वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक बहुत अधिक तेजी आ गई है। करीब दो महीने के अंतराल के बाद क्रूड का भाव फिर से सौ डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। इससे पहले बाइस मई को इसकी कीमत सौ डॉलर के स्तर से ऊपर दर्ज की गई थी। अगर हम पिछले एक महीने के आंकड़ों की बात करें तो इसकी कीमत में तैंतीस प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। इस अप्रत्याशित वृद्धि ने सरकार के साथ-साथ आम लोगों की चिंता को भी काफी ज्यादा बढ़ा दिया है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में तनाव का असर कच्चे तेल की कीमतों में आई इस बड़ी तेजी की मुख्य वजह Middle East में बढ़ता हुआ तनाव है। विशेष रूप से US और Iran के बीच लगातार बढ़ते सैन्य संघर्ष ने इस स्थिति को और गंभीर बना दिया है। इस भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका है। बाजार के जानकारों का मानना है कि इस तरह के सैन्य संघर्ष से ऊर्जा बाजार में भारी उतार-चढ़ाव आ सकता है। इसी डर और अनिश्चितता के कारण वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में लगातार तेजी का रुख देखा जा रहा है।
सप्लाई चेन पर नाकेबंदी का खतरा सैन्य संघर्ष के साथ-साथ लाल सागर और बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य में भी सुरक्षा की स्थिति काफी खराब हो गई है। यहां हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी तेल टैंकरों को लगातार अपना निशाना बनाया जा रहा है। इन विद्रोहियों द्वारा नाकेबंदी के ऐलान ने पूरी वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित करने की आशंका बढ़ा दी है। इसके अतिरिक्त होर्मुज जलडमरूमध्य से भी शिपिंग ट्रैफिक काफी कम हो गया है। मार्केट एक्सपर्ट्स का स्पष्ट तौर पर मानना है कि यदि यह तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो क्रूड एक सौ बीस डॉलर प्रति बैरल तक भी पहुंच सकता है।
आयात बिल और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का यह महंगा होना India के लिए एक बड़े खतरे की घंटी माना जा रहा है। India अपनी कुल जरूरत का पच्चासी से अठासी प्रतिशत तक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। कच्चे तेल के भाव बढ़ने से देश का आयात बिल बहुत तेजी से बढ़ने लगता है। आयात बिल में इस भारी बढ़ोतरी के कारण चालू खाते का घाटा भी काफी हद तक बढ़ जाता है। आर्थिक मोर्चे पर इन नकारात्मक बदलावों के परिणामस्वरूप अंततः भारतीय रुपये पर भारी दबाव उत्पन्न हो जाता है।
महंगाई बढ़ने का गंभीर खतरा कच्चे तेल में तेजी India के लिए आर्थिक मोर्चे पर एक दोहरे झटके की तरह काम करती है। ईंधन की कीमतें बढ़ने से देश भर में माल ढुलाई और परिवहन की लागत में भारी वृद्धि हो जाती है। परिवहन लागत के इस तरह बढ़ने से फल और सब्जियों के दाम तेजी से आसमान छूने लगते हैं। इसके अलावा दैनिक जरूरत की सभी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भी भारी उछाल देखने को मिल सकता है। इस पूरी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप देश के आम नागरिकों को बढ़ती महंगाई का गंभीर रूप से सामना करना पड़ सकता है।
पेट्रोल और डीजल के दामों पर असर कच्चे तेल के महंगे होने से भारतीय ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के मार्जिन पर दबाव काफी ज्यादा बढ़ गया है। यदि क्रूड सौ डॉलर प्रति बैरल के ऊपर लंबे समय तक टिका रहता है, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं। हालांकि सरकार और तेल कंपनियां शुरुआत में उपभोक्ताओं को इस सीधे झटके से बचाने का पूरा प्रयास करती हैं। इसके लिए एक्साइज ड्यूटी घटाने या रिफाइनरी मार्जिन के जरिए अतिरिक्त दबाव को सोखने की कोशिश की जाती है। लेकिन अगर यह अंतरराष्ट्रीय संकट जल्द शांत नहीं हुआ, तो आम उपभोक्ताओं को अंततः ईंधन की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ेगा।


























































