करवा चौथ पर पति की लंबी उम्र और अखंड सौभाग्य की कामना: हिंदू धर्म में करवा चौथ के व्रत को विशेष और अत्यंत पवित्र पर्व माना जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखमय दांपत्य जीवन की कामना से व्रत रखती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत निर्जला रखा जाता है, जिसमें महिलाएं सूर्योदय से लेकर रात में चंद्रमा के दर्शन करने तक अन्न और जल ग्रहण नहीं करतीं। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान, जयपुर-जोधपुर के निदेशक, प्रसिद्ध भविष्यवक्ता और कुंडली विश्लेषक ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास के अनुसार, वर्ष 2026 में करवा चौथ का पावन पर्व गुरुवार, 29 अक्टूबर को मनाया जाएगा। उत्तर भारत में विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार में इस त्योहार की विशेष धूम रहती है। महिलाएं इस दिन व्रत रखकर अपने पति की दीर्घायु और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि की प्रार्थना करती हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार, करवा चौथ पर माता पार्वती, भगवान शिव, भगवान श्रीगणेश और भगवान कार्तिकेय के साथ विशेष रूप से करवा माता की पूजा की जाती है। व्रत रखने वाली महिलाएं दिनभर उपवास करती हैं और शाम को विधि-विधान से पूजा करने के बाद चंद्रमा के दर्शन तथा अर्घ्य देने के उपरांत ही व्रत का पारण करती हैं।
करवा चौथ 2026 पर भद्रा का समय और उसका प्रभाव: ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास के अनुसार, इस वर्ष करवा चौथ पर पूजा और सरगी ग्रहण करने के समय भद्रा का कोई व्यवधान नहीं रहेगा। पंचांग में दिए गए समय के अनुसार, भद्रा का आरंभ 28 अक्टूबर 2026 को सुबह 05 बजकर 31 मिनट पर होगा और इसकी समाप्ति 29 अक्टूबर 2026 को सुबह 04 बजकर 27 मिनट पर हो जाएगी। इस प्रकार करवा चौथ वाले दिन सुबह 04 बजकर 27 मिनट पर भद्रा समाप्त हो जाएगी। इसके बाद महिलाएं सुबह सरगी ग्रहण कर सकेंगी और दिनभर किए जाने वाले मांगलिक कार्यों में भद्रा का व्यवधान नहीं रहेगा। शाम के समय करवा चौथ की पूजा भी भद्रा से मुक्त रहेगी। धार्मिक मान्यताओं में भद्रा काल को शुभ और मांगलिक कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है। ऐसे में व्रत वाले दिन पूजा और सरगी के समय भद्रा का प्रभाव नहीं रहने को व्रतियों के लिए शुभ संकेत माना गया है। करवा चौथ के व्रत में सरगी का विशेष महत्व होता है, क्योंकि महिलाएं इसे सूर्योदय से पहले ग्रहण करने के बाद पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं। इसलिए भद्रा की समाप्ति का समय जानना व्रत की तैयारी करने वाली महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है।
करवा चौथ की तिथि, चतुर्थी आरंभ-समाप्ति, पूजा मुहूर्त और चंद्रोदय: पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में करवा चौथ का व्रत गुरुवार, 29 अक्टूबर को रखा जाएगा। चतुर्थी तिथि का आरंभ 28 अक्टूबर 2026 की रात 01 बजकर 06 मिनट से होगा और इसकी समाप्ति 29 अक्टूबर 2026 की रात 10 बजकर 09 मिनट पर होगी। उदया तिथि के अनुसार, करवा चौथ का व्रत 29 अक्टूबर को ही रखा जाएगा। इस दिन करवा चौथ की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 05 बजकर 38 मिनट से शाम 06 बजकर 56 मिनट तक रहेगा। इस अवधि में महिलाएं करवा माता और अन्य देवी-देवताओं की पूजा कर सकती हैं। पंचांग में चंद्र दर्शन यानी चंद्रोदय का समय रात 07 बजकर 57 मिनट बताया गया है। व्रत रखने वाली महिलाएं चंद्रमा निकलने के बाद उसे अर्घ्य देंगी और फिर अपने पति का चेहरा देखकर व्रत का पारण करेंगी। करवा चौथ के दिन पूजा की तैयारी करते समय चतुर्थी तिथि, पूजा मुहूर्त और चंद्रोदय के समय का ध्यान रखना आवश्यक माना जाता है। व्रत की परंपरा के अनुसार, महिलाएं दिनभर उपवास रखने के बाद शाम को सामूहिक रूप से या अपने घर में पूजा करती हैं और चंद्र दर्शन के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करती हैं। चंद्रोदय का समय व्रत के पारण के लिए विशेष महत्व रखता है, इसलिए इस दिन की पूजा और व्रत की तैयारी पंचांग में दिए गए समय के अनुसार की जाती है।
करवा चौथ पर गौरी योग, परिधि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग: ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास के अनुसार, इस बार करवा चौथ पर कई विशेष शुभ योग बन रहे हैं। ज्योतिषीय गणना के मुताबिक, 29 अक्टूबर 2026 को चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में गोचर करेंगे। इसके साथ ही गौरी योग, परिधि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग भी बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र में इन योगों को पूजा-पाठ, तप, धार्मिक अनुष्ठानों और मांगलिक कार्यों के लिए शुभ तथा फलदायी माना जाता है। चंद्रमा की वृषभ राशि में स्थिति और इन शुभ योगों का संयोग करवा चौथ के धार्मिक महत्व को और विशेष बनाता है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, दांपत्य जीवन में प्रेम और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए पूजा-अर्चना करती हैं। शुभ योगों के अवसर पर विधि-विधान से व्रत और पूजन करने की धार्मिक परंपरा है। करवा चौथ पर माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा को वैवाहिक सुख तथा अखंड सौभाग्य की कामना से जोड़ा जाता है, जबकि भगवान श्रीगणेश की आराधना शुभ कार्यों की शुरुआत और विघ्नों को दूर करने के लिए की जाती है। इस वर्ष चंद्रमा की उच्च राशि में स्थिति के साथ गौरी योग, परिधि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का उल्लेख व्रत के शुभ संयोगों के रूप में किया गया है। व्रत रखने वाली महिलाएं इन योगों के बीच निर्धारित पूजा मुहूर्त में श्रद्धापूर्वक आराधना कर सकती हैं।
करवा चौथ व्रत का धार्मिक महत्व और भगवान श्रीगणेश की पूजा: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, करवा चौथ का व्रत पति की दीर्घायु, दांपत्य जीवन की सुख-शांति और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास के अनुसार, जिस तरह वट सावित्री व्रत को पति की लंबी उम्र और वैवाहिक जीवन की रक्षा से जोड़ा जाता है, उसी प्रकार करवा चौथ का व्रत करने से पति को दीर्घायु प्राप्त होने और वैवाहिक जीवन के कष्ट तथा कलह दूर होने की मान्यता है। इस दिन संकष्टी चतुर्थी का भी संयोग होता है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत भी चंद्र दर्शन के बाद ही खोला जाता है, इसलिए इस दिन भगवान श्रीगणेश का विधिपूर्वक पूजन करना विशेष महत्व रखता है। धार्मिक परंपरा में किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान श्रीगणेश की पूजा की जाती है, ताकि कार्य निर्विघ्न संपन्न हो। करवा चौथ पर महिलाएं माता पार्वती, भगवान शिव, भगवान श्रीगणेश, भगवान कार्तिकेय और करवा माता की आराधना करके परिवार की सुख-समृद्धि तथा पति के स्वास्थ्य की कामना करती हैं। मान्यता है कि करवा चौथ के समान अखंड सौभाग्य प्रदान करने वाला कोई दूसरा व्रत नहीं है। व्रत रखने वाली महिलाएं दिनभर निर्जला उपवास करके शाम को कथा सुनती हैं, पूजा करती हैं और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत खोलती हैं। इस प्रकार करवा चौथ केवल उपवास का पर्व नहीं, बल्कि श्रद्धा, पारिवारिक विश्वास, दांपत्य प्रेम और धार्मिक आस्था से जुड़ी परंपरा भी है।
करवा चौथ व्रत की संपूर्ण पूजन विधि, पूजा सामग्री और पारण के नियम: ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास के अनुसार, करवा चौथ का व्रत रखने वाली महिलाओं को सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए और अपने परिवार की परंपरा के अनुसार सरगी ग्रहण करनी चाहिए। सरगी के बाद पूरे दिन निर्जला व्रत रखने का संकल्प लिया जाता है। शाम के समय तुलसी के समीप शुद्ध घी का दीपक जलाकर करवा चौथ की पवित्र व्रत कथा का पाठ करना या उसे सुनना चाहिए। पूजा की थाली में धूप, दीप, रोली, अक्षत, पुष्प, फल, मिष्ठान और सुहाग की सामग्री यानी श्रृंगार का सामान सजाया जाता है। चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए टोटीदार लोटे में शुद्ध जल भरा जाता है। इसके साथ मिट्टी के करवे में चावल या चिउड़ा भरकर उसमें दक्षिणा के रूप में कुछ सिक्के रखे जाते हैं। पूजा के दौरान सभी देवी-देवताओं, करवा माता, भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान श्रीगणेश को तिलक लगाकर फल, फूल और मिष्ठान अर्पित किए जाते हैं। सुहाग की सामग्री को भी पूजा में रखकर उसका टीका किया जाता है। रात में चंद्रमा निकलने पर लोटे में भरे जल से चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद छलनी में जलता हुआ दीपक रखकर चंद्रमा के दर्शन किए जाते हैं और उसी छलनी से पति का चेहरा देखा जाता है। चंद्र दर्शन के बाद पति के हाथों से जल ग्रहण करके निर्जला व्रत का पारण किया जाता है। इसके उपरांत घर के सभी बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए। अंत में पूजा में इस्तेमाल किए गए करवे और सुहाग की सामग्री को अपनी सास या किसी अन्य सुहागिन स्त्री को भेंट करने की परंपरा है। इस प्रकार सरगी, संकल्प, कथा श्रवण, पूजा सामग्री की तैयारी, देवी-देवताओं का पूजन, चंद्र दर्शन, अर्घ्य, व्रत पारण और बड़ों का आशीर्वाद—ये सभी करवा चौथ की संपूर्ण पूजन विधि के महत्वपूर्ण अंग हैं।

















































