सनातन धर्म में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की साक्षात भक्ति का दिन माना गया है। जहाँ हर माह में दो एकादशियाँ आती हैं, वहीं ‘पद्मिनी एकादशी’ का महत्व अद्वितीय है। यह एकादशी हर साल नहीं आती, बल्कि पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) के दौरान, यानी तीन वर्ष में केवल एक बार इसका संयोग बनता है। यही कारण है कि इसका पुण्य फल अन्य सभी एकादशियों की तुलना में तीन गुना अधिक माना जाता है। 27 मई 2026, बुधवार को पड़ने वाली इस पद्मिनी एकादशी के साथ जुड़ा है विष्णु भक्ति का वह दुर्लभ मार्ग, जो मोक्ष और सुख-समृद्धि का द्वार खोलता है।
पद्मिनी एकादशी: व्रत की तिथि और समय
- तिथि: 27 मई 2026, बुधवार।
- एकादशी तिथि का प्रारंभ: 26 मई, सुबह 05:10 बजे।
- एकादशी तिथि का समापन: 27 मई, सुबह 06:21 बजे।
- व्रत का विधान: उदयातिथि के अनुसार, यह व्रत 27 मई को ही रखा जाएगा।
क्यों खास है यह एकादशी?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, स्वयं श्री कृष्ण ने अर्जुन को इस व्रत का महत्व समझाते हुए कहा था कि जो पुण्य तीर्थों, यज्ञों और घोर तपस्या से प्राप्त होता है, वह पुण्य केवल पद्मिनी एकादशी का व्रत रखने से मिल जाता है। कार्तवीर्य अर्जुन के माता-पिता ने भी संतान प्राप्ति के लिए इसी व्रत को किया था, जिसके फलस्वरूप उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। यह मलमास में पड़ने के कारण अत्यंत दुर्लभ और पुण्यदायी मानी जाती है।
एकादशी का वास्तविक अर्थ: 99% लोग हैं अनजान
अधिकतर लोग एकादशी को केवल एक ‘तिथि’ या ‘उपवास’ के रूप में जानते हैं, परंतु इसका अर्थ अत्यंत गहरा है:
- एकादशी = 1 + 10: इसमें ‘एक’ का अर्थ है परमात्मा और ‘दशा’ का अर्थ है दस इंद्रियाँ।
- इंद्रिय नियंत्रण: हमारे पास 5 ज्ञानेंद्रियाँ, 5 कर्मेंद्रियाँ और 1 मन है (कुल 11)। इन सभी को सांसारिक कुविचारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह) से हटाकर ईश्वर की ओर मोड़ना ही एकादशी का असली उद्देश्य है।
- सबसे बड़ी भूल: यदि आप व्रत में अन्न का त्याग तो कर देते हैं, लेकिन मन में क्रोध, ईर्ष्या और नकारात्मकता रखते हैं, तो आपको व्रत का 1% भी फल नहीं मिलता। एकादशी केवल शरीर को भूखा रखने की नहीं, बल्कि मन को संयमित करने की तपस्या है।
व्रत के अनिवार्य नियम और सावधानियाँ
- दशमी से नियम: व्रत के नियम एक दिन पूर्व दशमी तिथि से ही प्रारंभ हो जाते हैं। तामसिक भोजन (प्याज-लहसुन) का पूर्ण त्याग करें।
- पूजा-विधि: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। पूजा में तुलसी दल (तुलसी की पत्ती) का प्रयोग अनिवार्य है, क्योंकि इसके बिना विष्णु पूजा अधूरी मानी जाती है।
- मन की पवित्रता: दिनभर मन, वचन और कर्म से शुद्ध रहें। विवाद, झूठ और अपमान से बचें।
- दान-पुण्य: इस दिन जरूरतमंदों को अन्न, जल और वस्त्र का दान करना अत्यंत शुभ है। पारण (व्रत खोलने) से पहले ब्राह्मणों को दक्षिणा अवश्य दें।





































