Sonam Wangchuk ने अपने अनशन की समाप्ति के बाद एक बहुत ही स्पष्ट और विस्तृत बयान जारी किया है। उन्होंने जनता के उस अहम सवाल का जवाब दिया जिसमें Dharmendra Pradhan के इस्तीफे की बात शामिल थी। उन्होंने साफ तौर पर बताया कि सरकार उन्हें इस बात पर कोई भी ठोस आश्वासन बिल्कुल नहीं दे पाई है। केंद्रीय मंत्रियों के साथ हुई लंबी बातचीत में यह तय नहीं हो पाया कि यह इस्तीफा आखिरकार कब होगा। इस्तीफे की समयसीमा को लेकर सरकार की तरफ से किसी भी प्रकार की कोई पक्की प्रतिबद्धता नहीं दिखाई गई।
जान की कीमत और संघर्ष: इस्तीफे का आश्वासन ना मिलने पर उनके पास हफ्तों तक और भूख हड़ताल पर बैठे रहने का एक विकल्प था। लेकिन लंबे अनशन के कारण उनके शरीर की स्थिति बिगड़ रही थी और इससे उनकी जान भी जा सकती थी। पिछले कई हफ्तों से उनके हजारों समर्थक लगातार उनसे यह कह रहे थे कि उनकी जान बहुत महत्वपूर्ण है। समर्थकों का मानना था कि आगे के संघर्ष को जारी रखने के लिए उनका जीवित और स्वस्थ रहना बेहद जरूरी है। इन्हीं अपीलों और अपने स्वास्थ्य की गंभीर स्थिति को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अनशन तोड़ने का फैसला लिया।
सरकार का खुद का नुकसान: एक्टिविस्ट ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनका दिमाग राजनीतिक मामलों में कुछ अलग तरह से काम करता है। उनका मानना है कि अगर शिक्षा मंत्री इस्तीफा नहीं देते हैं तो इससे बच्चों या आम लोगों को कोई नुकसान नहीं होगा। इस छोटे से मुद्दे से न निपटकर और इस्तीफा न दिलाकर मौजूदा सरकार असल में अपना ही बड़ा नुकसान कर रही है। उनका विचार है कि इस गंभीर स्थिति में संबंधित मंत्री को बहुत पहले ही अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए था। अगर समय रहते इस्तीफा दे दिया जाता तो सरकार को होने वाले इस सारे राजनीतिक नुकसान को रोका जा सकता था।
बच्चों की सुरक्षा पहली प्राथमिकता: आंदोलनकारी नेता के लिए किसी मंत्री का इस्तीफा हासिल करना इस पूरे संघर्ष की सबसे महत्वपूर्ण बात नहीं थी। उनका दृढ़ विश्वास है कि इस्तीफे जैसे राजनीतिक मुद्दे आने वाले समय में अपने आप ही पूरी तरह हल हो जाएंगे। उनके लिए किसी भी अन्य चीज से ज्यादा जरूरी यह था कि हमारे देश के बच्चे ऐसे कानूनी मामलों में न फंसें। वे यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि प्रदर्शन करने वाले किसी भी युवा के खिलाफ कोई पुलिस कार्रवाई न की जाए। उन्होंने सरकार से यह बड़ी राहत हासिल कर ली है जिससे वह व्यक्तिगत रूप से काफी संतुष्ट और खुश नजर आ रहे हैं।
सांसदों का मिला व्यापक समर्थन: इस पूरे आंदोलन के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों के पैंसठ से ज्यादा सांसदों ने अपना मजबूत समर्थन दिखाया। इन सभी सांसदों ने एकजुट होकर अनशन तोड़ने का आग्रह किया और एक महत्वपूर्ण पत्र पर हस्ताक्षर भी किए। उन्होंने लिखित तौर पर यह भरोसा दिलाया कि वे NEET पेपर लीक के मुद्दे को गंभीरता से Parliament में उठाएंगे। अब परीक्षा प्रणाली की कमियों और सरकार की जवाबदेही पर संसद के भीतर विस्तृत बहस की जाएगी। इस बहस से देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार होने और भविष्य में ऐसी घटनाओं के रुकने की पूरी उम्मीद है।
छब्बीस दिन के अनशन का अंत: लगातार छब्बीस दिनों तक चले इस कठिन और संघर्षपूर्ण अनशन का अंततः एक सकारात्मक परिणाम सामने आया है। केंद्रीय मंत्री JP Nadda और Jitendra Singh ने Medanta Hospital पहुंचकर स्थिति को पूरी तरह से संभाला। उन्होंने एक्टिविस्ट से गहन बातचीत की और उन्हें सरकार की ओर से आधिकारिक लिखित प्रस्ताव सौंप दिया। इस प्रस्ताव में पेपर लीक में मारे गए बीस से अधिक बच्चों के परिवारों को उचित मुआवजा देने की बात शामिल है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद देर रात अनशन समाप्त हो गया और देश में संभावित हिंसा का एक बड़ा खतरा टल गया।


























































