अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ होने वाले नागरिक परमाणु कार्यक्रम पर अपना रुख सख्त कर लिया है। बीते गुरुवार को उन्होंने इस महत्वपूर्ण द्विपक्षीय समझौते में अचानक अपनी तरफ से एक नई और बड़ी शर्त जोड़ दी है। ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि इस अहम डील को पूरा करने के लिए सऊदी अरब को अपने कूटनीतिक कदम बदलने होंगे। उनके अनुसार सऊदी अरब को अब्राहम समझौते के जरिए इजरायल के साथ अपने संबंधों को हर हाल में सामान्य करना होगा। ट्रंप के इस फैसले ने मध्य पूर्व की पूरी कूटनीतिक और राजनीतिक स्थिति में एक नई हलचल पैदा कर दी है।
शुरुआती घोषणा में छिपी बात इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प बात शुरुआती घोषणा और ट्रंप के बयान के बीच का भारी अंतर है। बीते बुधवार को जब इस ऐतिहासिक डील की औपचारिक घोषणा की गई थी, तब किसी शर्त का जिक्र नहीं था। अमेरिका के ऊर्जा विभाग ने अपनी आधिकारिक प्रेस रिलीज में इजरायल के साथ संबंधों की कोई बात नहीं की थी। इसी तरह सऊदी अरब की सरकार ने भी इस तरह की किसी भी शर्त को लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया था। डील का सऊदी अरब और इजरायल के रिश्तों पर निर्भर होना पूरी तरह से एक नया और चौंकाने वाला घटनाक्रम है।
मंजूरी में आ सकती है बाधा डील की घोषणा के केवल एक दिन बाद ही ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इस शर्त को सबके सामने रखा। उनका यह कहना कि न्यूक्लियर डील अब्राहम समझौते पर निर्भर करेगी, एक बहुत ही अप्रत्याशित और बड़ा कूटनीतिक कदम है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की इस नई शर्त के कारण इस डील को अंतिम मंजूरी मिलने में भारी मुश्किलें आ सकती हैं। हालांकि यह भी सच है कि 2020 के अब्राहम समझौते से इजरायल और कई अरब देशों के रिश्ते काफी मजबूत हुए हैं। फिर भी सऊदी अरब के लिए इस समझौते में शामिल होना घरेलू और क्षेत्रीय राजनीति के लिहाज से बहुत चुनौतीपूर्ण होगा।
क्या है अब्राहम समझौता अब्राहम समझौता असल में अमेरिका की अहम मध्यस्थता में संपन्न हुए कई संयुक्त राजनयिक समझौतों की एक विस्तृत सीरीज है। इसका मुख्य उद्देश्य इजरायल और विभिन्न मुस्लिम बहुल देशों के बीच राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को पूरी तरह नॉर्मल करना है। पंद्रह सितंबर 2020 को अमेरिका के व्हाइट हाउस में इस ऐतिहासिक समझौते पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर किए गए थे। इस समझौते की सबसे खास बात यह है कि इसने इजरायली-फिलिस्तीनी संघर्ष के हल को आपसी संबंधों के लिए शर्त नहीं बनाया। यह नाम बाइबिल के पैगंबर अब्राहम से लिया गया है, जिन्हें यहूदी, इस्लाम और ईसाई तीनों धर्मों में बेहद सम्मानित माना जाता है।
शामिल देश और फिलिस्तीन मुद्दा इस महत्वपूर्ण अब्राहम समझौते में अब तक यूएई, बहरीन, मोरक्को, सूडान, कजाकिस्तान और सोमालीलैंड आधिकारिक रूप से शामिल हो चुके हैं। इन देशों ने इजरायल के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को सुधार कर एक नई कूटनीतिक शुरुआत की है। अगर सऊदी अरब इस समझौते में शामिल होता है तो यह अमेरिका के लिए एक बहुत बड़ी राजनयिक उपलब्धि मानी जाएगी। हालांकि सऊदी अरब ने स्पष्ट कर दिया है कि इजरायल से संबंध सुधारने के लिए पहले फिलिस्तीनी राज्य का गठन जरूरी है। वह बिना फिलिस्तीन विवाद के समाधान के इजरायल के साथ अपने कूटनीतिक रिश्ते पूरी तरह से सामान्य नहीं करना चाहता है।
इजरायल का रुख और उठे सवाल सऊदी अरब की फिलिस्तीन राज्य के गठन की मांग को इजरायल की तरफ से कड़ा विरोध झेलना पड़ रहा है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू फिलिस्तीन के गठन के विचार को अपने देश की सुरक्षा के लिए अव्यावहारिक बता चुके हैं। इजरायल के इस सख्त रुख के कारण सऊदी अरब का अब्राहम समझौते में शामिल होना काफी जटिल प्रक्रिया बन गया है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका की सऊदी न्यूक्लियर डील को लेकर कई अन्य गंभीर सवाल भी उठने लगे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि जब ईरान के साथ ऐसी ही डील थी तो उसे नामंजूर कर सऊदी के साथ नया समझौता क्यों किया गया।


























































