कालाष्टमी व्रत का महत्व और भैरव पूजा का विधान: 2 नवंबर 2026 को कालाष्टमी का व्रत रखा जाएगा। प्रत्येक महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर कालाष्टमी मनाने की परंपरा है। इस दिन भगवान शिव के भैरव स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भैरव के दो प्रमुख स्वरूप हैं, जिन्हें काल भैरव और बटुक भैरव के नाम से जाना जाता है। कालाष्टमी पर विशेष रूप से काल भैरव की उपासना का विधान है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव के काल भैरव स्वरूप की पूजा करने से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस अवसर पर भैरव बाबा को प्रसन्न करने के लिए कई विशेष उपाय भी किए जाते हैं। मान्यता के अनुसार इन उपायों को करने से कारोबार में आ रही बाधाओं, आर्थिक परेशानियों, भय, पारिवारिक तनाव और जीवन की दूसरी मुश्किलों से छुटकारा पाने की कामना की जाती है। यदि आप अपने कारोबार को दूसरे शहरों या विदेशों तक फैलाना चाहते हैं, तो कालाष्टमी के दिन किसी भैरव मंदिर में जाकर भगवान भैरव को 125 ग्राम साबुत उड़द अर्पित करें। इसके बाद उसमें से 11 दाने अलग निकालकर काले कपड़े में बांध लें और अपने कार्यस्थल पर तिजोरी में रख दें। कपड़े में प्रत्येक दाना रखते समय ‘ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ’ मंत्र का जाप करें। सुख-सुविधाओं में वृद्धि की कामना रखने वाले जातक भैरव बाबा के सामने मिट्टी के दीपक में सरसों के तेल का दीप जलाएं और दीपक जलाते समय इसी मंत्र का 2 बार जाप करके अपनी मनोकामना व्यक्त करें। किसी अनजाने भय से परेशान रहने वाले लोग काले रंग का धागा भैरव जी के चरणों में 5 मिनट तक रखें और इस दौरान मंत्र का जाप करें। इसके बाद धागा उठाकर अपने दाएं पैर में बांध लें। जीवनसाथी की परेशानी दूर करने के लिए सुबह स्नान के बाद भगवान शिव की प्रतिमा के सामने आसन बिछाकर बैठें और शिव चालीसा का पाठ करें। पाठ पूरा होने के बाद भैरव मंत्र का 1 बार जाप करें। संतान की तरक्की में बाधा और जादू-टोने की आशंका से परेशान लोग एक मुट्ठी काले तिल लेकर भैरव बाबा का ध्यान करते हुए बच्चे के सिर से 7 बार उतारें। इनमें 6 बार घड़ी की दिशा में और 1 बार विपरीत दिशा में तिल उतारने की परंपरा बताई गई है। इसके बाद तिल बहते पानी में प्रवाहित करते हुए भैरव मंत्र का जाप करें। घर में नकारात्मकता दूर करने के लिए मौली का लंबा धागा लेकर उसमें 7 गांठें लगाएं और उसे घर के मुख्य दरवाजे पर बांध दें। प्रत्येक गांठ लगाते समय भैरव मंत्र का जाप करें।
कालाष्टमी पर दांपत्य सुख, समृद्धि और आर्थिक स्थिति के उपाय: कालाष्टमी के दिन दांपत्य जीवन में प्रेम और जीवनसाथी का साथ बनाए रखने की कामना से नागकेसर का 1 फूल लें। इसके लिए ताजा फूल या पंसारी की दुकान से मिला सूखा फूल भी इस्तेमाल किया जा सकता है। फूल पर शहद की 1 बूंद लगाकर उसे देवी दुर्गा को अर्पित करें और वैवाहिक जीवन में प्रेम तथा आपसी विश्वास बनाए रखने की प्रार्थना करें। जीवन में सुख-समृद्धि बनाए रखने के लिए नागकेसर के पेड़ को प्रणाम करके उसकी विधिपूर्वक पूजा करें। यदि पेड़ उपलब्ध न हो, तो पंसारी की दुकान से नागकेसर की सूखी लकड़ी का 1 टुकड़ा या सूखा फूल लेकर उसे प्रणाम करें और कालाष्टमी के पूरे दिन अपने पास रखें। अगले दिन सुबह स्नान करने के बाद उस लकड़ी या फूल को बहते जल में प्रवाहित कर दें। कार्यालय में धन से जुड़ी परेशानियां चल रही हों, तो पंसारी की दुकान से नागकेसर का 1 फूल लाकर कालाष्टमी के दिन घर के मंदिर में स्थापित करें। रोली और चावल आदि से विधिपूर्वक पूजा करें और फूल को पूरे दिन मंदिर में रखा रहने दें। अगले दिन सुबह स्नान के बाद उसे मंदिर से उठाकर अपने कार्यालय के कैश बॉक्स में रख दें। मेहनत और अच्छी आमदनी के बावजूद बचत नहीं हो पा रही हो तथा आए दिन अनावश्यक खर्च हो रहे हों, तो कालाष्टमी के दिन नागकेसर का 1 फूल लें। ताजा फूल उपलब्ध न होने पर सूखा फूल भी लिया जा सकता है। उसे लाल कपड़े में लपेटकर अपने पास रखें। जीवन में स्थिरता बनाए रखने के लिए सुबह स्नान के बाद भैरव बाबा को काले तिल अर्पित करें। घंटा या घंटी बजाते हुए भगवान की पूजा करें और ‘ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ’ मंत्र का जाप करें। संतान अपना कारोबार शुरू करना चाहती है, लेकिन उसे व्यापार की पर्याप्त समझ नहीं है, तो कालाष्टमी के दिन साफ और शुद्ध मिट्टी लें। उसमें पानी मिलाकर गाढ़ा मिश्रण तैयार करें और उससे 27 छोटी-छोटी गोलियां बनाकर अच्छी तरह सुखा लें। कालाष्टमी से अगले 27 दिनों तक प्रतिदिन 1 गोली संतान के हाथों से घर के मंदिर में रखवाएं। बाद में अवसर मिलने पर इन गोलियों को किसी मंदिर या पेड़ के पास रख दें। इस प्रकार कालाष्टमी पर किए जाने वाले इन उपायों में भैरव मंत्र, शिव पूजा, देवी दुर्गा की आराधना, नागकेसर, काले तिल, उड़द और मिट्टी से जुड़े अलग-अलग विधान बताए गए हैं। इन सभी उपायों में अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना करने का विधान है।
गोवत्स द्वादशी 2026 की तारीख और वसु बारस का महत्व: धनतेरस से 1 दिन पहले गोवत्स द्वादशी का पर्व मनाया जाता है। इसे वसु बारस, बछ बारस और नन्दिनी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। इस त्योहार पर गाय और बछड़े की पूजा करने की परंपरा है। भारत के कई क्षेत्रों में इसी तरह का एक अन्य पर्व बछ बारस के नाम से भी मनाया जाता है, लेकिन वह गोवत्स द्वादशी से लगभग 2 महीने पहले पड़ता है। दोनों पर्वों में गाय और बछड़ों की पूजा की जाती है। गोवत्स द्वादशी यानी वसु बारस पर संतान की उन्नति, सुख और दीर्घायु की कामना से व्रत रखा जाता है। इस दिन वसु नामक धन के अधिपति देवता की भी पूजा-अर्चना की जाती है, इसी वजह से इस पर्व को वसु बारस कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह दिन गौ माता के विश्राम के लिए निर्धारित है। इसलिए इस अवसर पर गाय का दूध और उससे तैयार होने वाले पदार्थों का सेवन तथा उपयोग वर्जित माना जाता है। वर्ष 2026 में गोवत्स द्वादशी का पर्व 5 नवंबर को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार द्वादशी तिथि 5 नवंबर 2026 को सुबह 10:35 बजे शुरू होगी और 6 नवंबर 2026 को सुबह 10:30 बजे समाप्त होगी। इस तरह व्रत और पूजा के लिए निर्धारित पर्व तिथि 5 नवंबर को रहेगी। गोवत्स द्वादशी का शुभ मुहूर्त शाम 5:33 बजे से रात 8:10 बजे तक रहेगा। इस अवधि में गाय और बछड़े की पूजा करना शुभ माना गया है। संतान की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करने वाली महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं और गौ माता की सेवा तथा पूजा करती हैं। इस पर्व में गाय को केवल पूजनीय मानकर आराधना ही नहीं की जाती, बल्कि उसके प्रति सम्मान और सेवा का भाव भी प्रकट किया जाता है। इसी वजह से वसु बारस का त्योहार धार्मिक और पारिवारिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।
गोवत्स द्वादशी की पूजा विधि और पूजन सामग्री: गोवत्स द्वादशी के दिन व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और इसके बाद गाय तथा उसके बछड़े की विधिपूर्वक पूजा करें। जिन घरों में गाय और बछड़ा मौजूद हों, वहां उन्हें स्नान कराकर या साफ-सफाई करके सजाया जाता है। यदि घर में गाय और बछड़ा नहीं हैं, तो उनकी मूर्ति या चित्र बनाकर भी पूजा की जा सकती है। पूजा के समय गाय और बछड़े के माथे पर हल्दी और कुमकुम लगाएं। इसके बाद रोली, नैवेद्य, फल, मिठाई, अक्षत, दीपक और धूप आदि से विधिवत पूजन करें। पूजा पूरी होने के बाद गाय और बछड़े को मीठा चारा, गुड़ और चना अर्पित करें। इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं दिनभर उपवास करती हैं और गौ माता की सेवा करती हैं। गाय की देखभाल, उसे चारा खिलाना और उसके प्रति आदर प्रकट करना इस पर्व की पूजा परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। शाम के समय एक बार फिर गाय और बछड़े की विधिपूर्वक पूजा करें। इस दौरान गोवत्स द्वादशी की व्रत कथा का श्रवण भी अवश्य करें। शाम की पूजा और कथा पूरी होने के बाद भोजन करने का विधान बताया गया है। पूजा में हल्दी, कुमकुम, रोली, अक्षत, फल, मिष्टान्न, दीप और धूप जैसी सामग्री का उपयोग किया जाता है। गाय और बछड़े की प्रतिमा या चित्र से पूजा करने वाले लोग भी इन्हीं पूजन सामग्रियों के साथ विधि पूरी कर सकते हैं। इस दिन गाय के दूध और उससे बने पदार्थों का उपयोग नहीं करने की परंपरा का विशेष ध्यान रखा जाता है। व्रत के दौरान गौ माता की सेवा, पूजा और संतान के कल्याण की प्रार्थना को विशेष महत्व दिया जाता है।
गोवत्स द्वादशी व्रत का फल और धार्मिक मान्यता: धार्मिक मान्यता है कि गोवत्स द्वादशी का व्रत रखने से संतान को लंबी आयु, सुख और समृद्ध जीवन का आशीर्वाद मिलता है। महिलाएं अपने बच्चों की उन्नति, सुरक्षा और अच्छे भविष्य की कामना से यह व्रत करती हैं। इस दिन गाय और बछड़े की पूजा के साथ वसु नामक धन के अधिपति देवता की आराधना भी की जाती है। इसी कारण इस पर्व का नाम वसु बारस भी प्रचलित है। गोवत्स द्वादशी को गौ माता के विश्राम का दिन माना जाता है, इसलिए इस दिन गाय का दूध और उससे तैयार किए गए पदार्थों का उपयोग वर्जित बताया गया है। व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह से शाम तक पूजा, उपवास और गौ सेवा के नियमों का पालन करती हैं। शाम को दोबारा पूजन करने के बाद व्रत कथा सुनती हैं और फिर भोजन करती हैं। इस पर्व में गाय और बछड़े को चारा, गुड़ और चना खिलाने की परंपरा भी है। मान्यता के अनुसार गौ माता की पूजा और सेवा से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है तथा संतान के जीवन में उन्नति के मार्ग खुलते हैं। वर्ष 2026 में यह पर्व 5 नवंबर को मनाया जाएगा और पूजा के लिए शाम 5:33 बजे से रात 8:10 बजे तक का समय बताया गया है। द्वादशी तिथि 5 नवंबर की सुबह 10:35 बजे से शुरू होकर 6 नवंबर की सुबह 10:30 बजे तक रहेगी। इसलिए व्रत रखने वाले श्रद्धालु तिथि और शुभ मुहूर्त को ध्यान में रखकर पूजा की तैयारी कर सकते हैं। कालाष्टमी और गोवत्स द्वादशी, दोनों पर्वों में पूजा, व्रत और धार्मिक उपायों का विशेष महत्व है। कालाष्टमी पर भगवान शिव के काल भैरव स्वरूप की उपासना की जाती है, जबकि गोवत्स द्वादशी पर गाय और बछड़े की पूजा करके संतान की दीर्घायु तथा परिवार की खुशहाली की कामना की जाती है।














































