सनातन धर्म में वराह जयंती का विशेष महत्व माना जाता है, जो भगवान विष्णु के तीसरे अवतार ‘वराह रूप’ के प्राकट्य का उत्सव है। इस वर्ष 13 सितंबर 2026, रविवार को देश भर में श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ वराह जयंती मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सतयुग में इसी पावन तिथि पर भगवान विष्णु ने पृथ्वी की रक्षा के लिए एक विशाल महावराह (महान वराह) के रूप में अवतार लिया था और अत्याचारी दैत्य हिरण्याक्ष का वध कर डूबती हुई पृथ्वी (भूदेवी) को समुद्र की गहराइयों से बाहर निकाला था।
तिथि और शुभ मुहूर्त (Varaha Jayanti 2026 Timings)
हिंदू पंचांग के अनुसार, यह पर्व हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। 2026 के लिए पंचांग गणना इस प्रकार है:
- तृतीया तिथि का प्रारंभ: 13 सितंबर 2026 को सुबह 07:08 बजे
- तृतीया तिथि का समापन: 14 सितंबर 2026 को सुबह 07:06 बजे
- उदयातिथि के अनुसार व्रत/पूजा का दिन: 13 सितंबर 2026, रविवार
- मध्याह्न पूजा का विशेष शुभ मुहूर्त: दोपहर 01:31 बजे से शाम 04:00 बजे तक (अवधि: 2 घंटे 29 मिनट)
मध्याह्न पूजा मुहूर्त (सबसे श्रेष्ठ मुहूर्त)
यह भगवान वराह की साधना और मुख्य पूजा के लिए पंचांग के अनुसार सबसे उत्तम समय है:
- समय: दोपहर 01:31 बजे से शाम 04:00 बजे तक (13 सितंबर 2026, रविवार)
- कुल अवधि: 2 घंटे 29 मिनट
- महत्व: इसी काल में भगवान विष्णु ने वराह रूप में अवतार लिया था, इसलिए इस समय की गई पूजा का फल शीघ्र मिलता है।
सुबह की पूजा का शुभ मुहूर्त (चर और लाभ चौघड़िया)
यदि आप सुबह के समय कलश स्थापना और प्रारंभिक पूजन करना चाहते हैं, तो इस शुभ चौघड़िया मुहूर्त का उपयोग कर सकते हैं:
- समय: सुबह 07:44 बजे से दोपहर 12:19 बजे तक (13 सितंबर 2026, रविवार)
- महत्व: इस समयावधि में ‘चर’, ‘लाभ’ और ‘अमृत’ के शुभ चौघड़िया मुहूर्त रहेंगे, जो किसी भी मांगलिक कार्य और देव-पूजन के लिए अत्यंत शुभ माने जाते हैं।
नोट: भगवान वराह का प्राकट्य दोपहर (मध्याह्न काल) में हुआ माना जाता है, इसलिए इस काल में पूजा करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
पौराणिक कथा और महत्व (The Legend of Varaha Avatar)
श्रीमद्भागवत पुराण के तीसरे स्कंध के अनुसार, ऋषि कश्यप और दिति के पुत्र दैत्य हिरण्याक्ष ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से अजेय होने का वरदान प्राप्त कर लिया था। वरदान के अहंकार में आकर उसने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया और देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया। अपने पराक्रम को सिद्ध करने के लिए उसने पूरी पृथ्वी को बांधकर ब्रह्मांडीय महासागर (रसातल) की गहराइयों में छिपा दिया।
सृष्टि के संतुलन को बचाने के लिए ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु का ध्यान किया। पौराणिक कथाओं के अनुसार, अचानक ब्रह्मा जी की नासिका से अंगूठे के आकार का एक छोटा सा वराह शिशु प्रकट हुआ, जो देखते ही देखते विशालकाय पर्वत के समान आकाश में फैल गया। भगवान विष्णु का यही वराह अवतार था।
भगवान वराह ने महासागर की अगाध गहराइयों में छलांग लगाई और अपने शक्तिशाली दांतों (दाढ़) पर पृथ्वी देवी (भूदेवी) को सुरक्षित उठा लिया। जब वे पृथ्वी को वापस उसकी कक्षा में स्थापित करने आ रहे थे, तब दैत्य हिरण्याक्ष ने उन्हें चुनौती दी। भगवान वराह और हिरण्याक्ष के बीच भयंकर युद्ध हुआ और अंततः प्रभु ने उस पापी असुर का वध कर धर्म और सृष्टि की पुनर्स्थापना की।
वराह जयंती की पूजा विधि (Puja Vidhi & Rituals)
इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु के वराह स्वरूप की विशेष आराधना करते हैं:
- संकल्प और शुद्धिकरण: सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
- कलश स्थापना: पूजा स्थल पर एक साफ चौकी बिछाकर जल से भरा कलश स्थापित करें। कलश पर आम के पत्ते और नारियल रखें।
- मूर्ति स्थापना: चौकी पर भगवान वराह या भगवान विष्णु (अथवा शालिग्राम शिला) की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- अभिषेक: मूर्ति को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) और शुद्ध जल से अभिषेक कराएं।
- षोडशोपचार पूजन: भगवान को पीले चंदन का तिलक लगाएं, पीले फूल, पीले वस्त्र, अक्षत, धूप और दीपक अर्पित करें।
- भोग: प्रभु को पीले मिष्ठान्न, ऋतु फल और विशेष रूप से तुलसी दल युक्त नैवेद्य अर्पित करें।
- मंत्र जाप: पूजा के दौरान “ॐ वाराहाय नमः” अथवा वराह गायत्री मंत्र का जाप श्रद्धापूर्वक करें।
इस व्रत व पूजा के लाभ
- वास्तु व भूमि संबंधी लाभ: चूंकि भगवान वराह भूमि के उद्धारक हैं, इसलिए किसानों, भू-स्वामियों और संपत्ति के विवादों से जूझ रहे लोगों के लिए यह दिन विशेष फलदायी माना जाता है।
- दोषों से मुक्ति: इस दिन सच्चे मन से उपासना करने से कुंडली के वास्तु दोष, पितृ दोष और सभी प्रकार के अज्ञात भयों का नाश होता है।
- सुख-समृद्धि: मान्यता है कि भगवान वराह और माता भूदेवी की संयुक्त कृपा से घर में कभी धन, धान्य और स्वास्थ्य की कमी नहीं होती।
🔱 भगवान वराह के विशेष मंत्र (Powerful Varaha Mantras)
पूजा के समय तुलसी की माला या चंदन की माला से कम से कम 108 बार इन मंत्रों का जाप करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है:
- मूल मंत्र (सकल संकट नाशक): “ॐ नमो भगवते वराहरूषाय भूभुर्वः स्वः स्यात्पते भूपतित्वं मे देहि दापय स्वाहा।”
- लघु मंत्र (नियमित जाप के लिए): “ॐ वाराहाय नमः” या “ॐ नमो भगवते वाराहाय”
- वराह गायत्री मंत्र (बुद्धि और तेज के लिए): “ॐ धनुर्धराय विद्महे, उग्ररूपाय धीमहि, तन्नो वराहः प्रचोदयात्।”
- भूमि व संपत्ति प्राप्ति मंत्र: “ॐ नमः श्रीवराहाय धरन्युद्धारणाय स्वाहा।” (यदि भूमि, मकान या प्रॉपर्टी से जुड़ा कोई विवाद चल रहा हो, तो इस मंत्र का जाप चमत्कारी लाभ देता है।)
📖 मुख्य स्तोत्र (Varaha Stotra for Reading)
यदि आप संस्कृत स्तोत्र पढ़ने में सहज हैं, तो पूजा के बाद “श्री वराह कवच” या “श्री वराह स्तोत्र” का पाठ अवश्य करें। यदि पूरा स्तोत्र न पढ़ पाएं, तो आदिशंकराचार्य द्वारा रचित इस मुख्य श्लोक का 11 बार पाठ करें, जो शत्रुओं और भय का नाश करता है:
नमो नमस्ते वराहाय, भूत-धात्री-विधारिणे।
यस्य दंष्ट्राग्र-कोटीस्थ, भूमिश्चकास्ति मेदिनी॥
तुभ्यं च नमो देवाय, जगतां पालकाय च।
नमस्तेऽस्तु महाभाग, पाहि मां भव-सागरात्॥
वराह जयंती पर किए जाने वाले विशेष दान (Donation Guide)
चूंकि भगवान वराह पृथ्वी (भूमि) के रक्षक हैं, इसलिए इस दिन प्रकृति, भूमि और कृषि से जुड़ी वस्तुओं का दान सर्वोत्तम माना जाता है:
- अन्न और भूमिज वस्तुएं: गेहूं, जौ, बाजरा या सप्तधान्य (सात प्रकार के अनाज) का दान किसी जरूरतमंद को या मंदिर में करें।
- पीली वस्तुओं का दान: भगवान विष्णु को पीला रंग अति प्रिय है। चने की दाल, केला, पीले वस्त्र, केसर या हल्दी का दान करने से गुरु ग्रह मजबूत होता है।
- वृक्षारोपण और पर्यावरण: इस दिन किसी सार्वजनिक स्थान, मंदिर या घर के आंगन में तुलसी, पीपल, नीम या आम का पौधा लगाना सबसे बड़ा दान (प्रकृति दान) माना जाता है।
- गुड़ और तिल का दान: जीवन में चल रहे मानसिक तनाव और बाधाओं को दूर करने के लिए तिल और गुड़ का दान करें।
सुख-समृद्धि के अचूक उपाय (Effective Remedies)
- भूमि और मकान की समस्या के लिए: यदि आपका मकान नहीं बन पा रहा है या जमीन का विवाद है, तो वराह जयंती के दिन थोड़ी सी स्वच्छ मिट्टी (पीली या लाल) लेकर उसे एक लाल कपड़े में बांधें। भगवान वराह के चरणों में रखकर ऊपर दिए गए भूमि मंत्र का जाप करें। पूजा के बाद इस मिट्टी को अपने घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में सुरक्षित रख दें।
- कर्ज मुक्ति के लिए: इस दिन भगवान वराह को गुड़ से बने हलवे का भोग लगाएं और इसे गरीबों में बांट दें। इससे आर्थिक तंगी दूर होती है।
- वास्तु दोष निवारण: घर के मुख्य द्वार पर हल्दी और गंगाजल से स्वास्तिक बनाएं। भगवान वराह की कृपा से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाएगी।
- पशु सेवा: वराह अवतार पशु स्वरूप (वाराह/सूअर) में हुआ था, इसलिए इस दिन बेजुबान जानवरों, विशेषकर गायों को हरा चारा खिलाना और पक्षियों को दाना डालना अत्यधिक पुण्य देता है।
वराह जयंती पूजा सामग्री सूची (Complete Samagri List)
पूजा शुरू करने से पहले इन सभी सामग्रियों को एक स्थान पर एकत्रित कर लें ताकि साधना में कोई व्यवधान न आए:
- मुख्य आवश्यकताएं: भगवान वराह या भगवान विष्णु (या शालिग्राम जी) की मूर्ति अथवा सुंदर चित्र, एक लकड़ी की चौकी (बाजोट), और चौकी पर बिछाने के लिए पीला कपड़ा।
- कलश स्थापना के लिए: तांबे या मिट्टी का कलश, कलावा (मौली), आम या अशोक के 5-7 पत्ते, पानी वाला नारियल और कलश में डालने के लिए सिक्का, सुपारी व अक्षत।
- अभिषेक के लिए (पंचामृत): कच्चा दूध, दही, शुद्ध देसी घी, शहद, गंगाजल और मिश्री।
- पूजन के लिए पवित्र वस्तुएं: पीला चंदन, रोली/कुंकुम, गोपी चंदन, अक्षत (बिना टूटे हुए चावल), हल्दी पाउडर, और कपूर।
- सुगंध और प्रकाश: धूपबत्ती, रुई की बत्तियां, और दीपक (घी या तिल के तेल का)।
- पुष्प और माला: पीले रंग के फूल (गेंदा या पीला कमल), तुलसी की मंजरी और तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) — ध्यान रखें भगवान विष्णु की पूजा तुलसी के बिना अधूरी है।
- वस्त्र और अर्पण: भगवान के लिए पीले रंग का छोटा वस्त्र या नया जनेऊ, और एक कलावा।
- नैवेद्य (भोग): ऋतु फल (केला, सेब आदि), पंचमेवा (काजू, बादाम, किशमिश, पिस्ता, मखाना), और पीले रंग की मिठाई (बेसन के लड्डू या पेड़ा)।
- अन्य वस्तुएं: पान के पत्ते, साबुत सुपारी, लौंग, छोटी इलायची, आचमन के लिए शुद्ध जल का पात्र और एक साफ थाली (आरती के लिए)।
विशेष मनोकामना पूर्ति के विशिष्ट उपाय (Wish-Fulfilling Remedies)
अपनी आवश्यकता या जीवन में चल रही परेशानी के अनुसार वराह जयंती (13 सितंबर 2026) के दिन इनमें से कोई भी एक उपाय पूरी श्रद्धा से करें:
- शीघ्र विवाह और वैवाहिक सुख के लिए (For Marriage & Relationships): यदि विवाह में लगातार देरी हो रही है या वैवाहिक जीवन में तनाव है, तो भगवान वराह के साथ माता भूदेवी (पृथ्वी माता) का भी पूजन करें। भगवान को पीले वस्त्र और माता भूदेवी को लाल चुनरी व सुहाग सामग्री (सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी) अर्पित करें। पूजा के समय “ॐ लक्ष्मीनारायणाय नमः” का जाप करें।
- अटके हुए धन की प्राप्ति और व्यापार वृद्धि के लिए (For Wealth & Business): वराह जयंती की शाम को घर के मुख्य द्वार पर गाय के घी का एक मुखी दीपक जलाएं। भगवान वराह को केसर युक्त खीर का भोग लगाएं, जिसमें तुलसी के पत्ते जरूर डालें। पूजा के बाद इस प्रसाद को अपने पूरे परिवार में बांटें। इससे व्यापार में आ रही मंदी दूर होती है और रुका हुआ पैसा वापस मिलने के योग बनते हैं।
- कोर्ट-कचहरी के मामलों में विजय के लिए (For Victory in Legal Matters): यदि आप किसी कानूनी विवाद या अदालती मामले से परेशान हैं, तो इस दिन सुबह के समय “श्री वराह कवच” का 3 बार पाठ करें। इसके बाद अनार की लकड़ी से या पीले चंदन की माला से “ॐ उग्ररूपाय नमः” मंत्र की एक माला का जाप करें।
- गंभीर रोगों से मुक्ति और उत्तम स्वास्थ्य के लिए (For Health & Healing): यदि परिवार में कोई लंबे समय से बीमार है, तो भगवान वराह के चरणों में स्पर्श कराया हुआ गंगाजल और तुलसी का पत्ता बीमार व्यक्ति को प्रसाद के रूप में ग्रहण कराएं। साथ ही, इस दिन तांबे के पात्र में जल भरकर उसमें थोड़ी सी हल्दी मिलाकर सूर्य देव को अर्घ्य दें।
वराह जयंती व्रत के मुख्य नियम (Core Fasting Rules)
- व्रत का संकल्प: सुबह स्नान के बाद सूर्य देव और भगवान वराह के सामने हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर व्रत का संकल्प लें कि आप दिनभर शांतचित्त और पवित्र रहकर व्रत का पालन करेंगे।
- ब्रह्मचर्य का पालन: व्रत के दिन शारीरिक और मानसिक रूप से पवित्रता बनाए रखें। क्रोध, झूठ, और किसी की निंदा करने से बचें।
- मध्याह्न पूजा: चूंकि भगवान वराह का प्राकट्य दोपहर में हुआ था, इसलिए दोपहर की पूजा के बाद ही फलाहार ग्रहण करने का विधान है।
- दान के बाद पारण: व्रत के अगले दिन (14 सितंबर 2026 को सुबह) ब्राह्मण या किसी जरूरतमंद को भोजन या अन्न दान करने के बाद ही अपना व्रत खोलें (पारण करें)।
व्रत में क्या खाएं और क्या न खाएं? (Dietary Guidelines)
व्रत में क्या खाएं?
- फल और जूस: केला, सेब, अनार, पपीता जैसे ताजे फल खाएं। मौसमी फलों का रस (जूस) या नारियल पानी पीना उत्तम है ताकि शरीर में ऊर्जा बनी रहे।
- दूध और डेयरी उत्पाद: गाय का दूध, मखाना खीर, सादी लस्सी, दही या घर का बना पनीर खा सकते हैं।
- व्रत का सात्विक भोजन: यदि एक समय नमक खाने का नियम रख रहे हैं, तो सेंधा नमक का उपयोग करके कुट्टू या सिंघाड़े के आटे की पूड़ी/पराठा, साबूदाने की खिचड़ी, या उबले हुए आलू खा सकते हैं।
- मेवे: काजू, बादाम, मखाने और मूंगफली (बिना साधारण नमक के भुनी हुई) का सेवन कर सकते हैं।
- व्रत का अनाज: यदि आप एक समय फलाहारी भोजन करना चाहते हैं, तो कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, या समा के चावल (सामक) से बनी पूड़ी, खिचड़ी या हलवा खा सकते हैं।
- सब्जियां: आलू, शकरकंद, लौकी, और कद्दू जैसी सात्विक सब्जियों को व्रत के भोजन में शामिल किया जा सकता है।
- नमक और मसाले: भोजन में केवल सेंधा नमक (Rock Salt), हरी मिर्च, और काली मिर्च का ही प्रयोग करें।
व्रत में क्या भूलकर भी न खाएं?
- अन्न और दालें: गेहूं, चावल, सूजी, मैदा, बेसन और सभी प्रकार की दालों का सेवन वर्जित है।
- तामसिक भोजन: प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा, और अत्यधिक तेल-मसाले वाले भोजन का सेवन बिल्कुल न करें। घर के अन्य सदस्य जो व्रत नहीं हैं, उनके भोजन में भी इस दिन प्याज-लहसुन का प्रयोग नहीं होना चाहिए।
- साधारण नमक: व्रत के भोजन में सामान्य सफेद नमक (समुद्री नमक) का उपयोग न करें, केवल सेंधा नमक का ही प्रयोग करें।
- बाहर का डिब्बाबंद खाना: बाजार के चिप्स, नमकीन या डिब्बाबंद जूस का सेवन न करें, क्योंकि इनमें साधारण नमक और प्रिजर्वेटिव्स हो सकते हैं।
आचरण के विशेष नियम (Rules of Conduct)
वराह जयंती के पावन अवसर पर केवल खान-पान के नियमों का पालन करना ही काफी नहीं है, बल्कि मानसिक, शारीरिक और व्यावहारिक रूप से भी उत्तम आचरण रखना अनिवार्य माना गया है:
1. मानसिक आचरण (Mental Conduct)
- क्रोध और वाणी पर नियंत्रण: इस दिन भूलकर भी किसी पर क्रोध न करें, न ही कटु या अपशब्दों का प्रयोग करें। अपनी वाणी में मधुरता और संयम बनाए रखें।
- निंदा और चुगली से बचें: किसी की पीठ पीछे बुराई या निंदा (चुगली) करने से व्रत का पुण्य नष्ट हो जाता है। मन में किसी के प्रति ईर्ष्या या द्वेष की भावना न लाएं।
- सकारात्मकता और भक्ति: मन को पूरी तरह भगवान विष्णु के चरणों में केंद्रित रखें। खाली समय में “ॐ वाराहाय नमः” या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का मानसिक जाप करते रहें।
2. शारीरिक व व्यावहारिक आचरण (Physical & Behavioral Conduct)
- ब्रह्मचर्य का पालन: वराह जयंती के दिन पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है। शारीरिक और मानसिक रूप से पवित्र रहें।
- क्षमा भाव: यदि अनजाने में किसी से कोई भूल हो जाए, तो उसे क्षमा करें। इस दिन घर में शांति और प्रेम का वातावरण बनाए रखें, क्योंकि जहां क्लेश होता है, वहां लक्ष्मी जी और नारायण का वास नहीं होता।
- दिन में सोने से बचें: व्रत के दिनों में (विशेषकर दोपहर और शाम के समय) सोने की मनाही होती है। इस समय को प्रभु की कथा सुनने, कीर्तन करने या धार्मिक पुस्तकें (जैसे श्रीमद्भागवत पुराण) पढ़ने में बिताएं।
3. प्रकृति और जीवों के प्रति आचरण (Conduct Towards Nature & Animals) चूंकि भगवान वराह ने पृथ्वी (भूदेवी) की रक्षा की थी और वे स्वयं एक पशु स्वरूप में प्रकट हुए थे, इसलिए इस दिन प्रकृति के प्रति हमारा आचरण बहुत मायने रखता है:
- जीवों पर दया (विशेषकर मूक पशु): इस दिन किसी भी बेजुबान जानवर को न सताएं, न ही उन्हें मारें या भगाएं। गली के कुत्तों, गायों और अन्य पशुओं को भोजन या पानी देना इस दिन अत्यंत शुभ माना जाता है।
- प्रकृति का सम्मान: पेड़-पौधों को नुकसान न पहुंचाएं। इस दिन बेवजह फूल, पत्तियां या टहनियां न तोड़ें। यदि संभव हो, तो पृथ्वी माता के सम्मान में एक नया पौधा (जैसे तुलसी या पीपल) अवश्य लगाएं।
- धरती माता को नमन: सुबह उठते ही सबसे पहले अपने पैर जमीन पर रखने से पहले धरती माता (भूदेवी) को स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लें और उनसे क्षमा प्रार्थना करें।
4. इन आदतों का पूरी तरह त्याग करें (Things to Avoid)
- घर में या खुद के शरीर पर तामसिक चीजों (जैसे जुआ खेलना, शराब पीना, धूम्रपान करना या झूठ बोलना) का प्रयोग और आचरण बिल्कुल न आने दें।
- इस दिन बाल काटना, नाखून काटना या दाढ़ी बनाना जैसे कार्य वर्जित माने जाते हैं, इन्हें एक दिन पहले या बाद में ही करें।
पारण का सही समय और विधि (Parana Timing & Rituals 2026)
हिंदू शास्त्रों के अनुसार, व्रत का पारण हमेशा उदयातिथि में अगले दिन सूर्योदय के बाद और तृतीया तिथि के समाप्त होने पर किया जाता है।
- पारण की तिथि: 14 सितंबर 2026, सोमवार
- पारण का शुभ समय: सुबह 06:12 बजे से सुबह 07:06 बजे के बीच
- विशेष ध्यान दें: 14 सितंबर को सुबह 07:06 बजे भाद्रपद शुक्ल तृतीया तिथि समाप्त हो जाएगी और चतुर्थी तिथि लग जाएगी। इसलिए व्रत का पारण सुबह 07:06 बजे से पहले करना सबसे उत्तम और शास्त्रसम्मत रहेगा।
पारण की सही विधि:
- सुबह का स्नान और पूजा: सोमवार (14 सितंबर) की सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मंदिर में भगवान वराह/विष्णु के सामने दीपक जलाएं और व्रत की सफलता के लिए उन्हें धन्यवाद दें।
- दान-दक्षिणा (महत्वपूर्ण): व्रत खोलने से पहले किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न (सीधा/बायना) दान करें। इसमें आप गेहूं, चावल, चने की दाल, हल्दी और कुछ दक्षिणा (पैसे) रखकर दान कर सकते हैं।
- तुलसी दल से शुरुआत: पारण करते समय सबसे पहले भगवान के चरणों में अर्पित किया हुआ तुलसी का पत्ता और चरणामृत ग्रहण करें।
- सात्विक भोजन: पारण के भोजन में सात्विक भोजन (बिना प्याज-लहसुन का खाना) ही खाएं। भोजन की पहली बाइट लेने से पहले भगवान विष्णु को भोग अवश्य लगाएं।












































