ज्योतिषाचार्य पं.अविनाश मिश्र शास्त्री (चित्रकूटधाम)
स्तोत्र जिसे करने से सभी प्रकार के नेत्र रोगों का सम्पूर्णतया नाश हो जाता है, और नेत्र तेज युक्त हो जाते है। इस मन्त्र स्तोत्र का वर्णन कृष्ण यजुर्वेदीय चाक्षुषोपनिषद में वर्णित है।
चाक्षुषोपनिषद (चाक्षुषी विद्या) स्तोत्र के नियमित जप से न केवल नेत्र ज्योति ठीक हो सकती हैं, बल्कि किसी भी प्रकार के नेत्र रोग के निवारण हेतु अचूक रामबाण सिद्ध होती है।
आँखों से सम्बंधित कोई बीमारी मे एक ताम्बे के लोटे में जल भरकर, पूजा स्थान में रखकर उसके सामने नियमित इस स्तोत्र के २१ बार पाठ करने के उपरान्त उस जल से दिन में ३-४ बार आँखों को छींटे मारने पर कुछ ही समय में नेत्र रोग से मुक्ति मिल जाती है।
ऐसा माना गया है, कि चाक्षुषी विद्या का नियमित रूप से तथा विधिपूर्वक पाठ करने वाले के कुल मे भी कोई नेत्ररोग से पीडित अथवा अंधा नही होता । पाठ आरंभ करने से पहले विनियोग तथा अंत मे सूर्यदेव को अर्ध्य अवश्य दे ।
चाक्षुषी विद्या को किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष रविवार को सूर्योदय के आसपास आरम्भ करके रोज इस स्तोत्र के ५ पाठ करें। सर्वप्रथम भगवान सूर्य नारायण का ध्यान करके दाहिने हाथ में जल, अक्षत, लाल पुष्प लेकर विनियोग मंत्र पढ़े।
ॐ इस चाक्षुषी विद्या के ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री छन्द है, सूर्यनारायण देवता हैं तथा नेत्ररोग शमन हेतु इसका जाप होता है।
हे परमेश्वर, हे चक्षु के अभिमानी सूर्यदेव। आप मेरे चक्षुओं में चक्षु के तेजरूप से स्थिर हो जाएँ। मेरी रक्षा करें। रक्षा करें। मेरी आँखों का रोग समाप्त करें। समाप्त करें। मुझे आप अपना सुवर्णमयी तेज दिखलायें। दिखलायें। जिससे मैं अन्धा न होऊं। कृपया वैसे ही उपाय करें, उपाय करें। आप मेरा कल्याण करें, कल्याण करें। मेरे जितने भी पीछे जन्मों के पाप हैं जिनकी वजह से मुझे नेत्र रोग हुआ है उन पापों को जड़ से उखाड़ दें।
हे सच्चिदानन्दस्वरूप नेत्रों को तेज प्रदान करने वाले दिव्यस्वरूपी भगवान भास्कर आपको नमस्कार है।
ॐ सूर्य भगवान को नमस्कार है।
ॐ नेत्रों के प्रकाश भगवान सूर्यदेव आपको नमस्कार है।
ॐ आकाशविहारी आपको नमस्कार है। परमश्रेष्ठ स्वरुप आपको नमस्कार है।
ॐ रजोगुण रुपी भगवान सूर्यदेव आपको नमस्कार है।
तमोगुण के आश्रयभूत भगवान सूर्यदेव आपको नमस्कार है।
हे भगवान आप मुझे असत से सत की और ले जाईये।
अन्धकार से प्रकाश की और ले जाइये। मृत्यु से अमृत की और ले चलिये।
हे सूर्यदेव आप उष्णस्वरूप हैं, शुचिरूप हैं। हंसस्वरूप भगवान सूर्य, शुचि तथा अप्रतिरूप हैं। आपके तेजोमयी स्वरुप की समानता करने वाला कोई भी नहीं है।
जो व्यक्ति इस चक्षुष्मतिविद्या का नित्य पाठ करता है उसे कभी नेत्र सम्बन्धी रोग नहीं होता है। उसके कुल में कोई अन्धा नहीं होता। कहा जाता है कि आठ योग्य व्यक्तियों को इस विद्या का दान देने (सिखाने) पर इस विद्या की सिद्धि प्राप्त हो जाती है।
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