सनातन हिंदू धर्म और वैदिक संस्कृति में पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) का अत्यंत पवित्र एवं विशेष महत्व माना गया है। यह समय हमारे पूर्वजों और पितरों की आत्मा की शांति, उनकी स्मृति को नमन करने तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए समर्पित होता है। पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध कर्म, पिंडदान, तर्पण, ब्राह्मण भोजन और दान-पुण्य करने का विधान है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से पितृ पक्ष का शुभारंभ होता है और आश्विन मास की अमावस्या तिथि (सर्वपितृ अमावस्या) पर इसका समापन होता है। वर्ष 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर 2026 (शनिवार) से हो रही है, जो 10 अक्टूबर 2026 (शनिवार) तक चलेगा।
🗓️ पितृ पक्ष 2026: तिथियां एवं संपूर्ण श्राद्ध कैलेंडर
वर्ष 2026 में तिथियों की गणना के अनुसार चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध एक ही दिन पड़ रहा है। नीचे दिए गए कैलेंडर के अनुसार आप अपने पूर्वजों की तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म कर सकते हैं:
| दिनांक | दिन (वार) | तिथि | श्राद्ध का नाम / विवरण |
| 26 सितंबर 2026 | शनिवार | भाद्रपद पूर्णिमा | पूर्णिमा श्राद्ध / प्रोष्ठपदी श्राद्ध |
| 27 सितंबर 2026 | रविवार | प्रतिपदा | प्रतिपदा श्राद्ध |
| 28 सितंबर 2026 | सोमवार | द्वितीया | द्वितीया श्राद्ध |
| 29 सितंबर 2026 | मंगलवार | तृतीया | तृतीया श्राद्ध |
| 30 सितंबर 2026 | बुधवार | चतुर्थी एवं पंचमी | चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध (एक साथ) |
| 1 अक्टूबर 2026 | गुरुवार | षष्ठी | षष्ठी श्राद्ध |
| 2 अक्टूबर 2026 | शुक्रवार | सप्तमी | सप्तमी श्राद्ध |
| 3 अक्टूबर 2026 | शनिवार | अष्टमी | अष्टमी श्राद्ध |
| 4 अक्टूबर 2026 | रविवार | नवमी | नवमी श्राद्ध (मातृ नवमी) |
| 5 अक्टूबर 2026 | सोमवार | दशमी | दशमी श्राद्ध |
| 6 अक्टूबर 2026 | मंगलवार | एकादशी | एकादशी श्राद्ध |
| 7 अक्टूबर 2026 | बुधवार | द्वादशी | द्वादशी श्राद्ध (संन्यासी श्राद्ध) |
| 8 अक्टूबर 2026 | गुरुवार | त्रयोदशी | त्रयोदशी श्राद्ध |
| 9 अक्टूबर 2026 | शुक्रवार | चतुर्दशी | चतुर्दशी श्राद्ध (अकाल मृत्यु श्राद्ध) |
| 10 अक्टूबर 2026 | शनिवार | अमावस्या | सर्वपितृ अमावस्या (महलया श्राद्ध) |
पितरों का श्राद्ध किस दिन और किस प्रकार करना चाहिए?
शास्त्रों एवं धर्मग्रंथों के अनुसार, श्राद्ध कर्म करते समय तिथियों का सही ज्ञान होना अति आवश्यक है। पितरों की प्रसन्नता और मुक्ति के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन किया जाता है:
- मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध:पूर्वज या परिजन जिस तिथि (हिंदी तिथि जैसे प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया आदि) को परलोक सिधारे थे, पितृ पक्ष में उसी तिथि को उनका तर्पण व श्राद्ध किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि किसी की मृत्यु प्रतिपदा तिथि को हुई थी, तो उनका श्राद्ध प्रतिपदा के दिन ही होगा।
- चतुर्थी और पंचमी तिथि का विशेष संयोग (30 सितंबर 2026):वर्ष 2026 के पंचांगीय गणित के अनुसार, चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध एक ही दिन 30 सितंबर 2026 (बुधवार) को संपन्न किया जाएगा। इसलिए जिन परिजनों का निधन किसी भी पक्ष की चतुर्थी या पंचमी तिथि को हुआ था, उनका श्राद्ध 30 सितंबर को ही किया जाएगा।
- मातृ नवमी (नवमी श्राद्ध का महत्व):पितृ पक्ष की नवमी तिथि को ‘मातृ नवमी’ के नाम से जाना जाता है। यह तिथि कुल की दिवंगत माताओं, बहनों, बेटियों और सुहागिन स्त्रियों के श्राद्ध के लिए समर्पित होती है। इस दिन परिवार की दिवंगत महिलाओं का तर्पण करने से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
- अज्ञात तिथि और सर्वपितृ अमावस्या:जिन लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्यु की सटीक तिथि ज्ञात नहीं होती, अथवा जो किसी कारणवश अपनी-अपनी तिथि पर श्राद्ध करने से चूक जाते हैं, वे सर्वपितृ अमावस्या (10 अक्टूबर 2026) के दिन श्राद्ध कर सकते हैं। मान्यता है कि इस दिन किया गया श्राद्ध सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों तक पहुँचता है और उनकी आत्मा को तृप्ति एवं शांति प्रदान करता है।














































