इन गंभीर खुफिया रिपोर्टों और बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के मध्य लगातार बातचीत भी चल रही है। सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों देशों के शीर्ष अधिकारी एक नए परमाणु समझौते पर तेजी से काम कर रहे हैं। उनका मुख्य लक्ष्य अगस्त के मध्य तक किसी भी तरह से एक ठोस और स्थायी समझौते तक पहुंचना है। इस शांति प्रक्रिया के जरिए दोनों देश अपने लंबे समय से चले आ रहे विवादों को कूटनीति से सुलझाना चाहते हैं। कूटनीतिक प्रयासों को इस समय कठोर सैन्य विकल्पों की तुलना में बहुत अधिक प्राथमिकता और महत्व दिया जा रहा है।
सैन्य कार्रवाई की तैयारी: कूटनीतिक बातचीत के साथ-साथ अमेरिका संभावित सैन्य कार्रवाई की अपनी सभी तैयारियां भी लगातार जारी रखे हुए है। कई रक्षा अधिकारियों ने स्पष्ट बताया है कि आपातकालीन जरूरत पड़ने पर उनके सभी सैन्य विकल्प पूरी तरह तैयार हैं। प्रशासन इस समय शांति वार्ता और सैन्य दबाव दोनों के बीच एक बेहद नाजुक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। फिलहाल उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता केवल बातचीत के जरिए ही इस पूरे संकट का कोई स्थायी समाधान निकालने की है। अगर कूटनीतिक बातचीत पूरी तरह विफल होती है तो सेना तुरंत किसी भी बड़े एक्शन के लिए मोर्चे पर तैयार रहेगी।
नेताओं के बीच मतभेद: इस तनावपूर्ण वैश्विक माहौल के बीच ट्रंप और नेतन्याहू के आपसी संबंधों में भारी खटास सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार ईरान को लेकर इन दोनों बड़े और ताकतवर नेताओं की रणनीति में गहरे मतभेद उत्पन्न हो गए हैं। वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक नेतन्याहू चाहते हैं कि दुश्मन के खिलाफ आक्रामक सैन्य अभियान बिना रुके लगातार जारी रखा जाए। वे मजबूती से मानते हैं कि केवल युद्ध के जरिए ही उनके देश के सभी सुरक्षा लक्ष्य पूरी तरह हासिल किए जा सकते हैं। इस जटिल मुद्दे को शांति से सुलझाने के लिए दोनों नेताओं ने गुरुवार को फोन पर एक लंबी बातचीत भी की थी।
अर्थव्यवस्था की चिंताएं: सैन्य कार्रवाई की निरंतर मांग के विपरीत ट्रंप की सोच इस गंभीर मुद्दे पर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। उनका मानना है कि लंबे समय तक संघर्ष जारी रहने से पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। वे कतई नहीं चाहते कि उनका देश किसी ऐसे युद्ध में फंसे जिसका कोई भी स्पष्ट और सुखद अंत दिखाई न दे। इसलिए वे इस चल रहे युद्ध से बाहर निकलने का एक सुरक्षित और सम्मानजनक रास्ता तलाश करने पर बहुत जोर दे रहे हैं। यह वैचारिक मतभेद दोनों देशों के पुराने और मजबूत गठबंधन के लिए एक बहुत बड़ी कूटनीतिक चुनौती बन गया है।
सुलेमानी की मौत का साया: अमेरिकी अधिकारियों का लंबे समय से मानना रहा है कि ईरान पिछले कुछ सालों से अपना बदला लेना चाहता है। इसकी मुख्य वजह साल 2020 में हुआ वह घातक अमेरिकी ड्रोन हमला है जिसने उस समय पूरी दुनिया को चौंका दिया था। उस बड़े हवाई हमले में कुद्स फोर्स के तत्कालीन प्रमुख कासिम सुलेमानी की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई थी। यह बड़ी और ऐतिहासिक सैन्य कार्रवाई ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान बेहद योजनाबद्ध तरीके से की गई थी। उस पुरानी घटना के बाद से ही गंभीर परिणाम भुगतने और बदला लेने की सार्वजनिक धमकियां लगातार दी जा रही हैं।
अंतिम संस्कार में विरोध: इस भारी गुस्से और तनाव का स्पष्ट नजारा एक बड़े राष्ट्रीय आयोजन के दौरान भी साफ देखने को मिला था। रिपोर्ट के मुताबिक पूर्व सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भारी भीड़ सड़कों पर उमड़ी थी। समारोह में मौजूद गुस्साए लोगों ने अमेरिकी राष्ट्रपति के खिलाफ बहुत ही आक्रामक और तेज आवाज में नारे लगाए थे। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने दावा किया कि वहां एक ऐसा बड़ा बैनर भी प्रदर्शित किया गया था जिस पर हत्या की धमकी लिखी थी। अब यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि इन नई खुफिया सूचनाओं के बाद अमेरिकी प्रशासन अपना अगला कूटनीतिक कदम क्या उठाता है।

























































