भारत और अमेरिका के बीच सिविल न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में एक नई साझेदारी आकार ले रही है। अमेरिकी परमाणु ऊर्जा कंपनियां भारत के सिविल न्यूक्लियर सेक्टर में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए काफी उत्सुक हैं। ये कंपनियां भारत के तेजी से बढ़ते ऊर्जा बाजार में अपने लिए नए और बड़े अवसर तलाश रही हैं। भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अमेरिकी तकनीक बहुत काम आ सकती है। इसी वजह से अमेरिकी कंपनियां भारतीय बाजार में अपना व्यापारिक आधार मजबूत करने की इच्छुक हैं।
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का दौरा इस साल की शुरुआत में अमेरिकी परमाणु उद्योग से जुड़े दिग्गजों ने भारत की एक अहम यात्रा की थी। बड़े अमेरिकी अधिकारियों के एक विशेष प्रतिनिधिमंडल ने इस दौरान भारत का दौरा किया था। इस प्रतिनिधिमंडल का मुख्य उद्देश्य भारतीय प्राइवेट सेक्टर के साथ सहयोग के नए मौकों का पता लगाना था। अधिकारियों ने भारतीय उद्योगपतियों के साथ मिलकर भविष्य की संभावनाओं पर गहन चर्चा की। यह दौरा दोनों देशों के बीच सिविल न्यूक्लियर ऊर्जा में सहयोग को बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम था।
शांति कानून से नियमों में ढील अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का यह अहम दौरा नई दिल्ली के एक बड़े कानूनी फैसले के बाद देखने को मिला था। भारत सरकार ने ‘शांति’ कानून के जरिए अपने सिविल न्यूक्लियर लायबिलिटी नियमों को आसान बनाने का फैसला किया था। इस नए कानून के लागू होने से विदेशी कंपनियों के लिए भारत में काम करना काफी आसान हो गया है। नियमों में इस महत्वपूर्ण ढील के कारण ही अमेरिकी कंपनियों का उत्साह बहुत अधिक बढ़ गया है। इसी नीतिगत बदलाव ने अमेरिकी परमाणु अधिकारियों को भारतीय बाजार का रुख करने के लिए प्रेरित किया।
भारत के आयातित सामान पर टैरिफ व्यापार के मोर्चे पर अमेरिकी प्रशासन ने हाल ही में कुछ बड़े और सख्त फैसले लिए हैं। इससे पहले 24 जुलाई को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक अहम व्यापारिक घोषणा की थी। डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से होने वाले आयात पर सीधा 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने का ऐलान किया था। भारत के अलावा अन्य 16 देशों से आने वाले सामानों पर भी यह सख्त टैरिफ लागू किया गया था। इस नए टैरिफ के लागू होने से भारत से अमेरिका जाने वाले निर्यात पर सीधा असर पड़ने की संभावना है।
जबरन मजदूरी के खिलाफ कार्रवाई अमेरिकी राष्ट्रपति का यह नया टैरिफ कदम एक बड़ी वैश्विक मुहिम का ही अहम हिस्सा माना जा रहा है। यह सख्त कदम जबरन मजदूरी से बनाए गए सामानों के खिलाफ की जा रही वैश्विक कार्रवाई के तहत उठाया गया है। शुरुआत में भारत को उन देशों की एक विशेष श्रेणी में रखा गया था जिन पर ज्यादा टैक्स लगना था। इस शुरुआती श्रेणी के तहत भारत पर 12.5 प्रतिशत का ज़्यादा लेवी या शुल्क लगाया जाना तय हुआ था। अमेरिका इस कार्रवाई के जरिए दुनियाभर में मजदूरी के अंतरराष्ट्रीय मानकों को लागू करना चाहता है।
विदेश व्यापार नीति में अहम संशोधन हालांकि वाशिंगटन ने बाद में नई दिल्ली की तरफ से उठाए गए कुछ सुधारात्मक कदमों पर ध्यान दिया। अमेरिका ने भारत की विदेश व्यापार नीति में हुए हालिया संशोधन पर विचार करने के बाद राहत दी। इस बड़े संशोधन में जबरन या अनिवार्य मजदूरी से बने उत्पादों के आयात पर स्पष्ट रूप से प्रतिबंध लगाया गया था। भारत सरकार के इस सख्त कदम को देखते हुए अमेरिका ने अपनी टैरिफ दर को 12.5 से घटा दिया। वाशिंगटन ने दर को घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया, जिससे भारतीय निर्यातकों को थोड़ी राहत मिली।


























































