प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को संध्याकाल (प्रदोष काल) में भगवान शिव की आराधना का विधान है। जब यह शुभ दिन रविवार को पड़ता है, तो इसे रवि प्रदोष व्रत कहा जाता है। शिव भक्तों के लिए यह दिन अत्यंत मंगलकारी और विशेष फलदायी माना जाता है।
रवि प्रदोष व्रत का महत्व
- पितृ दोष से मुक्ति: रवि प्रदोष का व्रत पितृ दोष के निवारण के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
- स्वास्थ्य और सम्मान: इस व्रत को सच्चे मन से करने पर व्यक्ति को उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और समाज में मान-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।
- शिव और सूर्य की कृपा: रविवार का दिन होने के कारण इस दिन भगवान शिव के साथ-साथ सूर्य देव का भी विशेष आशीर्वाद मिलता है।
- संकटों का नाश: पुराणों के अनुसार, त्रयोदशी की रात के पहले प्रहर में शिव प्रतिमा के दर्शन कर उन्हें भेंट अर्पित करने से जीवन की सभी समस्याओं का समाधान हो जाता है।
शुभ मुहूर्त (26 जुलाई 2026)
- त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 26 जुलाई, दोपहर 1:57 बजे से
- त्रयोदशी तिथि समापन: 27 जुलाई, शाम 4:14 बजे तक
- पूजा का उत्तम समय (प्रदोष काल): शाम 7:17 बजे से रात 9:28 बजे तक
इस बार बन रहे हैं दो महा-शुभ योग
इस बार का रवि प्रदोष व्रत पूजा-पाठ के लिए अति फलदायी है क्योंकि इस दिन दो प्रमुख शुभ योगों का निर्माण हो रहा है:
- इंद्र योग: सूर्योदय से शुरू होकर रात 10:05 बजे तक रहेगा।
- सर्वार्थ सिद्धि योग: सुबह 7:34 बजे से शुरू होकर अगले दिन सुबह 5:40 बजे तक रहेगा।
शिव कृपा के लिए चमत्कारी मंत्र
प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करते समय इन मंत्रों का जाप अवश्य करें:
- पंचाक्षरी मंत्र: ॐ नमः शिवाय
- रुद्र मंत्र: ॐ नमो भगवते रुद्राय॥
- महामृत्युंजय मंत्र: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
- शिव गायत्री मंत्र: ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥


























































