लखनऊ: किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग द्वारा ‘विश्व सेप्सिस दिवस’ (13 सितंबर) के उपलक्ष्य में दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन ‘सेप्सिस अपडेट 2026’ का आयोजन किया जा रहा है। इस वर्ष की थीम “सेप्सिस में निवेश करें – जानें बचाएं” रखी गई है। कार्यक्रम का उद्घाटन उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (चिकित्सा शिक्षा एवं स्वास्थ्य) डॉ. अमित कुमार घोष द्वारा शताब्दी फेज-2 के अष्टम तल पर किया जाएगा। समारोह में एनएचएम डायरेक्टर डॉ. पिंकी जोएल और डीजीएमई श्रीमती नेहा शर्मा भी शिरकत करेंगी।
आयोजन की पूर्व संध्या पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) वेद प्रकाश, प्रो. सूर्यकान्त, प्रो. अपुल गोयल और डॉ. सौमित्र मिश्रा ने सेप्सिस के बढ़ते खतरों और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
हर 3 सेकंड में एक मौत, समय पर इलाज ही बचाव
डॉक्टरों ने बताया कि विश्व भर में प्रत्येक 5 में से 1 मृत्यु सेप्सिस के कारण होती है। भारत में हर साल सेप्सिस के लगभग 1.10 करोड़ मामले सामने आते हैं, जिनमें करीब 30 लाख मरीजों की जान चली जाती है। हालिया अध्ययनों के अनुसार, देश के आईसीयू में भर्ती 56% से अधिक मरीज सेप्सिस से पीड़ित हैं, जिनमें 45% मामले मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट बैक्टीरिया की वजह से जटिल हो चुके हैं।
हर मिनट है कीमती
विशेषज्ञों के अनुसार, सेप्सिस संक्रमण के प्रति शरीर की अनियंत्रित प्रतिक्रिया है, जिससे अंग काम करना बंद कर देते हैं। एंटीबायोटिक देने में प्रति घंटे की देरी से मृत्यु का जोखिम 7% तक बढ़ जाता है। तेज सांस, अत्यधिक बुखार या ठंड लगना, भ्रम, दिल की धड़कन तेज होना और निम्न रक्तचाप इसके प्रमुख लक्षण हैं। सही समय पर सही एंटीबायोटिक का चुनाव ही मरीज की जान बचा सकता है।
केजीएमयू का उत्कृष्ट रिकॉर्ड
केजीएमयू का 26 बिस्तरों वाला रेस्पिरेटरी आईसीयू देश के सबसे बड़े क्रिटिकल केयर केंद्रों में से एक है। यहां वेंटिलेटर-एसोसिएटेड निमोनिया (VAP) की दर 10% से कम है, जबकि सेप्सिस ग्रसित मरीजों का रिकवरी रेट 85% के करीब दर्ज किया गया है।







































