हिंदू धर्म में ईश्वर की साधना को सर्वोत्तम बताया गया है मान्यता है कि अगर इनकी विधिवत पूजा आराधना की जाए तो जीवन की परेशानियां दूर हो जाती है और मन भी शांत रहता है शास्त्रों में देवी देवताओं की आराधना के लिए कई तरीके और नियम बताए गए है अगर भक्त प्रतिदिन देवी मां दुर्गा का ध्यान व पूजन करके श्री दुर्गा अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र का संपूर्ण पाठ करें

तो जीवन में आने वाली सभी परेशानियों और बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है वही सुख समृद्धि का आगमन होता है इसका पाठ अगर आप रोजाना नहीं भी कर सकते हैं तो शुक्रवार के दिन यह पाठ करने से आर्थिक परेशानियां दूर हो जाती है और माता रानी की कृपा और आशीर्वाद मिलता है तो आज हम आपके लिए लेकर आए है श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् का संपूर्ण पाठ, तो आइए जानते हैं।

दुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्-
॥ श्रीदुर्गायै नमः ॥
श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्
ईश्वर उवाच
शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने । यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती ॥ १ ॥
ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी । आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी ॥ २ ॥
पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः। मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः ॥ ३ ॥
सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्दस्वरूपिणी । अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः ॥ ४॥
शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा । सर्वविद्या दक्षकन्या अपर्णानेकवर्णा पट्टाम्बरपरीधाना च दक्षयज्ञविनाशिनी ॥ ५॥
अपर्णनिकारवर्ना च पाटला पाटलावती । पट्टाम्बरपरिधाना कलमञ्जीररञ्जिनी ॥ ६ ॥

अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी । वनदुर्गा मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता ॥ ७ ॥
ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा । चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः ॥ ८ ॥
विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा । बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना ॥ ९ ॥
निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी । मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी ॥ १० ॥
सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी । सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा ॥ ११ ।।
अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी । कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः ॥ १२ ॥
अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा । महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला ॥ १३ ॥
अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी । नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी ॥ १४ ॥
शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी । कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी ॥ १५ ॥


























































