सनातन धर्म में सावन पूर्णिमा के समापन के साथ ही भगवान शिव का प्रिय सावन का महीना समाप्त हो जाता है और पवित्र भाद्रपद (भादों) मास का शुभारंभ हो जाता है। भाद्रपद का महीना भक्ति, आनंद, उल्लास और बड़े धार्मिक उत्सवों का काल माना गया है। इसी पावन महीने में जगत के पालनहार भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव ‘श्रीकृष्ण जन्माष्टमी’ तथा विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश के आगमन का महापर्व ‘गणेश उत्सव (गणेश चतुर्थी)’ अत्यंत श्रद्धा और धूमधाम के साथ मनाया जाता है।
शास्त्रों और वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार, जब भी कोई नया धार्मिक काल या महीना बदलता है, तो घर के पूजा स्थल (मंदिर) की ऊर्जा को भी नए सिरे से संतुलित करना आवश्यक होता है। सावन के बीतने के बाद पूजा घर की विशेष सफाई और वास्तु व्यवस्था करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा, सुख-शांति और आर्थिक समृद्धि का प्रवाह बना रहता है।
⚠️ सावन बीतने के बाद मंदिर से तुरंत बाहर निकालें ये 4 चीजें
सावन के दौरान पूजा-पाठ में इस्तेमाल की गई कुछ चीजें यदि भाद्रपद मास की शुरुआत में भी मंदिर में रखी रह जाएं, तो वे वास्तु दोष और नकारात्मकता का कारण बन सकती हैं। इन्हें तुरंत हटा देना चाहिए:
- सूखे बेलपत्र, धतूरा और बासी फूल: सावन के महीने में शिवलिंग पर नियमित रूप से अर्पित किए गए बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और शमी के पत्ते यदि मंदिर में सूखे या मुरझाए हुए पड़े हैं, तो उन्हें तुरंत हटा दें। वास्तु के अनुसार मंदिर में रखे सूखे फूल-पत्ते नकारात्मकता फैलाते हैं। ध्यान रखें कि इन्हें कचरे के डिब्बे में फेंकने के बजाय किसी गमले की शुद्ध मिट्टी में दबा दें या पवित्र जल में प्रवाहित कर दें।
- अभिषेक का बासी जल और पुराने बर्तन: सावन में शिवलिंग का जलाभिषेक या रुद्राभिषेक करने के बाद जलपात्र, लोटे, शंख या पंचामृत के बर्तनों में जल बचा न रहने दें। तांबे और पीतल के बर्तनों को सही तरीके से साफ करके चमका लें और उसमें ताजा जल भरें।
- दीपक की जली हुई बत्तियां और भस्म (राख): सावन के दौरान की गई आरती की जली हुई पुरानी बत्तियां, धूप-अगरबत्ती की राख और कपूर के बचे हुए अवशेष मंदिर के कोनों में जमा न होने दें। मंदिर में जमा राख और जली हुई बत्तियां दरिद्रता और आर्थिक तंगी का कारण बनती हैं।
- पुराने व मैले पूजा वस्त्र एवं रक्षासूत्र: भगवान की चौकी या सिंहासन पर बिछा पुराना या मैला कपड़ा हटा दें। सावन के दौरान उतारे गए पुराने रक्षासूत्र (कलावा) और सूखे हार-फूलों को मंदिर से सम्मानपूर्वक हटाकर विसर्जित कर दें।
✨ भाद्रपद के पहले दिन इस प्रकार सजाएं अपना पूजा घर
भादों का महीना मुख्य रूप से भगवान श्री हरि विष्णु, उनके बाल स्वरूप ‘लड्डू गोपाल’ और प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश को समर्पित होता है। भाद्रपद के पहले दिन से ही अपने पूजा घर में निम्नलिखित बदलाव करें:
- गंगाजल से शुद्धिकरण: पूरे पूजा घर, मूर्तियों और विग्रहों को साफ और सूती कपड़े से पोंछने के बाद पूरे मंदिर परिसर में गंगाजल का छिड़काव करें। इससे वातावरण अत्यंत शुद्ध, पवित्र और शांत बनता है।
- पीले और चमकीले वस्त्रों का प्रयोग: सावन में भगवान शिव के लिए सादे या श्वेत वस्त्रों का प्रयोग अधिक होता है, लेकिन भाद्रपद में लड्डू गोपाल और मंदिर की चौकी के लिए पीले, केसरिया या लाल रंग के वस्त्र चुनें। पीला रंग भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है।
- लड्डू गोपाल और गणपति बप्पा का प्रमुख स्थान: मंदिर में बाल गोपाल के झूले को साफ करके अच्छे से सजाएं। उनके पास सुंदर मोरपंख और बांसुरी अवश्य रखें। इसके साथ ही आगामी गणेश चतुर्थी के लिए भगवान गणेश जी के पूजन स्थल की तैयारियां शुरू करें।
- तुलसी दल का नियमित प्रबंध: यद्यपि सावन में शिवलिंग पर तुलसी नहीं चढ़ाई जाती, लेकिन भाद्रपद में भगवान श्री कृष्ण और विष्णु जी के प्रत्येक भोग में तुलसी दल (तुलसी का पत्ता) का होना अनिवार्य माना गया है। इसलिए मंदिर में ताजे तुलसी के पत्तों की नियमित व्यवस्था रखें।
घर के मंदिर में किए गए ये छोटे-छोटे और महत्वपूर्ण बदलाव आपके परिवार में सुख, शांति, निरोगी काया और समृद्धि के नए द्वार खोलते हैं।














































