उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच बीजेपी के मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर लगातार चर्चाएं जारी हैं। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के इस बयान ने कि सीएम का फैसला पार्लियामेंट्री बोर्ड करेगा, पुरानी बहसों को फिर से ताजा कर दिया है। अगर बीते कुछ वर्षों में बीजेपी के सीएम चुनने के पैटर्न को देखें तो घोषित या दावेदार नेता अक्सर रेस से बाहर हो जाते हैं। कई बार जिस नेता के नाम का सबसे ज्यादा दावा किया जाता है, वही अंत में नए मुख्यमंत्री के नाम का प्रस्तावक बन जाता है। यही वजह है कि यूपी में पंकज चौधरी के बयान के बाद पिछले राज्यों के चुनावी नतीजों और फैसलों का विश्लेषण हो रहा है।
मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ का अनुभव मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में कई वरिष्ठ नेताओं को मुख्यमंत्री पद का तय दावेदार माना जा रहा था। एमपी में शिवराज सिंह चौहान, राजस्थान में वसुंधरा राजे और छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह के नाम की सबसे ज्यादा चर्चा थी। हालांकि चुनाव परिणाम आने के बाद बीजेपी ने सभी को चौंकाते हुए तीनों ही राज्यों में बिल्कुल नए चेहरों को मुख्यमंत्री बना दिया। एमपी में मोहन यादव, राजस्थान में भजन लाल शर्मा और छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय को अचानक कमान सौंप दी गई थी। राजस्थान में राजनाथ सिंह द्वारा वसुंधरा राजे को पर्ची थमाने का दृश्य आज भी सियासी हलकों में काफी मशहूर माना जाता है।
हरियाणा और महाराष्ट्र में बीजेपी की रणनीति हरियाणा के चुनाव में गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव के दौरान ही साफ कर दिया था कि नायब सिंह सैनी ही सीएम बनेंगे। मनोहर लाल खट्टर को हटाकर सैनी को सीएम फेस बनाने से बीजेपी को नॉन-जाट और ओबीसी वोटों को गोलबंद करने में सफलता मिली थी। दूसरी तरफ महाराष्ट्र में बीजेपी नीत महायुति ने चुनाव से पहले किसी भी नेता को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया था। वहां विधानसभा में पार्टियों के संख्याबल के आधार पर तय हुआ कि किस दल का नेता मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालेगा। हरियाणा में रणनीति काम कर गई, जबकि महाराष्ट्र में गठबंधन के भीतर संख्याबल ने आगे की राह तय करने में मदद की।
असम, दिल्ली और बंगाल का चुनावी ट्रेंड असम चुनाव 2026 के परिणामों के बाद जब हिमंत बिस्वा सरमा से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि विधायक दल फैसला करेगा। असम में बीजेपी ने हिमंत के चेहरे पर चुनाव तो लड़ा, लेकिन उनके नाम का कोई औपचारिक ऐलान पहले नहीं किया गया था। दिल्ली में भी चुनाव से पहले बीजेपी ने किसी सीएम फेस का ऐलान नहीं किया और नतीजों के बाद रेखा गुप्ता को सीएम बनाया गया। पश्चिम बंगाल में भी बिना किसी औपचारिक घोषणा के चुनाव लड़ा गया और बाद में सुवेंदु अधिकारी को कमान सौंपी गई थी। इन उदाहरणों से साफ है कि बीजेपी अक्सर बिना औपचारिक सीएम फेस के चुनाव मैदान में उतरने की रणनीति अपनाती रही है।
योगी आदित्यनाथ और शीर्ष नेतृत्व का रुख उत्तर प्रदेश के संदर्भ में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने पहले कहा था कि योगी आदित्यनाथ ही सीएम फेस होंगे। लेकिन इसके बाद पंकज चौधरी का पार्लियामेंट्री बोर्ड की बैठक में फैसला होने की बात कहना एक अलग संकेत देता है। गाजियाबाद में पंकज चौधरी ने स्पष्ट किया कि बोर्ड ही तय करेगा कि योगी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा या नहीं। इस विरोधाभास के पीछे पार्टी की गहरी राजनीतिक रणनीति छिपी हो सकती है जो विभिन्न सामाजिक समूहों को साधे रखती है। यूपी में योगी आदित्यनाथ की व्यापक लोकप्रियता के बावजूद पार्टी संगठन स्तर पर सभी विकल्पों को खुला रखना चाहती है।
संसदीय बोर्ड और आगामी निर्णय विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान दौर में अंतिम निर्णय केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह द्वारा लिया जाता है। पार्लियामेंट्री बोर्ड की बात करना अक्सर क्षेत्रीय समीकरणों और नाराज गुटों को शांत रखने का एक सेफगार्ड होता है। यूपी में ब्राह्मण समाज की नाराजगी और उनके प्रभाव को देखते हुए किसी भी एकतरफा ऐलान से पार्टी बचना चाहती है। पंकज चौधरी के बयान से अन्य नेताओं और समर्थकों के बीच उम्मीद बनी रहती है कि भविष्य में नए अवसर मिल सकते हैं। इस तरह बीजेपी पिछले राज्यों के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए यूपी 2027 के लिए अपनी बिसात बिछा रही है।

























































