प्रतापगढ़ के कुंडा में हुए चर्चित सीओ जियाउल हक हत्याकांड में पूर्व मंत्री और विधायक राजा भैया को विशेष सीबीआई अदालत के फैसले से राहत मिली है। केंद्रीय जांच ब्यूरो ने मामले की दोबारा जांच पूरी करने के बाद जो अंतिम रिपोर्ट अदालत में दाखिल की, उसमें राजा भैया को आरोपी नहीं बनाया गया। जांच एजेंसी ने कहा कि उनके खिलाफ अभियोजन चलाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले। अदालत ने सीबीआई की रिपोर्ट और मामले से जुड़े तथ्यों पर विचार करने के बाद इसे स्वीकार कर लिया तथा राजा भैया के खिलाफ आगे कानूनी कार्रवाई की मांग को खारिज कर दिया। इस आदेश से राजा भैया की कथित भूमिका को लेकर चल रही दोबारा जांच से जुड़ी न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट हुई है।
परवीन आजाद की मांग पर हुई थी दोबारा जांच:- सीओ जियाउल हक की पत्नी परवीन आजाद ने पहले दाखिल की गई सीबीआई क्लोजर रिपोर्ट का विरोध किया था। उन्होंने राजा भैया और अन्य नामजद लोगों की भूमिका की दोबारा जांच की मांग की थी। इसी मांग से जुड़े घटनाक्रम के बाद मामला फिर से जांच के दायरे में आया। सितंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को राजा भैया की कथित भूमिका की जांच करने का निर्देश दिया। इसके बाद अक्टूबर 2023 में सीबीआई ने दोबारा जांच शुरू की। एजेंसी ने जांच पूरी करने के बाद दिसंबर 2023 में फिर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की और उसमें राजा भैया को आरोपी नहीं बनाया। रिपोर्ट में उनके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने की बात कही गई थी।
2013 से चला आ रहा है मामला:- जियाउल हक हत्याकांड की शुरुआत 2 मार्च 2013 को हुई थी। प्रतापगढ़ के कुंडा क्षेत्र के बलीपुर गांव में प्रधान नन्हे यादव की हत्या के बाद हालात बिगड़ गए थे। कानून-व्यवस्था संभालने के लिए वहां पहुंचे तत्कालीन सीओ जियाउल हक पर भीड़ ने हमला कर दिया और उनकी हत्या हो गई। घटना के बाद जियाउल हक की पत्नी परवीन आजाद ने राजा भैया और उनके करीबियों की भूमिका पर आरोप लगाए थे। इसके बाद मामला सीबीआई को सौंपा गया। सीबीआई ने 2013 में जांच करते हुए जियाउल हक की हत्या से जुड़े मामले में आरोपपत्र दाखिल किया था, लेकिन राजा भैया को उसमें आरोपी के रूप में शामिल नहीं किया था।
पहली क्लोजर रिपोर्ट पर भी उठे थे सवाल:- शुरुआती जांच के बाद सीबीआई ने राजा भैया को क्लीन चिट देते हुए उनकी पत्नी की शिकायत से जुड़े मामले में तकनीकी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी। उस समय विशेष सीबीआई अदालत ने क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया था और जांच आगे बढ़ाने का आदेश दिया था। इस प्रक्रिया के बाद मामला लंबे समय तक न्यायिक स्तर पर चलता रहा। परवीन आजाद ने सीबीआई की क्लीन चिट का विरोध करते हुए अदालत का रुख करने की बात भी कही थी। बाद के वर्षों में इस मामले में अलग-अलग न्यायिक स्तरों पर सुनवाई हुई और अंततः सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राजा भैया की कथित भूमिका को लेकर दोबारा जांच का रास्ता खुला।
दोबारा जांच में भी आरोप तय करने लायक साक्ष्य नहीं मिले:- सीबीआई की दोबारा जांच का मुख्य बिंदु राजा भैया की कथित भूमिका और उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों से जुड़ा था। जांच पूरी होने के बाद एजेंसी ने अदालत को बताया कि उनके खिलाफ अभियोजन चलाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हुए। इसी आधार पर उन्हें दोबारा दाखिल अंतिम रिपोर्ट में आरोपी नहीं बनाया गया। अदालत ने सीबीआई की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद राजा भैया के खिलाफ आगे कानूनी कार्रवाई की मांग को खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत का यह आदेश केवल राजा भैया की कथित भूमिका और उससे जुड़ी दोबारा जांच के संदर्भ में है। हत्याकांड के अन्य आरोपियों के खिलाफ चल रही कानूनी प्रक्रिया इससे अलग है।
राजा भैया के लिए कानूनी मोर्चे पर बड़ी राहत:- विशेष सीबीआई अदालत के इस फैसले के बाद जियाउल हक हत्याकांड में राजा भैया के खिलाफ दोबारा शुरू हुई जांच का यह चरण समाप्त हो गया है। 2013 की घटना, पहली सीबीआई जांच, क्लोजर रिपोर्ट पर आपत्ति, न्यायिक सुनवाई और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद हुई पुनः जांच के बाद अदालत ने सीबीआई की अंतिम रिपोर्ट स्वीकार कर ली। इससे राजा भैया के खिलाफ इस मामले में आगे अभियोजन चलाने की मांग को राहत मिली है। वहीं, मामले से जुड़े अन्य आरोपियों की कानूनी स्थिति और उनके खिलाफ चल रही कार्रवाई इस फैसले से अलग रहेगी।













































