उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से पहले बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती बेहद सख्त नजर आ रही हैं। पार्टी संगठन को मजबूत करने और किसी भी प्रकार की गुटबाजी को रोकने के लिए मायावती लगातार कड़े फैसले ले रही हैं। 31 जुलाई को ही मायावती ने यह पूरी तरह साफ कर दिया था कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में आकाश आनंद की भूमिका सीमित रहेगी। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि यूपी में प्रत्याशियों का टिकट फाइनल करने में आकाश आनंद का कोई भी रोल नहीं रहने वाला है। मायावती के इस बयान के बाद पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन को लेकर विभिन्न प्रकार की राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं।
बढ़ती ताकत और दखल से खफा मायावती राजनीतिक गलियारों में यह माना जा रहा है कि मायावती अपने करीबियों की बढ़ती राजनीतिक ताकत से काफी असहज और खफा चल रही थीं। आगामी यूपी चुनाव से पहले अशोक सिद्धार्थ और आकाश आनंद की बढ़ती ताकत और संगठन में दखल से वे काफी नाराज थीं। इसी नाराजगी के चलते उन्होंने अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाकर पूरे संगठन को एक बड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है। मायावती इस सख्त कार्रवाई से यह साबित करना चाहती हैं कि बहुजन समाज पार्टी में केवल वही होगा जो मायावती खुद चाहेंगी। पार्टी में अनुशासनहीनता या समानांतर सत्ता केंद्र चलाने की कोशिश करने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।
अशोक सिद्धार्थ और रणधीर बेनीवाल निष्कासित मायावती ने पूर्व राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ को बीएसपी की प्राथमिक सदस्यता से तत्काल प्रभाव से पूरी तरह निष्कासित कर दिया है। अशोक सिद्धार्थ पर कर्नाटक, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में बीएसपी कोऑर्डिनेटर के रूप में काम करते हुए अनुशासनहीनता के आरोप लगे थे। इसके साथ ही सहारनपुर के निवासी और पार्टी के प्रमुख कोऑर्डिनेटर रणधीर सिंह बेनीवाल पर भी अनुशासनात्मक कार्रवाई की गाज गिरी है। रणधीर सिंह बेनीवाल पर पंजाब, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में काम के दौरान पार्टी नियमों के उल्लंघन का सीधा आरोप लगा है। दोनों बड़े नेताओं के निष्कासन के बाद बीएसपी ने राज्यसभा सांसद रामजी गौतम को दोबारा पंजाब का नया प्रभारी नियुक्त किया है।
उत्तर प्रदेश के पदाधिकारियों के लिए नई नीति बीएसपी शीर्ष नेतृत्व ने सांगठनिक व्यवस्था को सुचारू बनाने के लिए एक और नई और बेहद महत्वपूर्ण नीति को स्पष्ट किया है। पार्टी ने साफ किया है कि उत्तर प्रदेश के रहने वाले वरिष्ठ पदाधिकारियों और कोऑर्डिनेटरों को यूपी में जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी। यदि वे वर्तमान में किसी दूसरे राज्य का प्रभार संभाल रहे हैं, तो उन्हें केवल वहीं पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करना होगा। इस नियम के जरिए मायावती उत्तर प्रदेश में गुटबाजी को खत्म कर सीधे अपने नियंत्रण में चुनाव अभियान चलाना चाहती हैं। इससे पहले भी मायावती अशोक सिद्धार्थ और आकाश आनंद को पार्टी से निकाल चुकी हैं, जिन्हें माफी के बाद वापस लिया गया था।
अशोक सिद्धार्थ का बीएसपी में राजनीतिक सफर अशोक सिद्धार्थ पेशे से डॉक्टर हैं और उन्होंने साल 2008 में मायावती के कहने पर अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिया था। नौकरी छोड़कर बीएसपी में शामिल होने के बाद मायावती ने साल 2009 में उन्हें उत्तर प्रदेश से एमएलसी के पद पर भेजा था। इसके बाद पार्टी में उनके बढ़ते कद को देखते हुए मायावती ने साल 2016 में उन्हें राज्यसभा का सांसद भी बनाया था। वे हाल ही में बीएसपी के दक्षिण भारतीय राज्यों के प्रभारी पद की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे थे और काफी प्रभावशाली थे। उनकी बेटी डॉक्टर प्रज्ञा की शादी मायावती के भतीजे आकाश आनंद से हुई है, जिसके कारण वे मायावती के करीबी समधी हैं।
2027 के लिए सोशल इंजीनियरिंग पर जोर राजनीतिक फेरबदल के बीच मायावती समाजवादी पार्टी के मिशन ब्राह्मण को मात देने के लिए पुराने राजनीतिक दांव पर लौटी हैं। मायावती ने सोशल मीडिया पर ऐलान किया कि जिस प्रकार 2007 में ब्राह्मण समाज के सहयोग से बीएसपी ने सरकार बनाई थी। साल 2007 के चुनाव में बसपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया था और राज्य में एक मजबूत सरकार का गठन किया था। ठीक उसी तरह का सोशल इंजीनियरिंग का राजनीतिक समीकरण आगामी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में दोबारा दोहराया जाएगा। मायावती का मानना है कि पार्टी का पुराना कोर कैडर और सर्वजन समाज मिलकर उत्तर प्रदेश में एक बार फिर इतिहास रचेंगे।

























































