ब्रह्म वैवर्त पुराण में देवशयनी एकादशी का अत्यधिक महत्व बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु पूरे भक्ति-भाव से इस एकादशी का व्रत रखता है, उसकी सभी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं।
- व्रत की तिथि: इस वर्ष यह पवित्र एकादशी व्रत 25 जुलाई 2026 को रखा जा रहा है।
- चातुर्मास का आरंभ: यह एकादशी योगिनी एकादशी के ठीक बाद आती है और इसी दिन से ‘चातुर्मास’ की भी शुरुआत हो जाती है। चातुर्मास वह अवधि है जब भगवान श्री विष्णु पूरे चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं और फिर सीधे देवोत्थान (प्रबोधिनी) एकादशी के दिन जागते हैं।
आइए विस्तार से जानते हैं देवशयनी एकादशी की उस पौराणिक कथा के बारे में, जिसे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाया था।
देवशयनी एकादशी व्रत कथा (Devshayani Ekadashi Vrat Katha)
युधिष्ठिर का प्रश्न और श्रीकृष्ण का उत्तर एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे प्रभु! आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? इस व्रत को करने के नियम क्या हैं और इसमें किस देवता की पूजा की जाती है?”
इसके उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “हे युधिष्ठिर! जो कथा स्वयं ब्रह्मा जी ने देवर्षि नारद को सुनाई थी, वही मैं तुम्हें सुनाने जा रहा हूं। ध्यानपूर्वक सुनो।”
राजा मांधाता के राज्य में भयंकर अकाल सतयुग में मांधाता नाम के एक महान चक्रवर्ती सम्राट राज करते थे। उनके राज्य में प्रजा अत्यंत सुख, शांति और संपन्नता के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रही थी। लेकिन एक समय ऐसा आया जब उनके राज्य में लगातार तीन वर्षों तक बिल्कुल वर्षा नहीं हुई।
- वर्षा न होने के कारण राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया।
- अन्न-जल के अभाव में राजा सहित पूरी प्रजा इस भारी संकट से व्याकुल और परेशान हो उठी।
राजा चिंतित होकर सोचने लगे कि आखिर उनसे ऐसा कौन सा पाप हो गया है, जिसका इतना कठोर दंड उन्हें और उनकी निर्दोष प्रजा को भुगतना पड़ रहा है।
महर्षि अंगिरा से भेंट और अकाल का कारण इस घोर कष्ट से मुक्ति का उपाय खोजने के उद्देश्य से राजा मांधाता अपनी सेना के साथ घने जंगल की ओर निकल पड़े।
- जंगल में भटकते हुए एक दिन वे ब्रह्मा जी के पुत्र महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुंचे और उन्हें साष्टांग प्रणाम किया।
- ऋषिवर ने राजा को आशीर्वाद दिया और उनके वन में आने का कारण पूछा।
राजा ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा, “हे महात्मन्! मैं पूरी निष्ठा से धर्म का पालन करता हूं, फिर भी मेरे राज्य की ऐसी दयनीय स्थिति क्यों हो गई है? आखिर किस कारण से वर्षा रुकी हुई है? कृपया इस संकट से उबरने का कोई मार्ग बताएं।”
महर्षि अंगिरा ने राजा की बात सुनकर कहा, “हे राजन! यह सतयुग है, जो सभी युगों में सबसे उत्तम माना जाता है। इस युग में एक छोटे से पाप का भी बहुत बड़ा दंड मिलता है। तुम्हारे राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है, जो कि इस युग के विधान के विरुद्ध है। इसी कारण तुम्हारे राज्य में वर्षा नहीं हो रही है।”
अकाल से मुक्ति का उपाय और व्रत का प्रभाव महर्षि ने आगे कहा कि जब तक वह तपस्वी काल को प्राप्त नहीं होता, तब तक यह अकाल की स्थिति बनी रहेगी। परंतु राजा का हृदय अत्यंत कोमल था; वह एक निरपराध तपस्वी की हत्या करने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने महर्षि से अकाल दूर करने का कोई अन्य उपाय पूछा।
- महर्षि का सुझाव: तब महर्षि अंगिरा ने राजा को आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवशयनी एकादशी) का व्रत करने का सुझाव दिया और कहा कि इस व्रत के प्रभाव से राज्य में अवश्य वर्षा होगी।
- व्रत का शुभ परिणाम: राजा मांधाता ने अपने राज्य वापस लौटकर चारों वर्णों की प्रजा के साथ पूरे विधि-विधान से देवशयनी एकादशी का व्रत किया।
इस पवित्र व्रत के पुण्य प्रभाव से उनके राज्य में मूसलाधार वर्षा हुई, जिससे चारों ओर फिर से हरियाली छा गई और राज्य में पहले जैसी खुशहाली और समृद्धि लौट आई।


























































