बजे
- अष्टमी तिथि समाप्त: 19 सितंबर को दोपहर 02:26 बजे
- प्रदोष काल का शुभ समय: शाम 06:15 बजे से रात 08:35 बजे तक
- लाभ-अमृत चौघड़िया: दोपहर 12:15 बजे से 03:20 बजे तक
- 16 दिवसीय व्रत का समापन: 03 अक्टूबर 2026
महालक्ष्मी व्रत की पूजा विधि
व्रत के पहले दिन सुबह या शाम हाथ में जल और अक्षत लेकर माता महालक्ष्मी के 16 दिवसीय व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल पर लकड़ी की चौकी रखें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएं। अक्षत की ढेरी बनाकर उस पर कलश स्थापित करें। कलश में जल भरकर उसमें सिक्का और दूर्वा रखें, आम के पत्ते लगाएं और ऊपर पानी वाला नारियल स्थापित करें।
कलश के पास गजलक्ष्मी स्वरूप में माता लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। माता को गंगाजल से पवित्र करके लाल चुनरी अर्पित करें। पूजा की थाली में 16 गांठों वाला महालक्ष्मी सूत्र रखें और प्रत्येक गांठ पर कुमकुम लगाएं।
माता को रोली, कुमकुम, चंदन, अबीर, गुलाल, अक्षत, कमलगट्टा और सिंदूर अर्पित करें। लाल गुलाब या कमल के फूल चढ़ाएं। शुद्ध घी का दीपक जलाएं और माता को खीर, सफेद मिठाई, पंचामृत तथा मौसमी फल का भोग लगाएं।
पूजा के दौरान 16 अक्षत हाथ में लेकर महालक्ष्मी व्रत की कथा पढ़ें या सुनें। इसके बाद आरती करें। पूजा समाप्त होने के बाद 16 गांठों वाला महालक्ष्मी सूत्र महिलाएं बाएं हाथ में और पुरुष दाहिने हाथ में धारण करते हैं। दिए गए विवरण के अनुसार यह धागा 16 दिनों तक बांधे रखने की परंपरा है।
महालक्ष्मी व्रत की पौराणिक कथा
कथा के अनुसार महाभारत काल में हस्तिनापुर का एक गरीब ब्राह्मण भगवान विष्णु की कठोर तपस्या करता था। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे दर्शन दिए। ब्राह्मण ने अपनी दरिद्रता दूर करने का उपाय पूछा।
भगवान विष्णु ने उसे बताया कि मंदिर में प्रतिदिन एक वृद्ध महिला आती हैं, जो वास्तव में माता लक्ष्मी का स्वरूप हैं। ब्राह्मण ने उन्हें अपने घर आने का निमंत्रण दिया। इसके बाद माता लक्ष्मी ने प्रकट होकर उसे भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से 16 दिनों तक महालक्ष्मी व्रत करने की विधि बताई।
ब्राह्मण ने श्रद्धा और नियमपूर्वक 16 दिनों तक व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसके जीवन में धन-धान्य और समृद्धि आई। बाद में माता कुंती और गांधारी द्वारा भी इस व्रत को राजपाट और सुख-समृद्धि के लिए किए जाने का वर्णन मिलता है। कथा में यह भी बताया जाता है कि संकट के समय महारानी द्रौपदी ने महालक्ष्मी व्रत किया और पांडवों को उनका खोया हुआ राज्य वापस प्राप्त हुआ।
महालक्ष्मी व्रत में क्या करें और क्या न करें
क्या करें
- पूरे 16 दिनों तक सुबह और शाम मुख्य द्वार पर घी का दीपक जलाएं।
- रोज शाम माता लक्ष्मी के सामने श्रीसूक्त का पाठ करें।
- जो लोग पूरे 16 दिन उपवास नहीं रख सकते, वे पहले दिन, आठवें दिन और अंतिम यानी सोलहवें दिन व्रत रखने की परंपरा अपना सकते हैं।
- पूजा स्थल को स्वच्छ और व्यवस्थित रखें।
- माता लक्ष्मी के सामने श्रद्धा से दीपक और धूप जलाएं।
क्या न करें
- 16 दिनों के दौरान सात्विकता बनाए रखें।
- लहसुन, प्याज, मांस और मदिरा का सेवन न करें।
- सूर्यास्त के समय घर में सोने से बचें।
- सूर्यास्त के समय किसी को उधार धन देने से बचें।
- घर की महिलाओं या जरूरतमंद व्यक्ति का अपमान न करें।
- पूजा के दौरान मन में ईर्ष्या और नकारात्मकता न रखें।
महालक्ष्मी व्रत के विशेष उपाय और मंत्र
धन की स्थिरता और समृद्धि की कामना से पूजा के समय माता लक्ष्मी के चरणों में 16 कमलगट्टे और 16 कौड़ियां अर्पित करने का उपाय बताया गया है। 16 दिनों का व्रत पूरा होने के बाद इन्हें लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी में रखने की परंपरा है।
कर्ज से मुक्ति की कामना के लिए महालक्ष्मी पूजन के समय एक कटोरी में हल्दी की गांठें रखकर पूजा करने और पूजा के बाद उन्हें मुख्य तिजोरी में स्थापित करने का उपाय बताया गया है।
माता महालक्ष्मी के मंत्र का 108 बार जाप किया जा सकता है—
“ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः”
ऐश्वर्य और आर्थिक बाधाओं से मुक्ति की कामना के लिए—
“ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभ्यो नमः”
पारण का समय: जो लोग केवल पहले दिन का उपवास रख रहे हैं, वे शाम की मुख्य पूजा और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद (या रात्रि में सात्विक/फलाहारी भोजन से) व्रत का पारण कर सकते हैं। जो 16 दिनों का अखंड व्रत रख रहे हैं, उनका पारण 03 अक्टूबर 2026 को होगा।
ललिता सप्तमी और ललिता जयंती
18 सितंबर 2026 को ही ललिता सप्तमी यानी ललिता जयंती भी मनाई जाएगी। ललिता जी को भगवान श्रीकृष्ण की आल्हादिनी शक्ति राधा रानी की आठ प्रमुख सखियों में सबसे प्रधान और प्रिय सखी माना जाता है। ब्रज क्षेत्र, विशेषकर मथुरा, वृंदावन और बरसाना में इस पर्व का विशेष धार्मिक महत्व है।
ललिता सप्तमी के दिन राधा-कृष्ण की भक्ति के साथ ललिता जी का स्मरण और पूजन किया जाता है। दिए गए विवरण के अनुसार 18 सितंबर को सप्तमी तिथि दोपहर 01:01 बजे तक रहेगी, इसलिए मुख्य पूजा इसी समय से पहले पूरी करनी होगी।
ललिता सप्तमी के शुभ मुहूर्त
- तारीख: 18 सितंबर 2026, शुक्रवार
- सप्तमी तिथि: दोपहर 01:01 बजे तक
- अमृत मुहूर्त: सुबह 09:24 बजे से 11:30 बजे तक
- अभिजित मुहूर्त: सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:40 बजे तक
- राहुकाल: सुबह 10:43 बजे से दोपहर 12:15 बजे तक
- मुख्य पूजा: दोपहर 01:01 बजे से पहले
ललिता सप्तमी की पूजा विधि
सुबह स्नान करके पीले वस्त्र धारण करें। हाथ में जल लेकर ललिता जी की जयंती और व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल पर पीला कपड़ा बिछाकर राधा-कृष्ण की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। यदि ललिता जी का अलग चित्र उपलब्ध हो तो उसे भी स्थापित किया जा सकता है। अन्यथा राधा-कृष्ण की पूजा करते हुए ललिता जी का ध्यान किया जाता है।
धातु की मूर्ति होने पर पंचामृत से अभिषेक करें। चित्र होने पर गंगाजल के छींटे देकर पूजा की जा सकती है। इसके बाद गोपी चंदन, रोली, इत्र और पीले फूल अर्पित करें। राधा जी और ललिता जी के लिए सिंदूर, मेहंदी, चूड़ियां और बिंदी जैसी सुहाग सामग्री भी अर्पित की जाती है।
पूजा के दौरान घी का दीपक और धूप जलाएं। मिश्री-माखन, मावे की बर्फी, हलवा या सात्विक सफेद मिठाई का भोग लगाया जा सकता है। इसके बाद ललिता जी की कथा पढ़ें या सुनें। राधा-कृष्ण के भजनों और कीर्तन के बाद संयुक्त आरती करें।
ललिता जयंती की पौराणिक कथा
ललिता जी का जन्म द्वापर युग में बरसाना के निकट ऊंचागांव में हुआ माना जाता है। उन्हें राधा रानी से आयु में कुछ दिन बड़ी और रूप, गुण तथा संगीत में निपुण बताया गया है। राधा-कृष्ण की निकुंज लीलाओं में ललिता जी की विशेष भूमिका मानी जाती है।
कथा परंपरा के अनुसार जब कभी राधा और कृष्ण के बीच मान यानी रूठने की स्थिति उत्पन्न होती थी, तब ललिता जी अपने सखी भाव और बुद्धिमत्ता से दोनों के बीच प्रेम और मिलन का मार्ग बनाती थीं। राधा-कृष्ण की लीलाओं में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
भक्ति परंपरा में ललिता देवी की पूजा को राधा-कृष्ण की अनन्य भक्ति से जोड़ा जाता है। इस दिन व्रत और पूजा करने वाली महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य और गृहस्थ सुख की कामना की जाती है।
ललिता सप्तमी के विशेष उपाय और मंत्र
सुखी वैवाहिक जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना से ललिता जी को सिंदूर और इत्र अर्पित करने का उपाय बताया गया है। पूजा के बाद उस सिंदूर को सुरक्षित रखकर नियमित रूप से मांग में लगाने की परंपरा बताई गई है।
प्रेम और पारिवारिक संबंधों में मधुरता के लिए राधा-कृष्ण को माखन-मिश्री का भोग लगाकर प्रसाद सखियों और परिवार के सदस्यों में बांटने का उपाय बताया गया है।
ललिता जी की कृपा के लिए इस मंत्र का जाप किया जा सकता है—
“ॐ ललिता देव्यै नमः”
राधा-कृष्ण की भक्ति के लिए—
“जय श्री राधे, जय श्री कृष्णा”
पारण का समय: दोपहर 01:01 बजे के बाद जब सप्तमी तिथि समाप्त हो जाए, तब भगवान कृष्ण के प्रिय माखन-मिश्री के प्रसाद को ग्रहण करके व्रत का पारण करें।
18 सितंबर की पूजा के लिए अंतिम तैयारी
18 सितंबर की सुबह स्नान के बाद सूर्यदेव को जल अर्पित करके दिन की शुरुआत की जा सकती है। इसके बाद संतान सप्तमी और ललिता सप्तमी से संबंधित पूजा सामग्री तैयार रखें। सात गांठों वाला डोरा, सात मीठे पुए और शिव परिवार की पूजा की व्यवस्था पहले से कर लें।
सुबह 09:24 बजे से 11:30 बजे तक अमृत मुहूर्त और 11:50 बजे से 12:40 बजे तक अभिजित मुहूर्त को ध्यान में रखते हुए संतान सप्तमी और ललिता सप्तमी की मुख्य पूजा पूरी की जा सकती है। हालांकि सुबह 10:43 बजे से दोपहर 12:15 बजे तक राहुकाल रहेगा, इसलिए दिए गए विवरण के अनुसार इस अवधि में मुख्य संकल्प या नई शुरुआत से बचना उचित रहेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सप्तमी तिथि दोपहर 01:01 बजे समाप्त हो रही है, इसलिए दोनों सप्तमी पर्वों की मुख्य पूजा और कथा इस समय से पहले पूरी कर लें।
दोपहर 01:01 बजे के बाद अष्टमी तिथि शुरू होगी और इसी के साथ 16 दिवसीय श्री महालक्ष्मी व्रत का प्रथम दिन आरंभ होगा। महालक्ष्मी पूजन के लिए शाम का प्रदोष काल, यानी शाम 06:15 बजे से रात 08:35 बजे तक का समय दिया गया है। इस दौरान माता लक्ष्मी की स्थापना, 16 गांठों वाले सूत्र की पूजा, दीप प्रज्वलन, भोग, कथा और आरती की जा सकती है।
18 सितंबर का धार्मिक महत्व
18 सितंबर 2026 का दिन इसलिए विशेष हो जाता है क्योंकि एक ही दिन संतान सुख, समृद्धि और राधा-कृष्ण भक्ति से जुड़े तीन अलग-अलग धार्मिक अवसर सामने आ रहे हैं। संतान सप्तमी में भगवान शिव-पार्वती की आराधना और सात गांठों वाले डोरे का विशेष महत्व है। श्री महालक्ष्मी व्रत में 16 दिनों तक माता लक्ष्मी की उपासना और 16 गांठों वाले सूत्र की परंपरा है। वहीं ललिता सप्तमी में राधा-कृष्ण की भक्ति के साथ ललिता जी का स्मरण और पूजन किया जाता है।
इस दिन श्रद्धालुओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात पूजा के समय का ध्यान रखना है। संतान सप्तमी और ललिता सप्तमी की सप्तमी तिथि दोपहर 01:01 बजे समाप्त हो जाएगी, इसलिए इन दोनों पर्वों की मुख्य पूजा और कथा उससे पहले पूरी करना आवश्यक रहेगा। इसके बाद अष्टमी तिथि के साथ महालक्ष्मी व्रत का पहला दिन शुरू होगा और शाम के समय लक्ष्मी पूजन किया जाएगा।
इस प्रकार 18 सितंबर 2026 का शुक्रवार धार्मिक अनुष्ठानों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण दिन रहेगा। श्रद्धा, स्वच्छता, सात्विकता और विधि-विधान के साथ संतान सप्तमी, महालक्ष्मी व्रत तथा ललिता सप्तमी की पूजा करने से भक्त अपने-अपने संकल्प के अनुसार भगवान शिव-पार्वती, माता महालक्ष्मी और राधा-कृष्ण की आराधना कर सकते हैं।














































