इजरायल में आज हो रहे संसदीय चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य पर फैसला होना है। सात अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद देश में सुरक्षा व्यवस्था और सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर गंभीर बहस छिड़ी हुई है। इसके बाद शुरू हुए सैन्य संघर्षों और नेतन्याहू की घरेलू तथा विदेश नीतियों को लेकर उठे सवालों ने चुनाव को महत्वपूर्ण बना दिया है। नेतन्याहू अपनी दक्षिणपंथी सरकार को सत्ता में बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि विपक्षी नेता उनके नेतृत्व को चुनौती दे रहे हैं। पूर्व सेना प्रमुख गादी ईसेनकोट और पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट इस मुकाबले के प्रमुख चेहरे हैं। चुनाव को नेतन्याहू के लंबे राजनीतिक कार्यकाल की परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि मतदाताओं को यह तय करना है कि मौजूदा नेतृत्व पर भरोसा जारी रखा जाए या देश की राजनीति को नई दिशा दी जाए।
मतदान से पहले गठबंधन की तस्वीर बनी अनिश्चित: चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में किसी भी राजनीतिक गुट को स्पष्ट बहुमत मिलने के संकेत नहीं मिले हैं। इस वजह से चुनाव के बाद सरकार बनाने की प्रक्रिया में छोटे दलों और उनके समर्थन की भूमिका अहम रहने वाली है। इजरायल का क्षेत्रफल भारत के पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम के लगभग बराबर है, लेकिन यहां की चुनाव प्रणाली में पूरे देश को एक ही निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है। मतदाता किसी व्यक्तिगत उम्मीदवार के बजाय अपनी पसंद की पार्टी को वोट देते हैं। राजनीतिक दलों को मिले मतों के अनुपात के आधार पर संसद में सीटों का बंटवारा होता है। इस व्यवस्था के चलते किसी पार्टी को सबसे ज्यादा सीटें मिलने के बावजूद सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है। मौजूदा सर्वेक्षणों से यही संकेत मिल रहा है कि चुनावी नतीजों के बाद राजनीतिक दलों को बहुमत जुटाने के लिए बातचीत और गठबंधन की राह अपनानी पड़ सकती है।
120 सदस्यीय संसद और सरकार गठन की प्रक्रिया: इजरायल की संसद नेसेट में कुल 120 सीटें हैं और चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत कराया जाता है। किसी पार्टी को संसद में प्रवेश के लिए कम से कम 3.25 प्रतिशत मत हासिल करने होते हैं। इससे कम मत पाने वाले दल संसद में सीटें हासिल नहीं कर सकते, इसलिए चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन और विलय की रणनीति महत्वपूर्ण हो जाती है। संसद का सामान्य कार्यकाल चार वर्ष है, लेकिन संसद समय से पहले भंग होने, बजट पारित न होने या सरकार का गठन नहीं हो पाने की स्थिति में मध्यावधि चुनाव भी कराए जा सकते हैं। चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाला दल अपने आप सरकार नहीं बना लेता। राष्ट्रपति विभिन्न राजनीतिक दलों और गुटों से परामर्श करने के बाद किसी सांसद को सरकार बनाने के लिए नामित करते हैं। इस सांसद को नेसेट में कम से कम 61 सदस्यों का समर्थन हासिल करना होता है। इसलिए चुनाव का वास्तविक राजनीतिक परिणाम केवल मतों और सीटों से नहीं, बल्कि बाद में बनने वाले गठबंधनों से भी तय होगा।
करीब 19 साल के प्रधानमंत्री कार्यकाल पर उठे सवाल: लिकुड पार्टी के नेता बेंजामिन नेतन्याहू वर्ष 1996 के बाद अलग-अलग अवधियों में लगभग 19 साल तक प्रधानमंत्री पद पर रह चुके हैं। इतने लंबे राजनीतिक अनुभव के बावजूद उनका मौजूदा कार्यकाल कई विवादों से घिरा रहा है। सात अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद सरकार की कार्रवाई और उसके बाद शुरू हुए सैन्य अभियानों को लेकर उनकी आलोचना हुई है। विपक्षी नेताओं ने युद्ध के संचालन और सरकार की रणनीति पर सवाल उठाए हैं। नेतन्याहू धोखाधड़ी, विश्वासघात और रिश्वतखोरी के आरोपों का भी सामना कर रहे हैं, हालांकि वह इन आरोपों को खारिज करते रहे हैं। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने वर्ष 2024 में कथित युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों से जुड़े मामलों में उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। सुरक्षा, शासन और कानूनी विवादों का यह पूरा परिदृश्य चुनावी चर्चा का हिस्सा है और इसका असर नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति पर पड़ सकता है।
ईसेनकोट और बेनेट ने शासन का विकल्प पेश किया: नेतन्याहू को चुनौती देने वाले नेताओं में पूर्व सेना प्रमुख गादी ईसेनकोट की भूमिका महत्वपूर्ण है। वह मध्यमार्गी याशर पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं और उन्होंने युद्ध को लेकर सरकार की रणनीति पर सवाल उठाए थे। ईसेनकोट ने सरकार के पास स्पष्ट युद्ध रणनीति नहीं होने की आलोचना करते हुए जून 2024 में युद्ध मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। सुरक्षा के मामले में कड़ा रुख रखने के साथ उन्होंने शासन व्यवस्था में बदलाव का विकल्प पेश किया है। वहीं, पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट बी-याचद गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री याइर लापिड की येश अतिद पार्टी भी शामिल है। बेनेट फलस्तीन की स्वतंत्रता के विरोधी हैं और कब्जे वाले पश्चिमी तट पर इजरायली बस्तियों के निर्माण का समर्थन करते हैं। हालांकि, उन्होंने भी नेतन्याहू के सुरक्षा संबंधी फैसलों और शासन के तरीके की आलोचना की है। इस तरह विपक्ष में अलग-अलग राजनीतिक विचारों वाले नेता मौजूदा सरकार के खिलाफ चुनौती पेश कर रहे हैं।
छोटे दल तय कर सकते हैं सत्ता का अगला रास्ता: चुनाव से पहले के सर्वेक्षणों के मुताबिक, किसी भी राजनीतिक गुट के लिए नेसेट में 61 सीटों का बहुमत हासिल करना आसान नहीं है। ऐसे में छोटे दलों का प्रदर्शन चुनावी परिणाम के बाद सरकार गठन की दिशा तय कर सकता है। जिन पार्टियों को कम से कम 3.25 प्रतिशत मत मिलेंगे, वे संसद में प्रतिनिधित्व हासिल करने की दौड़ में रहेंगी, जबकि उनके समर्थन से गठबंधन का बहुमत बनना या बिगड़ना संभव होगा। चुनाव में नेतन्याहू की राष्ट्रवादी लिकुड पार्टी और गादी ईसेनकोट के नेतृत्व वाली मध्यमार्गी याशर पार्टी के बीच कड़ी टक्कर के संकेत मिले हैं। नफ्ताली बेनेट के गठबंधन की भूमिका भी अंतिम समीकरणों में महत्वपूर्ण हो सकती है। हमास के हमले के बाद सुरक्षा और युद्ध को लेकर बनी चिंताओं के बीच यह चुनाव तय करेगा कि नेतन्याहू सत्ता में बने रहते हैं या विपक्ष को सरकार बनाने का अवसर मिलता है। अंतिम फैसला मतों के बंटवारे, छोटे दलों के प्रदर्शन और चुनाव के बाद होने वाली गठबंधन वार्ताओं पर निर्भर करेगा।

















































